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कुछ गलत नामों की निशानदेही ⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

कुछ लोग अपने बच्चों के नाम, अहमद नबी, मुहम्मद नबी, रसूल अहमद,नबी अहमद रख देते हैं, यह ग़लत है इसके बजाय गुलाम मुहम्मद या गुलाम रसूल या गुलाम नबी कर लें या मुहम्मद नबी और अहमद नबी में नबी के आगे ‘ह’ बढ़ा कर मुहम्मद नबीह या अहमद नबीह कर लें।

गफूरुद्दीन नाम रखना भी गलत है क्यूंकि गफूर के  मअना मिटा देने वाले के हैं लिहाज़ा गफूरुद्दीन के माअना हुए ‘दीन को मिटाने वाला’। लाहौला वला .कुव्वता इल्ला बिल्लाह। अल्लाह जल्ला शानुहू का नाम गफूर इसलिए है कि वह गुनाहों को मिटाता है, नाम रखने से मुताल्लिक क्या जाइज़ है और क्या नाजाइज़ इसको तफसील से जानने के लिए आलाहजरत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमतो वर्रिदवान की तसनीफ मुबारक अहकामे शरीअत में सफा 72 से सफा 98 तक का मुतालआ करना चाहिए।

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  नोट◆- कुछ लोगों के नाम इस किस्म के होते हैं जिनमें अल्लाह तआला के मखसूस नामों के साथ ‘अब्द' लगा होता है जैसे अब्दुल्लाह, अब्दुर्रहमान,अब्दुर्रज्जाक, अब्दुल खालिक वगैरहा तो इन नाम वालों को बगैर ‘अब्द’ लगाये खाली रहमान, रज्जाक या ख़ालिक हरगिज़ नहीं कहना चाहिए और यह इस्लाम में बहुत बुरी बात है जिसका ध्यान करना निहायत ज़रूरी है। वलइयाज़ुबिल्लाहि तआला।

  

  गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 148)







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क्या दरख्तों और ताकों में शहीद मर्द रहते हैं।

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कुछ लोग कहते हैं कि फलां दरख्त पर शहीद मर्द रहते हैं। या फलां ताक में शहीद मर्द रहते हैं और उस दरख्त और उस ताक के पास जाकर फातिहा दिलाते हैं हार फूल खुशबू वगैरा डालते हैं लोबान अगरबत्ती सुलगाते हैं और वहाँ मुरादें मांगते हैं। यह सब खिलाफ शरअ और गलत बातें है। जो बर बिनाए जहालत अवाम मे राइज हो गई हैं इनको दूर करना निहायत ज़रूरी है। हक यह है कि ताकों, महराबों, दरख्तों वगैरा पर महबूबाने खुदा का क्रियाम करार देकर वहाँ हाज़िरी नियाज़, फातिहा, अगरबत्ती, मोमबत्ती जलाना, हार फूल डालना खुशबूयें मलना, घूमना, चाटना हरगिज़ जाइज़ नहीं।
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 आलाहज़रत रदियल्लाहु  तआला अन्हु इन बातों के मुतअल्लिक फरमाते हैं
‘यह सब वाहियात व खुराफात और जाहिलाना हिमाक़ात व
व बतलात हैं इनका इज़ाला लाज़िम है।"
(अहकामे शरीअत, हिस्सा अव्वल, सफहा 32)
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आजकल कुछ लोग इन हरकतों से रोकने वालों को वहाबी कह देते हैं हालांकि किसी मुसलमान को वहाबी कहने में जल्दी नहीं करना चाहिए जब तक कि उसके अकाइद की खूब तहकीक न हो जाए और ख़िलाफ़ शरअ हरकतों और बिदअतों से रोकना तो अहले सुन्नत का ही काम है वहाबी तो उसको कहते हैं जो अल्लाह तआला और उसके महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम के और बुज़ुर्गाने दीन की शान में गुस्ताख़ी व बेअदबी करता हो या जानकर गुस्ताख़ों की तहरीक में शामिल हो उनको अच्छा जानता हो। वहाबी किसे कहते हैं इसको तफ़सील के साथ मैंने अपनी किताब"दरमियानी उम्मत’ में लिख दिया है यह किताब उर्दू और हिन्दी में अलग अलग छप चुकी है हासिल करके मुतालआ कर लिया जाए।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 147)

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