Showing posts with label निक़ाह तलाक़ इद्दत. Show all posts
Showing posts with label निक़ाह तलाक़ इद्दत. Show all posts

Saturday

जवान लड़के लड़कियों की शादी में देर करना 

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
आजकल जवान लड़के लड़कियों को घर में बिठाए रखना और उनकी शादी में ताखीर करना आम हो गया है इस्लामी नुक़्तए नज़र से यह गलत बात है ।

________________________________________


हदीसे पाक में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम इरशाद फरमाते हैं
जिस की लड़की 12 बरस की उम्र को पहुंचे और वह उसका निकाह ना करें फिर वह लड़की गुनाह में मुब्तला हो तो वह गुनाह उस शख्स पर है (मिश्कात शरीफ सफहा 271)
ऐसी ही हदीस लड़कों के बारे में भी आई है
__________________________________________
आजकल की फुज़ूल रस्मो और बेजा ख़र्चों ने भी शादियों को मुश्किल कर दिया है जिसकी वजह से भी बहुत सी जवान लड़कियां अपने घरों में बैठी हुई है और लड़के मालदारो की लड़कियों की तलाश में बूढ़े हुए जा रहे हैं इन खर्चों पर कंट्रोल करने के लिए जगह-जगह तहरीके चलाने और तन्ज़ीमे बनाने की जरूरत है चाहे वह अपनी अपनी बिरादरी की सतह पर ही काम किया जाए तो कोई हर्ज नहीं । भाइयों ! दौर काम करने का है सिर्फ बातें मिलाने या नारे लगाने और मुशायरे सुनने से कुछ हासिल ना होगा शादी ब्याह में कम से कम खर्च करने का माहौल बनाओ ताकि ज्यादा से ज्यादा मर्द और औरतें शादीशुदा रहे ।

कुछ लोग आला तालीम हासिल कराने के लिए लड़कियों की उम्र ज्यादा कर देते हैं उन्हें वह गैर शादीशुदा रहने पर मजबूर कर देते हैं वह भी निरी हिमाकत और बेवकूफी है ।

आजकल मुसलमानों में कुछ बदमज़हब और बातिल फिरके जवान लड़कियों की आला तालीम के लिए मदारिस और स्कूल खोलने में  बहुत कोशिश कर रहे हैं । उनका मकसद अपने बातिल और मखसूस गैर-इस्लामी अक़ाइद मुसलमानों में फैलाने के अलावा और कुछ नहीं है और इधर लोगों में आजकल औलाद से मोहब्बत इस कदर बढ़ गई है कि हर शख्स कोशिश में है मेरी लड़की मेरा लड़का पता नहीं क्या-क्या बन जाए आला तालीम के नशे सवार है और बनता तो  कोई कुछ नहीं लेकिन अक्सर बुरे दिन देखने को मिलते हैं लड़के ज्यादा पढ़ कर बाप बन रहे हैं लड़कियां माँ बन रही है।

हो सकता है कि हमारी इन बातों से कुछ लोगों को इख्तिलाफ हो मगर हमारा मशवरा यही है लड़कियों को आला तालीम से बाज़ रखा जाये , खासकर जब कि यह तालीम शादी की राह में रुकावट हो और पढ़ने पढ़ाने के चक्कर में अधेड़ कर दिया जाता हो और खासकर गरीब तबके के लोगों में क्योंकि उनके लिए पढ़ी लिखी लड़कियां बोझ बन जाती है क्योंकि उनके लिए शौहर भी ए क्लास और आला घर के होना चाहिए और वह मिल नहीं पाते कोई मिलता भी है तो वह जहेज़ मे मारुती कार मोटरसाइकिल का तालिब है बल्कि बारात से पहले एक दो लाख रूपये का सवाल करता है ।
हिंदुस्तान गवर्नमेंट जो बच्चों को ऊँची तालीम दिलाने पर ज़ोर दे रही है , उसके लिए मेरा मशवरा है कि वह तालीम याफ्ता बच्चों की नौकरी व मुलाज़िमत की ज़िम्मेदारी ले या उनके वज़ीफ़े मुतय्यन करे। खाली पढ़ा  कर छोड़ देना ,न घर का रखा न बाहर का,न खेत का न दफ्तर का। यह गरीबों के साथ ज़ुल्म है और समाज की बर्बादी है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

