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Thursday

माथे या मांग में सिन्दूर

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मुसलमान औरतों को माथे पर सिन्दूर लगाना और सर की मांग में सिन्दूर भरना जाइज़ नहीं क्योंकि यह गैर मुस्लिमों की औरतों में राइज है लिहाज़ा ऐसा करने में उनकी मुशाबहत है और हदीस पाक में है जो जिस कौम की मुशाबहत करे वह उन्हीं में है।
(फतावा अजमलिया,जि.4 स.101)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 196)

Tuesday

औरत का नामहरम मनिहारों के हाथ से चूड़ियाँ पहनना

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यह हरामकारी काफी राइज है। औरतों को मनिहारों के हाथों में हाथ देकर चूड़ियाँ पहनना सख्त हराम है। बल्कि इसमें दो हराम हैं, एक गैर मर्द को हाथ दिखाना और दूसरा उसके हाथ में हाथ देना।
हमारी इस्लामी माँ बहनों को चाहिए कि अल्लाह तआला से डरें, उसके अज़ाब से बचें और इस फ़ेले हराम को फौरन छोड़ दें। बाज़ार से चूड़ियाँ ख़रीद लिया करें और घर में या तो औरतें एक दूसरे को पहना दें या घर वालों में से किसी महरम से पहन लें या शौहर अपनी बीवी को पहना दें तो गुनाह से बच जायेंगी।
जो मर्द अपनी औरतों को मनिहारों से चूड़ियाँ पहनवाते हैं। या उससे मना नहीं करते वह बहुत बड़े बेगैरत और दयूस हैं।
सय्यिदी आलाहज़रत अलैहिर्रहमह इस मसअले के मुताल्लिक फरमाते हैं : -हराम हराम हराम हाथ दिखाना गैर मर्द को हराम, उसके हाथ में हाथ देना हराम ,जो मर्द अपनी औरतों के साथ उसे रवा रखते हैं दय्यूस हैं।
(फतावा रज़विया जिल्द १० निस्फ़ आख़िर सफ़ा 208)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 160)

Monday

क्या औरतों को जानवर ज़ुबह करना नाजाइज़ है?

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औरत भी जानवर ज़ुबह(ज़िबह) कर सकती है और उसके हाथ का ज़ुबह किया हुआ जानवर हलाल है। मर्द और औरत सब उसे खा सकते हैं। मिश्कात शरीफ़ किताबुस्सैद वलज़िबाह सफ़ा 357 पर बुख़ारी शरीफ के हवाले से इसके जाइज़ होने की साफ़ हदीस मौजूद है जिसमें यह है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक लड़की के हाथ की जुबह की हुई बकरी का गोश्त खाने की इजाज़त दी।
मजीद तफसील के लिए देखिए सय्यिदी मुफ्ती आज़म हिन्द अलैहिर्रहमह का फतावा मस्तफ़विया जिल्द सोम सफ़ा 153 और फतावा रज़विया जिल्द 8 सफ़ा 328 और सफ़ा 332, -- खुलासा यह कि औरतों के लिए भी मर्दों की तरह हलाल जानवरों और परिन्दों को ज़ुबह करना जाइज़ है जो इसे ग़लत कहे वह खुद गलत और निरा जाहिल बल्कि शरीअत पर इफ्त्तिरा करने वाला है।
 समझदार बच्चे का जुबह किया हुआ जानवर भी हलाल है। और मुसलमान अगर बदकार और हरामकार हो तो ज़बीहा उसका भी जाइज़ है, नमाज़, रोज़े का पाबन्द न हो, उसके हाथ का भी ज़ुबह किया हुआ जानवर हलाल है। हाँ नमाज़ छोड़ना और हराम काम करना इस्लाम में बहुत बुरा है।
 दुर्रेमुख्तार में है:-ज़िबह करने वाले के लिए मुसलमान और आसमानी किताबों पर ईमान रखने वाला होना काफी है अगरचे औरत ही हो।
(दुर्रेमुख्तार, किताबुज़्ज़बाएह , जिल्द 2,सफहा,228,मतबअ मुजतबाई)
आलाहज़रत मौलाना शाह अहमद रजा खाँ अलैहिर्रहमह।फरमाते हैं।:-जुबह के लिए दीने समावी (आसमानी दीन) शर्त है, आमाल शर्त नहीं।
(फतावा रज़विया, जिल्द 8 सफ़ा 333)
हाँ जो लोग काफ़िर गैर मुस्लिम हों या उनके अक़ीदे की ख़राबी या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी की वजह से उन्हें इस्लाम से ख़ारिज व मुरतद क़रार दिया गया है उनके का ज़बीहा हराम व मुरदार है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 160)

