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Thursday

क्या कब्र पर तख्ते रखने में मर्द व औरत में फर्क है?

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कुछ लोग पूछते हैं कि मय्यत को कब्र में रखने के बाद अगर मर्द हो तो तख़्ते लगाना किधर से शुरू करना चाहिए सिरहाने या पाइंती से और औरत के लिए किधर से मसअला यह है कि मर्द हो या औरत तख़्ते सिरहाने से लगाना शुरू करें और दोनों में फर्क समझना गलती है।
(फतावा मुस्तफविया स.271 मतबूआ रज़ा एकेडमी मम्बई)
यानी दोनों के तख्ते सिरहाने से शुरू किये जायें।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 187)

औरत का कफ़न मैके वालों के ज़िम्मे लाज़िम समझना

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यह एक गलत रिवाज़ है l यहॉ तक कि कुछ जगह मैके वाले अगर नादार व गरीब हों तब भी औरत का कफन उनको देना जरूरी ख्याल किया जाता है और उनसे जबरदस्ती लिया जाता हैं और उन्हें ख्वाह सताया जाता है  हालाकि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है ।
मसअला यह है कि मय्यत का कफन अगर मय्यत ने माल न छोडा हो तो जिन्दगी में जिसके ज़िम्मे उसका नान व नफका  था वह कफ़न दे और औरत के बारे में  खास तौर से यह है कि उसने अगरचे माल छोडा भी हो तो तब भी उसका कफन शौहर के जिम्मे है I (बहारें शरीअत हिस्सा 4 सफहा 139)
खुलासा यह है कि औरत का कफन या दूसरे खर्चे मैके वालों के ज़िम्मे ही लाज़िम ख्याल करना और बहरहाल उनसे दिलवाना, एक गलत रिवाज़ है, जिसको मिटाना ज़रूरी है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 59)

मय्यत के बाद और बच्चे की पैदाइश के बाद पूरे घर की पुताई सफाई को ज़रूरी समझना

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कुछ लोग घर में मय्यत हो जाने या बच्चा पैदा होने के बाद घर की पुताई कराते हैं और समझते है कि घर नापाक हो गया उसकी धुलाई सफाई और पुताई कराना ज़रूरी है I हालाकि यह उनकी गलतफ़हमी है और इस्लाम में ज्यादती हैI यूँ पुताई सफाई अच्छी चीज है ,जब ज़रूरत समझे करायें लेकिन क्या पैदा होने या मय्यत हो जाने की क्या वजह से उसको कराना और लाजिम जानना जाहिलों वाली बातें हैं, जिन्हें समाज से दूर करना जरूरी है ।
 (गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 60)

मय्यत के सर में कंघी करना

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कुछ जगह मय्यत को ग़ुस्ल देने के बाद तजहीज़ व तकफीन के वक़्त उसके बालों में कंघी करने लगता हैं, यह मना हैं कि हज़रते सय्यदिना आइशा सिद्दिक़ा रदियल्लाहु अन्हा से मय्यत के सर में कंघी करने के बारे में सवाल किया गया तो आपने मना फ़रमाया कि क्यूँ अपनी मय्यत को तकलीफ पहुँचाते हो।
(फतावा रज़विया ,जिल्द 4,सफहा 33,बहवाला किताब उल आसार इमाम मुहम्मद)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 60)

Wednesday

नमाज़े जनाज़ा में तकबीर के वक़्त आसमान की तरफ मुँह उठाना

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आजकल काफी लोग ऐसा करते हुए देखे गए हैं कि जब नमाज़े जनाज़ा में तकबीर कही जाती है तो हर तकबीर के वक़्त ऊपर की जानिब मुँह उठाते हैं हालाकिं इसकी कोई अस्ल नही बल्कि नमाज में आसमानकी तरफ़ मुह उठाना मकरूहे तहरीमी है l (बहारे शरीअत) और हदीस शरीफ में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया* क्या हाल है उन लोगों का जो नमाज़ में आसमान की तरफ आँखे उठाते हैं इससे बाज़ रहें या उनकी आँखें उचक ली जायेगी* ।
(मिश्कात ब हवाला सहीह मुस्लिम सफ़हा 90)
खुलासा यह कि नमाज़े जनाज़ा हो या कोई और नमाज़ कसदन आसमान की तरफ नज़र उठाना मकरुह है और नमाज़े जनाज़ा मे तकबीर वक़्त ऊपर को नज़र उठाने का जो रिवाज़ पड़ गया है यह गलत है, बे अस्ल है ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 

मय्यत का खाना

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मय्यत के तीजे, दसवें या चालीसवें वगैरहा के मौके पर दावत करके  खाना खिलाने का जो रिवाज है यह भी महज़ गलत है और खिलाफे शरअ है I हाँ गरीबों और  फकीरों को बुलाकर खिलाने में हरज नही । *आला हज़रत फरमाते हैं मुर्दे का खाना सिर्फ फकीरो के लिए है आम दावत के तौर पर जो करते है यह मना है गनी न खाए*।
(अहकामे शरीअत , हिस्सा दोम, सफ'हा 16 )