लडकों की शादी में बजाए वलीमे के मंढ़िया करना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
लड़के की शादी में जो ज़ुफ़ाफ यानी बीवी और शौहर के जमा होने के बाद सुबह को अपनी बिसात के मुताबिक मुसलमानों को खाना खिलाया जाए उसे 'वलीमा' कहते हैं और यह सय्यिदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की मुबारक सुन्नत है काफी हदीसों में इसका ज़िक्र है सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम ने खुद वलीमे किये और सहाबा किराम को भी उस का हुक्म दिया मगर आजकल काफी लोग शादी से पहले दावते करके खाना खिलाते हैं जिसको मंढ़िया कहा जाता है वलीमा ना करना उसकी जगह मंढ़िया करना खिलाफे सुन्नत है मगर लोग रस्मो-रिवाज पर अड़े हुए हैं और अपनी ज़िद और हठधर्मी या नावाकिफी की बुनियाद पर रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की इस मुबारक और प्यारी सुन्नत को छोड़ देते हैं । इस्लाम के इस तरीके में एक बड़ी हिकमत यह है कि अगर निकाह से पहले ही खाना खिला दिया तो हो सकता है किसी वजह से निकाह ना होने पाए और अक्सर ऐसा हो ही जाता है तो इस सूरत में वह निकाह से पहले के तमाम इखराजात बे मकसद और बोझ बनकर रह जाते हैं ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

मुतलक्का की इद्दत कितने दिन है?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि मुतलक्का(जिसे तलाक दी गई हो) की इद्दत तीन  महीने या तीन महीने तेहरा दिन में पूरी हो जाती है यह गलत है। तलाकशुदा औरत की इद्दत यह है कि अगर वह हामिला(गर्भवती) न हो तो तलाक के बाद उसको तीन माहवारी(मासिकधर्म ,हैज़ ,पीरियड) हो जाये, ख्वाह तीन माहवारियाँ तीन महीने से कम में हो जाये या उससे ज्यादा में ख्वाह साल गुज़र जाये अगर तीन बार उसको माहवारी नही हुई तो इद्दत पूरी नहीं होगी। हाँ अगर वह पचपन(55) साल की हो गई हो और महीना आना बंद हो गया हो या नाबालिग हो कि अभी महीना शुरू ही नहीं हुआ या उसको कभी महीना किसी मर्ज़ की वजह से आया ही न हो तो उसकी इद्दत तीन माह है और हामिला की इद्दत बच्चा पैदा होने जाना है ख्वाह तलाक़ के बाद फ़ौरन बच्चा पैदा हो जाये इद्दत हो जायेगी।

खुलासा यह है कि आम तौर से तलाक की इद्दत 3 महीने या 3 महीने 13 दिन समझना गलत है। सही बात वह है जो हमने ऊपर बयान कर दी।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 82)

इद्दत के लिए औरत को मायके में लाना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
आजकल अगर किसी औरत को तलाक हो जाए तो मायके वाले उसको फौरन अपने घर ले जाते हैं बल्कि इस पर फख्र किया जाता है और अगर वह शौहर के घर में रहे तो कुछ लोग उसके मां-बाप और भाइयों को गैरत दिलाते हैं की तलाक़ के बाद भी लड़की को शौहर के घर छोड़ दिया है यह सब गलत बातें हैं

 मसअला यह है की तलाक के बाद भी औरत शौहर के घर में ही इद्दत गुज़ारें और शौहर के ऊपर इद्दत का नान व नफ़का और रहने के लिए मकान देना लाज़िम है।
  क़ुरआन करीम के पारा 28 सूरह तलाक का तर्जमा यह है >"तलाक वाली औरतों को उनके घर से न निकलो न वह खुद निकले मगर जब कि वह खुली हुई बेहयाई करें।"<
हां यह जरूर है कि वह दोनों अजनबी और एक दूसरे के गैर हो कर रहे और बेहतर यह है कि उन के दरमियान कोई बूढ़ी औरत रहे और उनकी देखभाल रखें और यह भी हो सकता है कि शौहर घर में न रहे ख़ास कर रात को कहीं और सोये। औरत के हाथ का पका हुआ खाना खाने में कोई हर्ज नहीं है शौहर के कपड़े  बगैरा  धोना भी तलाक़ के बाद कोई गुनाह नहीं है क्योंकि बादे तलाक वह अगरचे बीवी नहीं मगर एक मुसलमान औरत है और शरई हुदूद की पाबंदी के साथ एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान के काम में आ जाना हुस्ने अखलाक है और अच्छी बात है।