साली और भावज से मज़ाक़ करना

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बाज़ लोग साली और भावज से मजाक करते बल्कि उसे अपना हक़ ख्याल करते हैं और उन्हें इस किस्म की बातों से रोका टोका जाए तो कहते हैं कि हमारा रिश्ता ही ऐसा है हालांकि इस्लाम में यह मज़ाक हराम बल्कि सख्त हराम जहन्नम का सामान है। औरतों और मर्दों के दरमियान मखसूस मामलात से मुतअल्लिक गन्दी और बेहूदा बातें ख़्वाह खुले अल्फ़ाज़ में कही जायें या इशारों किनायों में सब मज़ाक हैं और हराम है। हदीस शरीफ़ में जेठ देवर और बहनोई से पर्दा करने की सख्त ताकीद आई है। और जिस तरह मर्दों के लिए साली और भावज से मज़ाक हराम है ऐसे ही औरतों को भी देवर और बहनोई से मज़ाक़ हराम है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 135)

Sunday


बे औलाद मर्दों और औरतों के लिए ज़रूरी हिदायात

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औलाद दुनिया में अल्लाह तआला की बहुत बड़ी नेमत है। लिहाज़ा जिसको अल्लाह तआला यह नेमत अता फरमाये, उसको चाहिए कि वह खुदाए तआला का शुक्र अदा करे और अगर न दे तो सब्र करे। मगर आजकल कुछ मर्द और औरतें औलाद न होने की वजह से परेशान रहते हैं और इस कमी को ज़्यादा महसूस करते हैं। हालाँकि यह अहले ईमान की शान नहीं। मोमिन को दुनिया और उसकी नेमतों के हासिल होने की ज़्यादा फिक्र नहीं करना चाहिए, ज़्यादा फिक्र व ग़म आख़िरत का होना चाहिए। अगर आपने अपनी आख़िरत सुधार ली तो दुनिया की किसी नेमत के न पाने का ज़्यादा गम नहीं करना चाहिए। औलाद अल्लाह तआला की नेमत ज़रूर है लेकिन समझ वालों के लिए यह बात भी काबिले गौर है कि माल और औलाद को अल्लाह जल्ला शानुहु ने अपने क़ुरआनमें दुनिया की रौनक फ़रमाया, आख़िरत की नहीं।

अल्लाह तआला क़ुरआन करीम में इरशाद  फ़रमाता है
तर्जमा -माल और बेटे दुनियवी ज़िन्दगी का सिंगार हैं और बाकी रहने वाली अच्छी बातें हैं, उनका सवाब तुम्हारे रब के यहां बेहतर और वो उम्मीद में सबसे भली।
(सूरह कहफ़ पारा 16 रुकूअ 18)

कुरआने करीम में माल और औलाद को फितना यअनी आज़माइश भी कहा गया है, जिसका मतलब यह है कि इन चीजों को हासिल करके अगर खुदा व रसूल का हक भी अदा करता रहा तब तो ठीक, और माल व औलाद की महब्बत में अल्लाह तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भूल गया ,हराम व हलाल का फर्क खो बैठा तो यह निहायत बुरी चीजें हैं। अलबत्ता नेक औलाद आख़िरत का भी सरमाया है लेकिन आने वाले जमाने में औलाद के नेक होने की उम्मीदें काफी कम हो गई हैं।

खुदाए तआला के महबूब बन्दों यअनी अल्लाह वालों में भी ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जिनके औलाद न थी। सरकारे दो आलम हज़रत रसूले पाक मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सबसे प्यारी बीवी सय्यिदा आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा के भी कोई औलाद न थी। बल्कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ग्यारह बीवियाँ थीं, जिनमें से आपकी औलाद सिर्फ दो से हुई। सहाबा किराम में हज़रते सय्यिदेना बिलाल हबशी रदियल्लाहु अन्हु भी बेऔलाद थे।

हमारे कुछ भाई और बहनें बेऔलाद होने की वजह से हर वक़्त कुढ़ते रहते हैं और ज़िन्दगी भर दवा दारू और दुआ तावीज़ कराते रहते हैं और लूट खसोट मचाने वाले कुछ डाक्टर व हकीम और करने धरने वाले कठमुल्ले और मियाँ फ़कीर ,उनकी कमज़ोरी से खूब फाइदे उठाते,चक्कर लगवाते यहाँ तक की उन्हें बरबाद कर देते हैं ।

और डाक्टर व हकीमों और करने धरने वालों में आजकल मक्कारों, फरेबकारों की तादाद बहुत बढ़ गई है। कुछ टोका टाकी करने वाली और मशविरे देने वाली बूढ़ी औरतें, उन बेचारों को चैन से नहीं बैठने देतीं। और नये नये हकीमों, डाक्टरों और करने धरने वालों के पते बताती रहती हैं। यहाँ से छूटे तो वहाँ पहुँचे और यहाँ से निकले तो वहाँ फंसे। बेचारों की इसी में कट जाती है।

