Saturday

ईदगाह में नमाज़े जनाज़ा पढ़ने का मसअला

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मस्जिद में जनाज़े की नमाज पढना मकरूह व नाजाइज़ है । 
हदीस शरीफ में है :- हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो मस्जिद में नमाज़ जनाज़ा पढे उसके लिए कुछ सवाब में नही ।  (अबूदाऊद किताबुल , जनाइज़ ,बाबुस्सलात अलल जनाज़ा ,फिल मस्जिद, सफहा 454)
हाँ सख्त बारिश आंधी तूफान वगैरा किसी मजबूरी के वक़्त मस्जिद में भी पढना जाइज़ है जब कि ईदगाह, मदरसा, मुसाफिर खाना वगैरा कोई और जगह न हो । हज़रत अल्लामा सय्यिद अहमद तहतावी रहमतुल्लाहि तआला अलैह फरमाते हैं :
जो मस्जिद सिर्फ नमाज़े जनाज़ा ही पढने को लिए बनाई गई हो वहाँ यह नमाज मकरूह नहीं यानी जाइज़ है । यूही मदरसे और ईदगाह में नमाज़े जनाज़ा पढना जाइज़  है । (तहतावी अला मराकिल फलाह मतबूआ कुस्तुन्तिया सफ़हा 326  )
और मौलाना मुफ़्त्ती जलालुद्दीन साहब अमजदी फरमाते हैं :-
"नमाज जनाजा ईदगाह के इहाते और मदरसे में भी पढी जा सकती है ।" (फतावा फैज़ुर्रसूल , जिल्द 1 , सफहा 446 )
लिहाजा जो लोग ईदगाह में नमाज़ जनाज़ा पढते हुए झिझक  महसूस करते हैं वह बिला खौफ बे झिझक वहाँ नमाज़े जनाज़ा पढ़ा करें ।


मस्जिदों को सजाना और इमामों को सताना

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आजकल काफी देखा गया है  कि लोग मस्जिदों को सजाने सँवारने में खूब पैसा खर्च करते हैं और इमामों , मौलवियों को सताते ,उन्हें तंग और परेशान रखते हैं ,और कम से कम पैसो में काम चलाना चाहते हैं । जिसकी वजह से वह सजी , सँवरी , खूबसूरत मस्जिदें कभी कभी वीरान सी हो जाती हैं और उनमें वक़्त पर अज़ान व नमाज, नहीं हो पाती । 
इस बयान से हमारा मक़सद यह नहीं है कि मस्जिदों को सजाना और खूबसूरत बनाना मना है । बल्कि यह बताना है कि किसी भी मस्जिद की अस्ली खूबसूरती यह है फि उसमें दीनदार, खुदाए तआला का खौफ़ रखने वाला, लोगों को हुस्न व खूबी और हिकमत व दानाई के साथ दीन की बातें बताने याला आलिमे दीन इमामत करता हो चाहे वह मस्जिद कच्ची और सादा सी इमारत हो । किसी मस्जिद के लिए अगर नेक और सही इमाम मिल जाये तो लोगों को चाहिए किं उसको हर तरह खुश रखें, उसका खूब ख्याल रखें । बल्कि पीरों से भी ज्यादा, आलिमों, मौलवियों, इमामों और मुदर्रेसीन का ख्याल रखा जाये क्यूँकि दीन की बका और इस्लाम की हिफाज़त इल्म वालों से है । अगर इमामों और मौलवियों को परेशान रखा गया तो वो दिन दूर नहीं कि मस्जिदें और  मदरसे या तो वीरान हो जायेंगे या उनमें सबसे घटिया किस्म के लोग इमामतें करेंगे और बच्चों को पढायेंगे । अच्छे घरानों और अच्छे ज़हन व फिक्र वाले लोग इस लाइन से दूर हो जायेंगे ।
खुलासा यह कि आलिमों और मौलवियों को चाहिए वो पैसे और माल व दौलत का लालच किये बगैर दीन की खिदमत करें और कौम को चाहिए कि वह अपने आलिमों, मौलवियों और  दीन की खिदमत करने वालों को खुशहाल रखें । उन्हें तंगदस्त और परेशान न होने दे और हमारी राय में आजकल शादीशुदा बैरूनी (बाहर के) इमामों के लिए रिहाइशी मकानों का बन्दोबस्त कर देना निहायत ज़रूरी है ताकि उन्हें बार बार घर न भगाना पड़े और वो नमाज़ों को पढ़ाने में पाबन्दी कर सकें और अंगुश्तनुमाईयों ,बदगुमानियों से महफूज़ रहे ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 50)