यह जो कुछ जगह लोग इतनी सख्ती करते हैं कि बादे तलाक इद्दत में अगर शौहर बीवी के हाथ का पका हुआ खाना भी खा ले तो हुक़्क़ा पानी बन्द कर देते हैं, यह गलत है। जब तक खूब यकीन से मालूम न हो कि वो मियां बीवी की तरह मख़सूस मुआमलात करते हैं सिर्फ शुकूक की वजह से उन्हें तंग न किया जाये और बदगुमानी इस्लाम में गुनाह है।

हाँ अगर तलाक ए मुगल्लज़ा या बाइना की इद्दत हो और शौहर फ़ासिक़ ,बदकार हो  और कोई वहां ऐसा ना हो कि अगर शौहर की नियत खराब हो तो उसको रोक सके तो औरत के लिए उस घर को छोड़ देने का हुक्म है ।
(फतावा फैज़ुर्रसूल ,जिल्द 2 सफ़हा 290)

क्या औरत के बीस बच्चे हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
औरत के बीस बच्चे हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है यह एक आमियाना और खालिस जाहिलाना ख्याल है । सही बात यह है कि बच्चे बीस हो जाए या इससे भी ज्यादा उसके निकाह पर कोई फर्क नहीं पड़ता और पहला निकाह बाकी रहता है । दोबारा निकाह की कोई ज़रूरत नहीं है ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 80)


जिस औरत के ज़िना का हमल हो उससे निकाह
जाइज़ है

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
ज़ानिया हामिला यानी वह औरत जो बिना निकाह किए ही गर्भवती हो गई हो उससे निकाह को कुछ लोग नाजायज़ समझते हैं हालांकि वह जाइज़ है । ज़िना इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है और इसकी सज़ा बहुत सख्त है लेकिन अगर किसी औरत से ज़िनाकारी सरज़द हुई , उससे निकाह किया जाये तो निकाह सही हो जाएगा,ख्वाह वह ज़िना से हामला हो गई हो जबकि वह औरत शौहर वाली न हो और निकाह अगर उसी शख्स से हो जिसका हमल है तो निकाह के बाद वह दोनों साथ रह सकते हैं , सुहबत व हमबिस्तरी भी कर सकते हैं और किसी दूसरे से निकाह हो तो जब तक बच्चा पैदा न हो जाए दोनों लोगों को अलग रखा जाए और उनके लिए हमबिस्तरी जाएज़ नहीं ।

⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵⤵
इमामे अहले सुन्नत सय्यिदी आला हजरत फरमाते हैं
⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇
जो औरत मआज़ल्लाह ज़िना से हामिला हो उससे निकाह सही है  ख्वाह उस ज़ानी से हो या गैर से फ़र्क़ इतना है अगर ज़ानी  से निकाह हो तो वह बादे निकाह उससे कुर्बत भी कर सकता है और गैर ज़ानी से हो तो वज़ए हमल तक( बच्चा पैदा होने तक) कुर्बत न करे।

( फतावा रज़विया जिल्द 5 ,सफ़हा 199, फतावा अफ्रीका ,सफ़हा 15)

क्या शौहर के बीवी को हाथ लगाने से पहले महर माफ कराना ज़रूरी है

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि शौहर के लिए ज़रूरी है कि निकाह के बाद पहली मुलाकात में अपनी बीवी से पहले महर माफ कराये फिर उसके जिस्म को हाथ लगाए यह एक गलत ख्याल है इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं । महर माफ कराने की कोई ज़रूरत नहीं। आजकल जो महर राइज है, उसे 'गैर मुअज़्ज़ल' कहते हैं जो या तो तलाक देने या फिर दोनों में से किसी एक की मौत पर देना वाजिब होता है । इससे पहले देना वाजिब नहीं हां अगर पहले दे दे तो कोई हर्ज नहीं बल्कि निहायत ही उम्दा बात है । माफ करने की कोई ज़रूरत नहीं और महर माफ कराने के लिए बाँधा नहीं जाता है । अब दे या फिर दे, वह देने के लिए  है,माफ कराने के लिए नहीं ।
 
हाँ अगर महर 'मुअज़्ज़ल' हो यानी निकाह के वक़्त देना तय कर लिया गया हो तो बीवी को इख्तियार है कि वह अगर चाहे तो बगैर महर वसूल किए खुद को उसके काबू दे ना दे और उसको हाथ ना लगा दे और चाहे तो बगेर महर लिए भी उसको यह सब करने दे , माफ कराने का यहां भी कोई मतलब नहीं ।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 79)