भाईयो! सब्र से बड़ी कोई दवा नहीं और शुक्र से बड़ा कोई तावीज़ नहीं। इससे हमारा मतलब यह नहीं है कि बेऔलाद दुआ और तावीज़ न करें। बल्कि हमारा मकसद यह बताना है कि थोड़ा बहुत इलाज भी करा लें। और अच्छे भले मौलवी, आलिमोंपीरों फकीरों से दुआ तावीज़ भी करा लें, अगर कामयाबी हो जाये तो ठीक, सुब्हानल्लाह! खुदाए तआला मुबारक फ़रमाये। और न हो तो सब्र से काम लें, खुदाए तआला की इबादत, उसका ज़िक्र और कुरआन की तिलावत में ध्यान लगायें। ज़्यादा हकीमों डाक्टरों और करने वालों के दरवाजों के चक्कर न लगायें और इसमें ज़िन्दगी की कीमती घड़ियों को न गंवायें, आखिर होना वही है, जो खुदाए तआला की मर्ज़ी है।

और एक जरूरी बात यह भी है कि अब करीबे कियामत जो ज़माना आ रहा है, उसमें ज़्यादातर औलाद नअहल निकल रही है और तजुर्बा शाहिद है कि अब औलाद से लोगों को सुकून कम ही हासिल होगा ।और अब बुढ़ापे में माँ बाप को कमा कर खिलाने वाले बहुत कम ,न होने के बराबर और नोच नोच कर खाने वाले ज़्यादा पैदा होंगे। आज लाखों की तादाद में साहिबे औलाद बूढ़े और बुढ़ियें सिर्फ इसलिए भीक मांगते घूम रहे हैं कि उनकी औलाद ने जो कुछ उनके पास था, वह या तो ख़त्म कर दिया या अपने कब्ज़े में कर लिया और मां बाप को भीक मांगने के लिए छोड़ दिया। बल्कि बाज़ तो माँ बाप से भीक मंगवा कर खुद खा रहे हैं और अपने बच्चों को खिला रहे हैं। गोया कि अब माँ बाप इसलिए नहीं हैं कि बुढ़ापे में औलाद की कमाई खायें बल्कि इसलिए हैं कि मरते दम तक उन्हें कमा कर खिलायें ख्वाह इसके लिए उन्हें भीक ही क्यूं न मांगना पड़े।

आज कितने लोग हैं कि उनकी ज़िन्दगी चैन व सुकून और शान के साथ कटी। लेकिन औलाद की वजह से बुरे दिन देखने को मिले। किसी को लड़के की वजह से जेल और थाने जाना पड़ा और पुलिस की खरी खोटी सुनना पड़ीं और किसी की जवान लड़की ने नाक कटवा दी और पूरे घर की इज़्ज़त खाक में मिला दी, चार आदमियों में बैठने के लाइक नहीं छोड़ा।

इस सबसे हमारा मकसद यह नहीं है कि औलाद मुतलकन कोई बुरी चीज़ है या बेऔलाद औलाद हासिल करने के लिए बिल्कुल कोशिश न करें। बल्कि बात वही है जो हम लिख चुके कि खुदाए तआला नेक औलाद दे तो, मुबारक! उसका शुक्र अदा करें और न दे तब भी परेशान न हों। मामूली दवा व तदबीर के साथ साथ सब्र व शुक्र ही से काम लें ।

और यह बता देना भी जरूरी है कि बदमज़हब व बददीन या अल्लाह तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और माँ बाप की नाफरमान, बिगड़ी हुई, चोर,डकैत, शराबी, ज़िनाकार, हरामकार,अय्याश व बदमआश औलाद वाला होने से वो लोग बहुत अच्छे हैं, जिनके औलाद नहीं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 126)

Saturday

पीर से पर्दा

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यह बात काफी मशहूर है कि पीर से पर्दा नहीं है हालाँकि असलियत यह है कि पर्दे के मामले में पीरों आलिमों इमामों का अलाहिदा से कोई हुक्म नहीं  ।
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सय्यिदी आलाहज़रत रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं
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पर्दे के मामले में पीर व ग़ैरे पीर हर अजनबी का हुक्म यकसां है जवान औरत को चेहरा खोलकर भी सामने आना मना और बुढ़िया के लिए जिससे एहतिमाल फितना न हो मुज़ाइका (हरज) नहीं ।

(फतावा रज़विया , जिल्द 10 ,सफहा 102)