कमसिन बच्चों को मस्जिद में लाना

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ज़्यादा छोटे ना समझ कमसिन बच्चों का मस्जिद मे आना  या उन्हें लाना शरअन नापसन्दीदा, नाजाइज़ व मकरूह है । कुछ लोग औलाद से बे जा महब्बत करने वाले नमाज़ के लिए मस्जिद में आते हैं तो अपने साथ कमसिन नासमझ बच्चों को भी लाते हैं । यहाँ तक कि बाज़ लोग उन्हें अगली सफों मे अपने बराबर नमाज़ में खड़ा कर लेते हैं यह तो निहायत गलत बात है और इससे पिछली सफों के सारे नमाज़ियों की नमाज़ मकरुह होती है और उसका गुनाह उस लाने वाले और बराबर में खड़ा करने वाले पर है और उन पर जो उससे हत्तल मकदूर मना न करें । हाँ जो समझदार होशियार बच्चे हों नमाज़ के आदाब से वाकिफ , पाकी और नापाकी को जानते हो उनको आना चहिये। और ज़्यादा छोटे जो नमाज़ को भी एक तरह का खेल समझते और मस्जिद में शोर मचाते खुद भी नहीं पढ़ते और दूसरों की भी नमाज़ खराब करते हैं ऐसे बच्चों को सख्ती के साथ मस्जिद में आने से रोकना ज़रूरी है ।
हदीस में है फ़रमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने:
"अपनी मस्जिदों को बचाओ बच्चों से पागलों से खरीदने और बेचने से और झगड़े करने से और ज़ोर ज़ोर से बोलने से। (इब्ने माजा,बाब मा यकरहु फिल मस्जिद, सफहा 55)

सदरुश्शरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब आजमी रहमतुल्लाहि तआला अलैह लिखते हैं :
बच्चे और पागल को जिन , से नजासत का गुमान हो मस्जिद में ले जाना हराम है वरना मकरुह।"
(बहारे शरीअत, हिस्सा सोम, सफहा 182)
कुछ लोग कहते हैं कि बच्चे मस्जिद में नहीं आयेंगे तो नमाज़ सीखेंगे कैसे तो भाईयो समझदार बच्चों के सीखने के  लिए मस्जिद है और नासमझ ज्यादा छोटे बच्चों के लिए घर और मदरसे हैं । और हदीसे रसूल के आगे अपनी नहीं चलाना चाहिए ।


नमाज़ में कुहनियाँ खुली रखना

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बिला मजबूरी कुहनियाँ खोल कर जैसे आजकल आधी आस्तीन की शर्ट पहन का कुछ लोग नमाज़  अदा करते है । यह मकरूह है और ऐसी नमाज़ को लौटाने का हुक्म है ।

(फतावा रज़विया, जिल्द 3, सफहा, 416)

और जो लोग आस्तीन चढा कर और कुहनियॉ खोल कर नमाज़ अदा करते हैं उन पर दो गुनाह होते हैं एक कपड़ा समेटने और चढाने का और दूसरा कहनियाँ खुली रखने का क्यूकि नमाज़ में कपड़ा चढाना मना है जैसे क्या लोग सज्दे में जाते वक़्त दोनों हाथों से पाजामे के पायेंचे को पकड़ कर चढ़ाते हैं, यह भी नाजाइज़ व गुनाह है । इस किस्म के नमाज़ियों को प्यार व महब्बत से समझाते रहना चाहिए या बजाय एक एक को टोकने और रोकने के, सबको इकठ्ठा करके मसअला बता दिया ताकि कोई अपनी तौहीन महसूस न करे क्यूँकि आजकल दीनी बातों पर टोका जाये तो लोगों में तौहीन महसूस करने की बीमारी पैदा हो गई है।

Friday


क्या जमाअत से नमाज़ पढ़ने वाले को इमाम के साथ दुआ मांगना भी ज़रूरी है?