समधन चाची और ममानी से निक़ाह

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
कुछ लोग समधन चाची और मुमानी से  निक़ाह को हराम जानते हैं हालांकि समधन से निकाह बिला शक जाइज़ है , यूं ही चाची और मुमानी से भी निकाह में कोई हर्ज नहीं जबकि उनके शौहरों ने उन्हें तलाक दे दी हो या वो मर चुके हैं और इद्दत के बाद समधन चाची और मुमानी से निकाह जाइज़ है ।  जो लोग इन निकाहों को हराम जानते हैं , वह जाहिल है ।

हवाले के लिए देखिए ⤵
⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇⬇
(मलफूज़ाते आला हज़रत अलैहिर्रहमा जिल्द सोएम सफ़हा 10 और फतावा अफ्रीका सफ़हा 100)

क्या हालत ए हमल में तलाक नहीं होती?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
हमल की हालत में तलाक़ वाकेअ हो जाती है यह जो कुछ लोग समझते हैं कि औरत हमल से हो और उस हालत में शौहर तलाक़ दे तो तलाक़ वाकेअ नहीं होती यह उनकी गलतफहमी है ।

सय्यिदी आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत इरशाद फरमाते हैं >>जाइज़ व हलाल है अय्यामे हमल मे दी गई हो । (फतावा रज़विया जिल्द 5 सफहा 625)


क्या तलाक के लिए औरत का सामने होना या सुनना ज़रूरी है?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

कुछ लोग समझते हैं कि शौहर अगर बीवी को तलाक दे तो तलाक के अल्फाज का औरत के लिए सुनना और औरत का तलाक के वक्त सामने होना जरूरी है यह गलतफहमी है औरत अगर ना सुने और वहां मौजूद भी ना हो तब भी शौहर के तलाक देने से तलाक हो जाएगी चाहे शौहर बीवी में हजारों मील का फासला हो ।

आला हजरत इमाम अहले सुन्नत सय्यिदी शाह अहमद रज़ा खाँ साहब रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं>

तलाक के लिए औरत का वहां हाज़िर होना कोई शर्त नहीं ।
(फतावा रज़विया , जिल्द 5 , सफहा 618)



निकाह पढ़ाने में ईजाब व कुबूल के बाद खुतबा पढ़ना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

 यह रिवाज़ भी गलत है सुन्नत यह है कि ख़ुतबए  निकाह  ईजाब कबूल से पहले पढ़ा जाए।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 77)


शरअ पयम्बरी महर मुकर्रर करना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
कभी-कभी कुछ जगहों पर निकाह में महर शरअ पयम्बरी मुकर्रर किया जाता है और उससे उनकी मुराद  चौसठ रुपये और दस आने होती है या कोई और रकम। हालांकि यह सब यह सब बातें हैं शरीयत ए पैगम्बरे आज़म सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने महर में ज़्यादती की कोई हद मुकर्रर नहीं की है जितने पर दोनों में फरीक मुत्त्तफिक़ हो जाए वही महर शरए पयम्बरी है हां कम से कम महर की मिकदार दस दिरहम यानी तकरीबन दो तोले तेरह आने भर चांदी है उससे कम महर सही नहीं  अगर बांधा गया तो महरे मिस्ल लाज़िम आएगा । और  बाज़ लोग महर शरअ पयम्बरी से सय्यिदितुना फातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा के अक़दे  मुबारक का महर ख्याल करते हैं हालांकि खातूने जन्नत के निकाहे मुबारक का महर चार सौ मिस्काल यानी डेढ़ सौ तोले चांदी था।

     खुलासा यह की शरअ की तरफ से महर की कोई रकम मुकर्रर नहीं की गई । हाँ यह ज़रुर है कि दस दिरहम यानी दो तोले तेरह आने भर चांदी से कम कीमत न हो।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 76)