बेवा औरतों के निकाह को बुरा समझना 

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बेवा औरतों के लिए इस्लाम में निकाह जायज है और लोगों की बदनियती, बदनिगाही और फ़ासिद इरादों और बदकारी से बचने के की नीयत से हो तो बिला शुबहा बाइसे अज्र व सवाब हैं और निकाह करने पर बिला वजह किसी औरत पर लअन-तअन करना उसको बुरा भला कहना या बेवा औरत को मनहूस ख्याल करना सब गुनाह है।
आजकल के माहौल में बदकारो ,ज़िनाकारों ,अय्याशों, होटलों, क्लब घरों और रन्डी खानों में अय्याशी व ज़िनाकारी करने वाले मर्दोंऔर औरतों की कसरत के बावजूद उन्हें कोई कुछ नहीं कहता बल्कि वह नेता काइद और बड़े आदमी कहलाए जा रहे हैं और कोई बेवा औरत  निकाह करे या अधेड़ उम्र का मर्द या कोई मर्द एक से ज़्यादा निकाह करे तो उसको लोग बुरा जानते हैं और मलामत करते हैं यह सब जहालत और इस्लाम से दूरी के नतीजे हैं । निकाह शरई जितने ज्यादा हो उतना बेहतर क्योंकि निकाह बदकारी को मिटाता है ज़िनाकारी और ज़िनाकारों के रास्ते बंद करता है। आजकल लेने देने ,लम्बी बारातो ,जहेज़ की ज़्यादती और रुसूम व रिवाज़ की कसरतों से निकाह शादियां मुश्किल हो गई है इसीलिए बदकारी व ज़िनाकारी बढ़ रही है निकाह को आसान करो ताकि बदकारी मिट जाए।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 85)

जवान लड़के लड़कियों की शादी में देर करना 

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आजकल जवान लड़के लड़कियों को घर में बिठाए रखना और उनकी शादी में ताखीर करना आम हो गया है इस्लामी नुक़्तए नज़र से यह गलत बात है ।

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हदीसे पाक में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम इरशाद फरमाते हैं
जिस की लड़की 12 बरस की उम्र को पहुंचे और वह उसका निकाह ना करें फिर वह लड़की गुनाह में मुब्तला हो तो वह गुनाह उस शख्स पर है (मिश्कात शरीफ सफहा 271)
ऐसी ही हदीस लड़कों के बारे में भी आई है
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आजकल की फुज़ूल रस्मो और बेजा ख़र्चों ने भी शादियों को मुश्किल कर दिया है जिसकी वजह से भी बहुत सी जवान लड़कियां अपने घरों में बैठी हुई है और लड़के मालदारो की लड़कियों की तलाश में बूढ़े हुए जा रहे हैं इन खर्चों पर कंट्रोल करने के लिए जगह-जगह तहरीके चलाने और तन्ज़ीमे बनाने की जरूरत है चाहे वह अपनी अपनी बिरादरी की सतह पर ही काम किया जाए तो कोई हर्ज नहीं । भाइयों ! दौर काम करने का है सिर्फ बातें मिलाने या नारे लगाने और मुशायरे सुनने से कुछ हासिल ना होगा शादी ब्याह में कम से कम खर्च करने का माहौल बनाओ ताकि ज्यादा से ज्यादा मर्द और औरतें शादीशुदा रहे ।

कुछ लोग आला तालीम हासिल कराने के लिए लड़कियों की उम्र ज्यादा कर देते हैं उन्हें वह गैर शादीशुदा रहने पर मजबूर कर देते हैं वह भी निरी हिमाकत और बेवकूफी है ।

आजकल मुसलमानों में कुछ बदमज़हब और बातिल फिरके जवान लड़कियों की आला तालीम के लिए मदारिस और स्कूल खोलने में  बहुत कोशिश कर रहे हैं । उनका मकसद अपने बातिल और मखसूस गैर-इस्लामी अक़ाइद मुसलमानों में फैलाने के अलावा और कुछ नहीं है और इधर लोगों में आजकल औलाद से मोहब्बत इस कदर बढ़ गई है कि हर शख्स कोशिश में है मेरी लड़की मेरा लड़का पता नहीं क्या-क्या बन जाए आला तालीम के नशे सवार है और बनता तो  कोई कुछ नहीं लेकिन अक्सर बुरे दिन देखने को मिलते हैं लड़के ज्यादा पढ़ कर बाप बन रहे हैं लड़कियां माँ बन रही है।