*और फरमाते हैं मौत में दावत बे मअना है फ़तहुल कदीर में इसे बिदअते मुसतकबहा फरमाया* I

(फतावा रजविया, जिल्द 4 ,सफहा 221)

शौहर का बीवी के जनाज़े को उठाना

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अवाम में यह ग़लत मशहूर है कि शौहर बीवी के मरने के बाद न देख सकता है न उसके जनाज़े को हाथ लगा सकता है और न कान्धा दे सकता है I

सही बात यह है कि शौहर के लिए अपनी बीवी को मरने वो बाद देखना भी जाइज़ है और उसके जनाज़े को उठाना और कान्धा देना, कब्र में उतारना भी जाइज है । (फतावा रज़विया, जिल्द 4, सफहा, 91)

मय्यत को ग़ुस्ल देने के बाद ग़ुस्ल करना

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मय्यत को गुस्ल देने के बाद गुस्ल करना अच्छा है लेकिन जरूरी नहीं कि जिस ने मय्यत को गुस्ल दिया हो वह बाद में खुद गुस्ल करे इसको जरूरी ख्याल करना गलत है ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 19)

नमाज़े जनाज़ा के बाद उसी वुज़ू से दूसरी नमाज़ पढ़ना कैसा है? 

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कुछ जगहों पर लोग समझते हैं कि जिस वुज़ू नमाज़ जनाज़ा पढ़ी हो उससे दूसरी नमाज़ नही पढ़ी जा सकती हालांकि यह गलत और बे-अस्ल बात है। बल्कि इसी वुज़ू से फ़र्ज़ हो या सुन्नत व नफ्ल हर नमाज़ पढ़ना ठीक है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 19)

Tuesday

हिजड़े की नमाज़े जनाज़ा

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कुछ लोग हिजड़े की नमाज़े जनाज़ा पढ़ने न पढ़ने के बारे शक करते हैं कि पढ़ना जाइज़ है या नहीं तो मसअला यह है कि हिजड़ा अगर मुसलमान है तो उस की नमाज़े जनाज़ा पढी जायेगी और उस को मुसलमानों के कब्ररिस्तान में दफन किया जायेगा।
कुछ लोग पूछते हैं कि हिजड़े की नमाज़ की नियत और उस में जो दुआ पढ़ी जायेगी वह मरदों वाली हो या औरतों वाली शायद उन लोगों को यह मालूम नहीं कि मरदों और औरतों की नमाज़े जनाज़ा और उस की नियत में कोई फर्क नहीं दोनों का तरीका एक ही है और वहीं तरीका हिजड़े के लिए भी रहेगा। हाँ नाबालिग बच्चे और बच्ची की दुआ में फर्क है और वह बहुत मामूली ज़मीरों का फर्क है तो अगर हिजड़ा नाबालिग बच्चा हो तो उस के लिए लड़के वाली दुआ पढ़ दें या लड़की वाली हर तरह नमाज दुरूस्त हो जायेगी ।
(फतावा रज़विया जदीद ज•9 ,स•74 ,फतावा बहरुल उलूम जि•5 ,स•174)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 185)