तीन तलाकों का रिवाज़

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
आजकल अज़ रूए जहालत व नादानी अपनी औरतों को तीन या उससे ज़्यादा तलाक दे डालते हैं या काग़ज़ों में लिखवा देते हैं और फिर कभी बात को दोबारा बनाने के लिए उसकी सजा यानी हलाले से बचने लिए झूट सच बोलते और मुफ़्तीयाने किराम और उल्मा दीन को परेशान करते है ।
काश यह लोग तलाक से पहले ही उलमा से मशवरा कर लें तो यह नौबत ही न आए । तीन तलाक़ एक वक़्त देना गुनाह है I तलाक का मकसद सिर्फ यह है कि बीवी को अपने निकाह से बाहर करके दूसरे के लिए हलाल करना कि इद्दत के बाद वह किसी और से निकाह कर सके यह मक़सद सिर्फ एक तलाक या दो से भी हासिल हो जाता है I एक तलाक देकर उसको इद्दत गुजरने के लिए छोड दिया जाए और इद्दत केअन्दर उसको एक अजनबी व गैर औरत की तरह रखा जाए और जबान से भी रजअत न की जाए तो इद्दत के बाद वह दूसरे से भी निकाह कर सकती है और पहले शौहर के निकाह में भी सिर्फ निकाह करने से,बगैर हलाले के वापस आ सकती है । और तीन तलाको के गुनाह व बबाल से भी बचा जा सकता है । ज़रूरत के वक़्त तलाकइस्लाम में मशरूअ हैं क्यूंकि मिया बीवी का रिश्ता कोई पैदाइशी खूनी और फितरी रिश्ता नहीं होता बल्कि यह तअल्लुक अमूमन  जवानी में काइम होता है । तो यह जरूरी नहीं कि यह महब्बत काइम हो ही जाए बल्कि मिजाज़ अपने अपने आदतें अपनी अपनी तौर तरीके अपने अपने ख्यालात व रुजहानात अलग अलग होने की सूरत में बजाए महब्बत के नफरत पैदा हो जाती है और एक दुसरे के  साथ जिन्दगी गुजारना निहायत मुश्किल बल्कि कभी कभी नामुमकिन हो जाता है ।और नौबत रात दिन के झगडो, मारपीट यहाँ  तक कि कभी क़त्ल व खूंरेजी तक आ जाती है I बीवी शौहर एक दूसरे के लिए जानी दुश्मन बन जाते हैं तो इन हालात के पेशे नज़र इस्लाम में तलाक रखी गई कि लड़ाईयों,झगड़ों, नफरतों , और मारका आराईयों के बजाए सुलह व सफाई और हुस्न व खूबी के साथ अपना अपना रास्ता अलग अलग कर  लिया जाए ।

    इसी लिए जिन मज़हबों और धर्मो में तलाक नहीं है यानी जिसके साथ जो बँध गया वह हमेशा के लिए बँध गया जान छुडाने का कोई रास्ता नहीं । औरतों के क़त्ल तक कर दिये जाते हैं या जिन्दगीं चैन व सुकन के बजाए अजाब बनी रहती है । आज औरतों की हमदर्दी के नाम पर कछ इस्लाम दुश्मन ताकतें ऐसे कानून बना रही हैं जिनकी रू से तलाक का वुजूद मिट जाए और कोई तलाक न दे सकें यह लोग औरतो के हमदर्द नही बल्कि उनका क़त्ल कर रहे हैं । आज मिट्टी के तेल बदन पर डाल कर औरतों को जलाने, पानी में डुबोने, ज़हर खिला कर उनको मारने वगैरा ईज़ारसानी के ख़ौफ़नाक वाक़िआत ज़िम्मेदार वही लोग हैं जो किसी भी सूरते हाल में तलाक़ के रवादार नहीं और जब से हर हाल में तलाक को ऐब और बुरा जानने का रिवाज़ बढ़ा तभी से ऐसे दर्दनाक वाकिआत कीतादाद बढ गई ।
  हम पूछते हैं क्या किसी औरत को मारना, जलाना, डुबोना, बेरहमी से पीटना बेहतर है या उसको महर की रकम देकर साथ इज्जत के तलाक दे देना और किसी औरत के लिए अपने शौहर को किसी तरह राज़ी करके उस से तलाक हासिल  कर लेना और अपनी आज़ादी कराके किसी और से निकाह कर लेना बेहतर है  या यारों , दोस्तों, आशनाओ से मिल कर शौहर को क़त्ल कराना। आज इस किस्म  के  वाकिआत व हादसात की ज़्यादती है जिनका अन्दाज़ा अखबारात का मुतालआ करने से होता है और अगर मुआशरे को बरकरार रखने के लिए इस्लाम ने शौहर और बीवी के जो हुकक बताए हैं उन पर अमल किया जाए तो यह नौबतें न आयें और लडाई झगड़े और तलाक तक बात ही न पहुँचे।

(गतल फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 74)