हो सकता है कि हमारी इन बातों से कुछ लोगों को इख्तिलाफ हो मगर हमारा मशवरा यही है लड़कियों को आला तालीम से बाज़ रखा जाये , खासकर जब कि यह तालीम शादी की राह में रुकावट हो और पढ़ने पढ़ाने के चक्कर में अधेड़ कर दिया जाता हो और खासकर गरीब तबके के लोगों में क्योंकि उनके लिए पढ़ी लिखी लड़कियां बोझ बन जाती है क्योंकि उनके लिए शौहर भी ए क्लास और आला घर के होना चाहिए और वह मिल नहीं पाते कोई मिलता भी है तो वह जहेज़ मे मारुती कार मोटरसाइकिल का तालिब है बल्कि बारात से पहले एक दो लाख रूपये का सवाल करता है ।
हिंदुस्तान गवर्नमेंट जो बच्चों को ऊँची तालीम दिलाने पर ज़ोर दे रही है , उसके लिए मेरा मशवरा है कि वह तालीम याफ्ता बच्चों की नौकरी व मुलाज़िमत की ज़िम्मेदारी ले या उनके वज़ीफ़े मुतय्यन करे। खाली पढ़ा  कर छोड़ देना ,न घर का रखा न बाहर का,न खेत का न दफ्तर का। यह गरीबों के साथ ज़ुल्म है और समाज की बर्बादी है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

लडकों की शादी में बजाए वलीमे के मंढ़िया करना

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लड़के की शादी में जो ज़ुफ़ाफ यानी बीवी और शौहर के जमा होने के बाद सुबह को अपनी बिसात के मुताबिक मुसलमानों को खाना खिलाया जाए उसे 'वलीमा' कहते हैं और यह सय्यिदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की मुबारक सुन्नत है काफी हदीसों में इसका ज़िक्र है सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम ने खुद वलीमे किये और सहाबा किराम को भी उस का हुक्म दिया मगर आजकल काफी लोग शादी से पहले दावते करके खाना खिलाते हैं जिसको मंढ़िया कहा जाता है वलीमा ना करना उसकी जगह मंढ़िया करना खिलाफे सुन्नत है मगर लोग रस्मो-रिवाज पर अड़े हुए हैं और अपनी ज़िद और हठधर्मी या नावाकिफी की बुनियाद पर रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की इस मुबारक और प्यारी सुन्नत को छोड़ देते हैं । इस्लाम के इस तरीके में एक बड़ी हिकमत यह है कि अगर निकाह से पहले ही खाना खिला दिया तो हो सकता है किसी वजह से निकाह ना होने पाए और अक्सर ऐसा हो ही जाता है तो इस सूरत में वह निकाह से पहले के तमाम इखराजात बे मकसद और बोझ बनकर रह जाते हैं ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

मुतलक्का की इद्दत कितने दिन है?

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काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि मुतलक्का(जिसे तलाक दी गई हो) की इद्दत तीन  महीने या तीन महीने तेहरा दिन में पूरी हो जाती है यह गलत है। तलाकशुदा औरत की इद्दत यह है कि अगर वह हामिला(गर्भवती) न हो तो तलाक के बाद उसको तीन माहवारी(मासिकधर्म ,हैज़ ,पीरियड) हो जाये, ख्वाह तीन माहवारियाँ तीन महीने से कम में हो जाये या उससे ज्यादा में ख्वाह साल गुज़र जाये अगर तीन बार उसको माहवारी नही हुई तो इद्दत पूरी नहीं होगी। हाँ अगर वह पचपन(55) साल की हो गई हो और महीना आना बंद हो गया हो या नाबालिग हो कि अभी महीना शुरू ही नहीं हुआ या उसको कभी महीना किसी मर्ज़ की वजह से आया ही न हो तो उसकी इद्दत तीन माह है और हामिला की इद्दत बच्चा पैदा होने जाना है ख्वाह तलाक़ के बाद फ़ौरन बच्चा पैदा हो जाये इद्दत हो जायेगी।

खुलासा यह है कि आम तौर से तलाक की इद्दत 3 महीने या 3 महीने 13 दिन समझना गलत है। सही बात वह है जो हमने ऊपर बयान कर दी।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 82)

इद्दत के लिए औरत को मायके में लाना

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आजकल अगर किसी औरत को तलाक हो जाए तो मायके वाले उसको फौरन अपने घर ले जाते हैं बल्कि इस पर फख्र किया जाता है और अगर वह शौहर के घर में रहे तो कुछ लोग उसके मां-बाप और भाइयों को गैरत दिलाते हैं की तलाक़ के बाद भी लड़की को शौहर के घर छोड़ दिया है यह सब गलत बातें हैं