जूते चप्पल पर खड़े हो कर जनाज़े की नमाज़ पढ़ने का मअसला

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जनाज़े की नमाज़ आम तौर पर खाली पडे रास्तों और खेतों मैदानों वगैरा में पढ़ी जातीहै। कुछ लोग इन ज़मीनों को नापाक ख्याल करते हुये जूते चप्पल उतार उन पर खड़े हो कर नमाज़ अदा कर लेते हैं तो ऐसा करना जाइज़ बल्कि बेहतर है और नमाज़ दुरूस्त हो जायेगी किसी चीज़ मिटटी,कपड़े,बदन ज़मीन वगैरा के पाक और नापाक होने की तीन सूरतें हैं।
1- यकीन से पता है कि वह पाक है।
2- यकीन से पता है कि वह नापाक है।
3- इस के पाक और नापाक होने में शक है। पता नहीं
कि पाक है या नापाक है।
 पहली सूरत में तो वह पाक है ही लेकिन तीसरी सूरत में भी जब कि उसके पाक और नापाक होने में शक हो तब भी इस को पाक माना जायेगा नापाक नहीं,नापाक तभी कहेंगे जब नापाकी का यकीन हो या गालिबे गुमान।
कोई भी ज़मीन जब तक इस के नापाक होने का पता न हो वह पाक कहलायेगी आप इस पर खड़े हो कर बगैर कुछ बिछाये भी नमाज़ पढ़ सकते हैं।
जूते का तला भी जब खूब पता हो कि इस पर कोई नापाक चीज़ लगी है तभी उस को नापाक कहा जायेगा। सिर्फ शक व शुब्ह की बिना पर नापाक नहीं कहा जा।सकता जूते के तला पाक हो सकता है उलमा-ए-किराम ने फरमाया कि जूते की तले पर अगर कोई नापाक चीज़ लगी भी हो, उस को पहन कर चला। घास या मिटटी पर कुछ देर चलने से जो रगढ़ पैदा हुई उस से भी जूते का तला पाक हो सकता है।
अब इस सिलसिले में मसाइल की तफ़सील हस्बे
ज़ैल है।
ज़मीन अगर नापाक है यानी उस के नापाक होने का यकीन है उस के ऊपर नंगे पैर खड़े हो कर बगैर कुछ बिछाये नमाज़ पढ़ी नमाज़ नहीं होगी।
ज़मीन अगर पाक है या उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि पाक है या नापाक तो उस पर बगैर कुछ बिछाये नंगे पैर खड़े हो कर नमाज़ पढ़ी जा सकती है।
ज़मीन नापाक है लेकिन जूते पहन कर नमाज़ पढी और जूते का तला पाक है नमाज़ सही हो जायेगी।
 ज़मीन भी नापाक है जूते का तला भी नापाक है। लेकिन जूते उतार कर उन पर खड़े हो कर नमाज़ पढ़ी नमाज़ हो जायेगी क्योंकि अब उस नापाकी का बदन जिस्म से कोई तअल्लुक नहीं और अगर पहने हो तो वह नापाकी जिस्म का हिस्सा मानी जायेगी।
खुलासा यह है कि ज्यादा एहतियात उसी में है कि जूते उतार कर उन पर खड़े हो कर नमाज अदा करे यह सब से बेहतर और मुहतात तरीका है।
आला हज़रत फरमाते हैं: ।
अगर वह जगह पेशाब वगैरा से नापाक थी या जिस
के जूतों के तले नापाक थे और उस हालत में जूता पहने हुये नमाज़ पढ़ी उन की नमाज़ न हई। एहतियात यही है।
कि जूता उतार कर उस पर पाव रख कर नमाज़ पढ़ी जाये। कि ज़मीन या तला अगर नापाक हो तो नमाज़ में खलल न
आये ।(फतावा रज़विया जदीद 9/188)
और एक मकाम पर लिखते हैं।
अगर कोई शख्स बहालते नमाज निजासत पर खड़ा हुआ और उसके दोनों पैरों में जूते या जुराबे हैं तो उसकी नमाज़ सही न होगी और अगर यह चीज़ें जुदा है तो हो जाएगी । (फ़तावा रज़विया जदीद 962)
  एक जगह लिखते हैं :- शुबह से कोई चीज़ नापाक नहीं होती कि असल तहारत है।
   ( फतावा रज़विया जदीद जि•4,स•394)
   (गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 183)

Saturday

ईदगाह में नमाज़े जनाज़ा पढ़ने का मसअला

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मस्जिद में जनाज़े की नमाज पढना मकरूह व नाजाइज़ है । 
हदीस शरीफ में है :- हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो मस्जिद में नमाज़ जनाज़ा पढे उसके लिए कुछ सवाब में नही ।  (अबूदाऊद किताबुल , जनाइज़ ,बाबुस्सलात अलल जनाज़ा ,फिल मस्जिद, सफहा 454)
हाँ सख्त बारिश आंधी तूफान वगैरा किसी मजबूरी के वक़्त मस्जिद में भी पढना जाइज़ है जब कि ईदगाह, मदरसा, मुसाफिर खाना वगैरा कोई और जगह न हो । हज़रत अल्लामा सय्यिद अहमद तहतावी रहमतुल्लाहि तआला अलैह फरमाते हैं :
जो मस्जिद सिर्फ नमाज़े जनाज़ा ही पढने को लिए बनाई गई हो वहाँ यह नमाज मकरूह नहीं यानी जाइज़ है । यूही मदरसे और ईदगाह में नमाज़े जनाज़ा पढना जाइज़  है । (तहतावी अला मराकिल फलाह मतबूआ कुस्तुन्तिया सफ़हा 326  )
और मौलाना मुफ़्त्ती जलालुद्दीन साहब अमजदी फरमाते हैं :-
"नमाज जनाजा ईदगाह के इहाते और मदरसे में भी पढी जा सकती है ।" (फतावा फैज़ुर्रसूल , जिल्द 1 , सफहा 446 )
लिहाजा जो लोग ईदगाह में नमाज़ जनाज़ा पढते हुए झिझक  महसूस करते हैं वह बिला खौफ बे झिझक वहाँ नमाज़े जनाज़ा पढ़ा करें ।