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हर नमाज़ सलाम फेरने पर मुकम्मल हो जाती है उसके बाद जो दुआ मांगी जाती है यह नमाज़ में दाखिल नहीं । अगर कोई शख्स नमाज़ पढने यानी सलाम फेरने के बाद बिल्कुल दुआ न मांगने तब भी उसकी नमाज़ में कमी नहीं । अलबत्ता एक फ़जीलत से महरूमी और सुन्नत की खिलाफ़ वर्ज़ी है । कुछ जगह देखा गया कि इमाम लोग बहुत लम्बी लम्बी दुआयें पढते हैं और मुक़तदी कुछ खुशी के साथ और कुछ बे रगबती से मजबूरन उनका साथ निबाहते हैं ।और कोई वगैर दुआ मांगे या थोडी दुआ मांग कर इमाम साहब का  पूरा साथ दिये बगैर चला जाए तो उस पर एतराज करते हैं और बुरा जानते हैं I ‘यह सब उनकी गलतफहमियां हैं इमाम के साथ दुआ मांगना मुकतदी के ऊपर हरगिज लाज़िम व जरूरी नहीं वह नमाज़ पूरी होने के बाद फ़ौरन मुख्तसर दुआ मांगकर भी जा सकता है । और कभी किसी मजबूरी और उज्र की बिना पर बगैर दुआ मांगे चला जाए तब भी नमाज़ में कमी नहीं आती ।
हवाले के लिए फतावा रज़विया जिल्द सोम सफहा 278 देखें।


कुरआन पढ़ने में सिर्फ होंट हिलाना और आवाज़ न निकालना

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कुछ लोग कुरआन की तिलावत और नमाज़ या नमाज़ के बाहर कुछ पढते हैं तो सिर्फ होंट हिलाते हैं और आवाज़ बिल्कुल नही निकालते हैं उनका यह पढना, पढना नहीं है और इस तरह पढने से नमाज़ नहीं होगी और इस तरह कुरआन की तिलावत की तो तिलावत का सवाब नही पायेंगे । आहिस्ता पढ़ने का मतलब यह है कि कम से कम इतनी आवाज जरूर निकले कि कोई रुकावट न हो तो खुद सुन ले, सिर्फ होंट हिलाना और आवाज़ का बिल्कुल न निकलना पढ़ना नहीं है और इस मसअले का खास ध्यान रखना चाहिए।
(फतावा आलमगीरी मिस्री,जिल्द अव्वल, सफ़हा 65,बहारे शरीअत,जिल्द 3,सफहा 69)


पैन्ट और पाजामा की मोरी चढ़ाकर नमाज़ पढ़ना

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कुछ लोग टखनों से नीचा लटका हुआ पाजामा और पैन्ट पहनते हैं अगर उन्होने इसकी आदत डाल रखी है और तकब्बुर व घमन्ड कें तौर पर वह ऐसा करते है तो यह नाजाइज गुनाह है और इस तरह नमाज़ मकरूह लेकिन अगर इत्तिफाक से हो या बेख्यालीऔर बेतवज्जोही से हो तो हर्ज नहीं, और जो लोग  इससे बचने के लिए और टखने खोलने के लिए मोरी पायेंचे को चढाते हैं वह गुनाह को घटाते नहीं बल्कि बढाते हैं और नमाज़ में खराबी को कम नहीं करते बल्कि ज़्यादा करते हैं , यह पैन्ट और पाजामे की मोरी पायेंचे को लपेट कर चढाना नमाज़ में मकरुह तहरीमी है ।
हदीस में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मुझे हुक्म दिया गया कि मैं सात हड्डियों पर सज्दा करूं ,पेशानी,दोनो हाथ ,दोनो  घुटने और दोनों पंजे और यह हुक्म दिया क्या कि मैं नमाज़ में कपडे और बाल न समेटूँ |
(बुखारी शरीफ,मुस्लिम शरीफ,मिश्कात शरीफ सफहा 83)

इस हदीस की रोशनी में कपड़ा समेटना और चढाना नमाज में मना है लिहाजा पैन्ट और पाजामे की मोरी लपेटने और चढाने वालों को इस हदीस से इबरत हासिल करना चाहिए ।
लेकिन इस्लाह करने वालो से भी गुजारिश हैं कि नमाज़ में इस किस्म की कोताहियॉ बरतने वालों को नरमी और प्यार महब्बत से समझायें , मान जायें तो ठीक वरना उन्हें उनके हाल पर रहने दें और मुनासिब तरीके से इस्लाह करें । उनको डाँटना, झिड़कना और उनसे लडाई झगड़ा करना बहुत बुरा है । जिसका नतीजा यह भी हो सकता है कि वह मस्जिद में आना और नमाज़ पढना छोड दें जिसका बबाल उन झिड़कने वालों पर है, क्यूँकि इसमे भी कोई शक नहीं कि बाज़ इस किस्म की खामियों के साथ नमाज़  पढने वाले बेनमाज़ियों से हज़ारो दर्जा बेहतर है ----और नमाज़ में कोताहियॉ करने वालों को चाहिए अगर कोई उनकी इस्लाह  करे तो बुरा मानने के बजाय उसकी बात पर अमल करें उस पर गुस्सा न करें क्यूँकि वह जो कुछ कह रहा है आपकी भलाई के लिए कह रहा है अगर वह तुर्शी और सख्ती से भी कह रहा है तो वह उसका फ़ेल है, आपका काम तो हक़ को सुन कर अमल करना है, झगड़ा करना नही ।