 मसअला यह है की तलाक के बाद भी औरत शौहर के घर में ही इद्दत गुज़ारें और शौहर के ऊपर इद्दत का नान व नफ़का और रहने के लिए मकान देना लाज़िम है।
  क़ुरआन करीम के पारा 28 सूरह तलाक का तर्जमा यह है >"तलाक वाली औरतों को उनके घर से न निकलो न वह खुद निकले मगर जब कि वह खुली हुई बेहयाई करें।"<
हां यह जरूर है कि वह दोनों अजनबी और एक दूसरे के गैर हो कर रहे और बेहतर यह है कि उन के दरमियान कोई बूढ़ी औरत रहे और उनकी देखभाल रखें और यह भी हो सकता है कि शौहर घर में न रहे ख़ास कर रात को कहीं और सोये। औरत के हाथ का पका हुआ खाना खाने में कोई हर्ज नहीं है शौहर के कपड़े  बगैरा  धोना भी तलाक़ के बाद कोई गुनाह नहीं है क्योंकि बादे तलाक वह अगरचे बीवी नहीं मगर एक मुसलमान औरत है और शरई हुदूद की पाबंदी के साथ एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान के काम में आ जाना हुस्ने अखलाक है और अच्छी बात है।

यह जो कुछ जगह लोग इतनी सख्ती करते हैं कि बादे तलाक इद्दत में अगर शौहर बीवी के हाथ का पका हुआ खाना भी खा ले तो हुक़्क़ा पानी बन्द कर देते हैं, यह गलत है। जब तक खूब यकीन से मालूम न हो कि वो मियां बीवी की तरह मख़सूस मुआमलात करते हैं सिर्फ शुकूक की वजह से उन्हें तंग न किया जाये और बदगुमानी इस्लाम में गुनाह है।

हाँ अगर तलाक ए मुगल्लज़ा या बाइना की इद्दत हो और शौहर फ़ासिक़ ,बदकार हो  और कोई वहां ऐसा ना हो कि अगर शौहर की नियत खराब हो तो उसको रोक सके तो औरत के लिए उस घर को छोड़ देने का हुक्म है ।
(फतावा फैज़ुर्रसूल ,जिल्द 2 सफ़हा 290)

क्या औरत के बीस बच्चे हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है?

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औरत के बीस बच्चे हो जाए तो उसका निकाह टूट जाता है यह एक आमियाना और खालिस जाहिलाना ख्याल है । सही बात यह है कि बच्चे बीस हो जाए या इससे भी ज्यादा उसके निकाह पर कोई फर्क नहीं पड़ता और पहला निकाह बाकी रहता है । दोबारा निकाह की कोई ज़रूरत नहीं है ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 80)


जिस औरत के ज़िना का हमल हो उससे निकाह
जाइज़ है

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ज़ानिया हामिला यानी वह औरत जो बिना निकाह किए ही गर्भवती हो गई हो उससे निकाह को कुछ लोग नाजायज़ समझते हैं हालांकि वह जाइज़ है । ज़िना इस्लाम में बहुत बड़ा गुनाह है और इसकी सज़ा बहुत सख्त है लेकिन अगर किसी औरत से ज़िनाकारी सरज़द हुई , उससे निकाह किया जाये तो निकाह सही हो जाएगा,ख्वाह वह ज़िना से हामला हो गई हो जबकि वह औरत शौहर वाली न हो और निकाह अगर उसी शख्स से हो जिसका हमल है तो निकाह के बाद वह दोनों साथ रह सकते हैं , सुहबत व हमबिस्तरी भी कर सकते हैं और किसी दूसरे से निकाह हो तो जब तक बच्चा पैदा न हो जाए दोनों लोगों को अलग रखा जाए और उनके लिए हमबिस्तरी जाएज़ नहीं ।

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इमामे अहले सुन्नत सय्यिदी आला हजरत फरमाते हैं
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जो औरत मआज़ल्लाह ज़िना से हामिला हो उससे निकाह सही है  ख्वाह उस ज़ानी से हो या गैर से फ़र्क़ इतना है अगर ज़ानी  से निकाह हो तो वह बादे निकाह उससे कुर्बत भी कर सकता है और गैर ज़ानी से हो तो वज़ए हमल तक( बच्चा पैदा होने तक) कुर्बत न करे।

( फतावा रज़विया जिल्द 5 ,सफ़हा 199, फतावा अफ्रीका ,सफ़हा 15)

क्या शौहर के बीवी को हाथ लगाने से पहले महर माफ कराना ज़रूरी है

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काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि शौहर के लिए ज़रूरी है कि निकाह के बाद पहली मुलाकात में अपनी बीवी से पहले महर माफ कराये फिर उसके जिस्म को हाथ लगाए यह एक गलत ख्याल है इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं । महर माफ कराने की कोई ज़रूरत नहीं। आजकल जो महर राइज है, उसे 'गैर मुअज़्ज़ल' कहते हैं जो या तो तलाक देने या फिर दोनों में से किसी एक की मौत पर देना वाजिब होता है । इससे पहले देना वाजिब नहीं हां अगर पहले दे दे तो कोई हर्ज नहीं बल्कि निहायत ही उम्दा बात है । माफ करने की कोई ज़रूरत नहीं और महर माफ कराने के लिए बाँधा नहीं जाता है । अब दे या फिर दे, वह देने के लिए  है,माफ कराने के लिए नहीं ।
 