 नमाज़ में लंगोट बाँधने का मसअला

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कुछ लोग समझते हैं कि पाजामा या तहबन्द के अन्दर लंगोट बाँध कर नमाज पढ़ने से नमाज़ नहीं होती । हालॉकि यह उन की गलतफहमी है । लंगोट बाँध कर नमाज़ पढने से नमाज़ में कोई कमी नहीं आती । अलबत्ता यह ध्यान रखें कि वह इतना कसा हुआ और टाइट न हो कि नमाज़ में रुकूअ  और सज्दे और बैठने में दिक्कत हो ।
(फतावा फैज़ुर्रसूल, जिल्द 1, सफा 252, इरफाने शरीअत ,सफहा 4 )

Wednesday


बगैर रुमाली के पाजामे या जांघिये को पहन कर नमाज़ पढ़ना

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यह भी कुछ लोगों में एक आम ख्याल है जिसकी कोई हकीकत नहीं ।  पाजामे या जाघिंये(अंडर वियर )में रूमाली होना नमाज़ की दुरुस्तगी के लिए बिल्कुल ज़रूरी नहीं है l बगैर रूमाली के पाजामे और जांघिये से नमाज़ बिला कराहत जाइज़ है । हाँ जो लिबास और कपड़े ग़ैर मुस्लिमों के लिए मखसूस हैं उनको पहनना गुनाह है ,औंर उनमें नमाज मकरूह है । अग्रेजी पैन्ट और शर्ट में इस जमाने में उलमाए किराम ने नमाज़ मकरूहे तनज़ीही होने का फतवा दिया है ! जैसा कि बरेली शरीफ़ से छपी हुई फतावा मरकज़ी, दारुल इफ्ता सफहा 207 पर इसकी तफसील मौजूद है ।  यह इसलिए नहीं कि पैन्ट में रूमाली नहीं होती बल्कि इसलिए है कि अग्रेज़ो का खास , कौमी लिबास रह चुका है और अब भी दीनदार मुसलमान इस लिबास को अच्छा नहीं समझते ।
लिहाजा अब भी अग्रेज़ी पैन्ट और शर्ट में नमाज अदा करना मुनासिब और बेहतर नही और इस लिबास से बचना ही बेहतर है । लेकिन अगर पढ़ ली तो हो जाएगी।

 नमाज़ में नफ़्लो को फ़र्ज़ व वाजिब समझना

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नमाज़े ज़ुहर नमाज़े मगरिब और  नमाज़े इशा के आखिर  मे और इशा में वित्रों से पहले दो रकअत नफ्ल  पढने का रिवाज़ है और उनको पढने में हिकमत व सवाब है । लिहाजा पढ लेना ही मुनासिब है लेकिन इन नफ्लो को फर्ज व वाजिब व जरूरी ख्याल करना न पढने वालों को टोकना और उन पर मलामत करना और बुरा भला कहना गलत है, इस्लाम में ज्यादती और शरई हदों से आगे बढना है । इस्लाम में नफ़्ल व मुस्तहब उसे कहते हैं जिस के करने पर सवाब हो और न करने पर कोई गुनाह व अज़ाब न हो तो आपको भी इस पर मलामत करने और बुरा भला कहने का कोई हक़ नहीं और जब खुदाए तआला नफ़्ल छोड़ने पर नाराज़ नहीं तो आप टोकने वाले कौन हुए ?