हाँ अगर महर 'मुअज़्ज़ल' हो यानी निकाह के वक़्त देना तय कर लिया गया हो तो बीवी को इख्तियार है कि वह अगर चाहे तो बगैर महर वसूल किए खुद को उसके काबू दे ना दे और उसको हाथ ना लगा दे और चाहे तो बगेर महर लिए भी उसको यह सब करने दे , माफ कराने का यहां भी कोई मतलब नहीं ।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 79)


समधन चाची और ममानी से निक़ाह

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कुछ लोग समधन चाची और मुमानी से  निक़ाह को हराम जानते हैं हालांकि समधन से निकाह बिला शक जाइज़ है , यूं ही चाची और मुमानी से भी निकाह में कोई हर्ज नहीं जबकि उनके शौहरों ने उन्हें तलाक दे दी हो या वो मर चुके हैं और इद्दत के बाद समधन चाची और मुमानी से निकाह जाइज़ है ।  जो लोग इन निकाहों को हराम जानते हैं , वह जाहिल है ।

हवाले के लिए देखिए ⤵
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(मलफूज़ाते आला हज़रत अलैहिर्रहमा जिल्द सोएम सफ़हा 10 और फतावा अफ्रीका सफ़हा 100)

क्या हालत ए हमल में तलाक नहीं होती?

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हमल की हालत में तलाक़ वाकेअ हो जाती है यह जो कुछ लोग समझते हैं कि औरत हमल से हो और उस हालत में शौहर तलाक़ दे तो तलाक़ वाकेअ नहीं होती यह उनकी गलतफहमी है ।

सय्यिदी आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत इरशाद फरमाते हैं >>जाइज़ व हलाल है अय्यामे हमल मे दी गई हो । (फतावा रज़विया जिल्द 5 सफहा 625)


क्या तलाक के लिए औरत का सामने होना या सुनना ज़रूरी है?

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कुछ लोग समझते हैं कि शौहर अगर बीवी को तलाक दे तो तलाक के अल्फाज का औरत के लिए सुनना और औरत का तलाक के वक्त सामने होना जरूरी है यह गलतफहमी है औरत अगर ना सुने और वहां मौजूद भी ना हो तब भी शौहर के तलाक देने से तलाक हो जाएगी चाहे शौहर बीवी में हजारों मील का फासला हो ।

आला हजरत इमाम अहले सुन्नत सय्यिदी शाह अहमद रज़ा खाँ साहब रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं>

तलाक के लिए औरत का वहां हाज़िर होना कोई शर्त नहीं ।
(फतावा रज़विया , जिल्द 5 , सफहा 618)



निकाह पढ़ाने में ईजाब व कुबूल के बाद खुतबा पढ़ना

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 यह रिवाज़ भी गलत है सुन्नत यह है कि ख़ुतबए  निकाह  ईजाब कबूल से पहले पढ़ा जाए।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 77)


शरअ पयम्बरी महर मुकर्रर करना

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कभी-कभी कुछ जगहों पर निकाह में महर शरअ पयम्बरी मुकर्रर किया जाता है और उससे उनकी मुराद  चौसठ रुपये और दस आने होती है या कोई और रकम। हालांकि यह सब यह सब बातें हैं शरीयत ए पैगम्बरे आज़म सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने महर में ज़्यादती की कोई हद मुकर्रर नहीं की है जितने पर दोनों में फरीक मुत्त्तफिक़ हो जाए वही महर शरए पयम्बरी है हां कम से कम महर की मिकदार दस दिरहम यानी तकरीबन दो तोले तेरह आने भर चांदी है उससे कम महर सही नहीं  अगर बांधा गया तो महरे मिस्ल लाज़िम आएगा । और  बाज़ लोग महर शरअ पयम्बरी से सय्यिदितुना फातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा के अक़दे  मुबारक का महर ख्याल करते हैं हालांकि खातूने जन्नत के निकाहे मुबारक का महर चार सौ मिस्काल यानी डेढ़ सौ तोले चांदी था।

     खुलासा यह की शरअ की तरफ से महर की कोई रकम मुकर्रर नहीं की गई । हाँ यह ज़रुर है कि दस दिरहम यानी दो तोले तेरह आने भर चांदी से कम कीमत न हो।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 76)