इस्लाम मे अल्लाह तआला ने अपने बन्दो को जो रिआयते और आसानियां दी है लोगों तक पहुँचाना जरूरी है। अगर आप ऐसा नहीं कर रहे हैं। तो आप इस्लाम को बजाए नफा के नुकसान पहुंचा रहे हैं और लोग यह खयाल कर बैठेंगे कि हम इस्लाम पर ही चल ही नहीं सकते क्योंकि वह एक मुश्किल मज़हब है लिहाज़ा उसकी इशाअत में कमी आएगी । आज कितने ऐसे लोग हैं जो सिर्फ इसलिए नमाज़ नहीं पढ़ते कि वह समझते हैं हम नमाज़ पढ़ ही नहीं सकते और मसाइल नमाज़ व तहारत पाकी व नापाकी से पूरी तरह वाकफियत न होने और खुदा व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की अता फरमाई हुई बाज़ रिआयतों और आसानियों पर आगाह न होने की बिना पर वह नमाज़ छोड़ना गवारा कर लेते हैं और इन रिआयतों से नफा नहीं उठाते हालांकि एक वक़्त की नमाज़ भी क़सदन छोड़ देना इस्लाम में कुफ्र व शिर्क के बाद सब से बड़ा गुनाह है। उलमा व मस्जिदों के इमामो से मेरी गुज़ारिश है कि वह अवाम का ख़ौफ़ न करके उन्हें इस्लामी अहकाम पर अमल करने में मौका ब मौका छूट दी गई तो जो आसानियां है उन्हें ज़रूर बताये ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इस्लाम और इस्लामियत को अपनायें। उन्हें नफ़्लो के बारे में देखा गया है कि अगर कोई शख्स उन्हें न पढ़े तो कुछ अनपढ़ उस पर इल्ज़ाम लगाते हुए यह तक कह देते हैं कि नमाज़ पढ़े तो पूरी इस से न पढ़ना अच्छा । यह एक बडी जहालत की बात है जो वह कहते हैं हालांकि सही बात यह है कि नफ़्ल तो नफ़्ल अगर कोई शख्स सुन्नते भी छोड़  दे सिर्फ फ़र्ज़ पढ़ ले तो वह नमाज़ को जान बुझ कर बिल्कुल छोड़ देने वालों से बहुत बेहतर है और उसे बे नमाज़ी नहीं कहा जा सकता। हाँ सुन्नतें छोड़ने की वजह से गुनाहगार ज़रूर है क्योंकि सुन्नतों  को छोड़ने की इजाज़त नहीं और उन्हें जानबूझकर छोड़ने की आदत डालना गुनाह है।
हाँ अगर उलझन व परेशानी और जल्दी में कोई मौका है कि आप सुन्नतों के साथ मुकम्मल नमाज़ नहीं पढ़ सकते तो सिर्फ फ़र्ज़ और वित्र पढ लेने में कोई हरज व गुनाह नही है । मसलन वक़्त तंग है पूरी नमाज नही पढी जा सकती तो सिर्फ फ़र्ज़ पढ़ लेना काफी है l खुलासा यह कि जुहर व मगरिब व इशा में जो नफ़्ल अदा किये जाते हैं उन्हे अदा करना बहुत अच्छा हैं मुनासिब व बेहतर है और पढना चाहिए लेकिन उन्हें फ़र्ज़ व वाजिब व जरूरी समझना और न अदा करने वालो को टोकना उन्हें छोडने पर भला बुरा कहना गलत है जिसकी इस्लाह जरूरी हैं ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज42)

नोट➡अगर कोई भी नफ़्ल न पढे नमाज़ हो जाएगी लेकिन हमारी राय यह है कि वैसे भी हम लोग दिन भर में कितने गुनाह करते हैं और अगर नफ़्ल पढ़ ले तो हमारी नेकिया बढ़ेगी कम न होगी  हमकों पूरी नमाज़ ही पढ़ना चाहिए फ़र्ज़ ,वाजिब सुन्नत व नफ़्ल। और रमज़ान जैसे मुबारक महीने में नफ़्ल का सवाब फ़र्ज़ के बराबर होता है। इसलिए पूरी ही नमाज़ पढ़े और ज़्यादा जानने के लिए अपने इलाके के सुन्नी सही उल अक़ीदा आलिम से राब्ता करियेगा।