तीन तलाकों का रिवाज़

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आजकल अज़ रूए जहालत व नादानी अपनी औरतों को तीन या उससे ज़्यादा तलाक दे डालते हैं या काग़ज़ों में लिखवा देते हैं और फिर कभी बात को दोबारा बनाने के लिए उसकी सजा यानी हलाले से बचने लिए झूट सच बोलते और मुफ़्तीयाने किराम और उल्मा दीन को परेशान करते है ।
काश यह लोग तलाक से पहले ही उलमा से मशवरा कर लें तो यह नौबत ही न आए । तीन तलाक़ एक वक़्त देना गुनाह है I तलाक का मकसद सिर्फ यह है कि बीवी को अपने निकाह से बाहर करके दूसरे के लिए हलाल करना कि इद्दत के बाद वह किसी और से निकाह कर सके यह मक़सद सिर्फ एक तलाक या दो से भी हासिल हो जाता है I एक तलाक देकर उसको इद्दत गुजरने के लिए छोड दिया जाए और इद्दत केअन्दर उसको एक अजनबी व गैर औरत की तरह रखा जाए और जबान से भी रजअत न की जाए तो इद्दत के बाद वह दूसरे से भी निकाह कर सकती है और पहले शौहर के निकाह में भी सिर्फ निकाह करने से,बगैर हलाले के वापस आ सकती है । और तीन तलाको के गुनाह व बबाल से भी बचा जा सकता है । ज़रूरत के वक़्त तलाकइस्लाम में मशरूअ हैं क्यूंकि मिया बीवी का रिश्ता कोई पैदाइशी खूनी और फितरी रिश्ता नहीं होता बल्कि यह तअल्लुक अमूमन  जवानी में काइम होता है । तो यह जरूरी नहीं कि यह महब्बत काइम हो ही जाए बल्कि मिजाज़ अपने अपने आदतें अपनी अपनी तौर तरीके अपने अपने ख्यालात व रुजहानात अलग अलग होने की सूरत में बजाए महब्बत के नफरत पैदा हो जाती है और एक दुसरे के  साथ जिन्दगी गुजारना निहायत मुश्किल बल्कि कभी कभी नामुमकिन हो जाता है ।और नौबत रात दिन के झगडो, मारपीट यहाँ  तक कि कभी क़त्ल व खूंरेजी तक आ जाती है I बीवी शौहर एक दूसरे के लिए जानी दुश्मन बन जाते हैं तो इन हालात के पेशे नज़र इस्लाम में तलाक रखी गई कि लड़ाईयों,झगड़ों, नफरतों , और मारका आराईयों के बजाए सुलह व सफाई और हुस्न व खूबी के साथ अपना अपना रास्ता अलग अलग कर  लिया जाए ।

    इसी लिए जिन मज़हबों और धर्मो में तलाक नहीं है यानी जिसके साथ जो बँध गया वह हमेशा के लिए बँध गया जान छुडाने का कोई रास्ता नहीं । औरतों के क़त्ल तक कर दिये जाते हैं या जिन्दगीं चैन व सुकन के बजाए अजाब बनी रहती है । आज औरतों की हमदर्दी के नाम पर कछ इस्लाम दुश्मन ताकतें ऐसे कानून बना रही हैं जिनकी रू से तलाक का वुजूद मिट जाए और कोई तलाक न दे सकें यह लोग औरतो के हमदर्द नही बल्कि उनका क़त्ल कर रहे हैं । आज मिट्टी के तेल बदन पर डाल कर औरतों को जलाने, पानी में डुबोने, ज़हर खिला कर उनको मारने वगैरा ईज़ारसानी के ख़ौफ़नाक वाक़िआत ज़िम्मेदार वही लोग हैं जो किसी भी सूरते हाल में तलाक़ के रवादार नहीं और जब से हर हाल में तलाक को ऐब और बुरा जानने का रिवाज़ बढ़ा तभी से ऐसे दर्दनाक वाकिआत कीतादाद बढ गई ।
  हम पूछते हैं क्या किसी औरत को मारना, जलाना, डुबोना, बेरहमी से पीटना बेहतर है या उसको महर की रकम देकर साथ इज्जत के तलाक दे देना और किसी औरत के लिए अपने शौहर को किसी तरह राज़ी करके उस से तलाक हासिल  कर लेना और अपनी आज़ादी कराके किसी और से निकाह कर लेना बेहतर है  या यारों , दोस्तों, आशनाओ से मिल कर शौहर को क़त्ल कराना। आज इस किस्म  के  वाकिआत व हादसात की ज़्यादती है जिनका अन्दाज़ा अखबारात का मुतालआ करने से होता है और अगर मुआशरे को बरकरार रखने के लिए इस्लाम ने शौहर और बीवी के जो हुकक बताए हैं उन पर अमल किया जाए तो यह नौबतें न आयें और लडाई झगड़े और तलाक तक बात ही न पहुँचे।

(गतल फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 74)