इमाम का मुक़तदियों से ऊँची जगह खड़ा होना 

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कई जगह देखा गया है कि नमाज में इमाम मुकतदियो से ऊँची जगह खड़ा होता है मसलन मस्जिद में अन्दर की कुर्सी ऊँची हैं और बाहर के हिस्से की नीची है और इमाम का मुसल्ला अन्दर के फर्श पर है और मुकतदी बाहर या दोनों अन्दर हैं लेकिन इमाम के मुसल्ले के लिए फर्श ऊँचा कर दिया गया है ,तो  यह मकरूह है और इस तरह नमाज़ पढने से नमाज़ में कमी आती है ।
यह है कि इमाम का अकेले बुलन्द और ऊँची जगह खड़ा होना मकरूह है और ऊँचाई का मतलब यह हैं कि देखने से अन्दाज़ा हो जाये कि इमाम ऊँचा है और मुक़तदी नीचे और यह फर्क मामूली हो तो मकरूहे तनज़ीही और अगर ज़्यादा हो तो तहरीमी है। हाँ अगर पहली सफ इमाम के साथ और बराबर में हो बाकी सफे नीची हो तो कुछ हर्ज नहीं, यह जाइज़ है । इस मसअले की तफसील जानने के लिए फतावा रज़विया जिल्द न०3 सफहा 415 देखना चाहिए। इस मसअले का खास ध्यान रखना चाहिए क्योंकि खुद हदीस शरीफ में भी इस से मुताल्लिक मरवी है।
हदीस शरीफ:- हज़रते हुजैफ़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब इमाम नमाज़ पढ़ाये तो मुक़तदियों से ऊँची जगह खड़ा न हो।
(अबू दाऊद शरीफ ,जिल्द 1,सफहा 88)

इमाम के लिए मुकर्रिर होना कितना ज़रूरी है? ⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

आजकल काफी जगह अवाम मस्जिद में किसी को इमामत के लिए रखते है तो उस से तकरीर कराते है अगर वह धूम धडाके से खूब कूद फांद कर  हाथ पाँव फेंक कर जोशीले अन्दाज़  में जज़्बाती तकरीर कर दे तो बडे खुश होतें हैं और उसको इमामत के लिए पसन्द करते हैं यहाँ तक कि बाज़ जगह तो खुश इलहानी और अच्छी आवाज से नाते  और नज़्में  पढ दे तो उसको बहुत बढ़िया इमाम ख्याल करते हैं I इस बात की तवज़्ज़ोह नहीं देते कि उसका कुरआन शरीफ गलत है या सही I उसको मसाइल दीनिया से बकदरे ज़रूरत वाकफियत है या नहीं। और उसका किरदार व अमल मनसबे इमामत के लिए मुनासिब है या नहीं ।

अगरचे तकरीर व बयान व खिताबत अगर उसूल व शराइत के साथ हो तो उससे दीन को तकवियत हासिल होती है और हुई है । लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं कि दीनदारी तकवा शिआरी और ख़ौफे खुदा अमूमन कम सुखन और संजीदा मिजाज़ लोगों में ज़्यादा मिलता है I ज़वान जोर और मुँह के मजबूत लोग सब काम मुँह और जबान से ही चलाना चाहते है। और इस्लाम गुफ्तार से ज़्यादा किरदार से फैला है और आजकल के ज़्यादातर मौलवियों और इमामों के लिए बजाए तकरीर व खिताबत  के जिम्मेदार उलमाए अहलेसुन्नत की आम फ़हम अन्दाज़ में लिखी हुई  किताबे पढ कर अवाम को सुनाना ज़्यादा मुनासिब और  बेहतर है  खुलासा यह कि आज कल बाज़ जगह  लोग जो इमाम के  लिए मुकर्रिर होना जरूरी ख्याल करते हैं यह लोग गलती पर है।

 मुक़तदी के सर पर इमामा और इमाम के सर न हो

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क्या मुकतदी सर पर इमामा जिसे साफा और पगड़ी भी कहते हैं, बाँध कर नमाज़ पढे और इमाम के सर पर पगड़ी न हो तो इसको कुछ लोग बहुत बुरा जानते हैं । बल्कि कुछ यह समझते हैं कि इस सूरत में मुक़तदी, की नमाज़ दुरुस्त नहीं हुई, यह ग़लत बात है ।
क्या इमाम के सर पर इमामा न हो और मुकतदी के सर पर हो तो मुक़तदी की नमाज दुरुस्त और सही हो जायेगी । आलाहज़रत रदियल्लाहु अन्हु से यह मसअला मालूम किया क्या तो फरमाया बिला तकल्लुफ़ दुरुस्त है ।

(फतावा रज़विया, जिल्द 3,सफहा 273, इरफाने शरीअत, सफहा 4)



क्या जिससे ज़ाती रन्जिश हो उसके पीछे नमाज़ नहीं होगी ?

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अकसर ऐसा होता है कि इमाम और मुक़तदी के दरमियान कोई दुनियवी इख़्तिलाफ़ हो जाता है । जैसे आजकल के सियासी,समाजी,खानदानी और बिरादरियों के इख़्तिलाफ़ और झगड़े। तो इन वुजूहात पर लोग उस इमाम के पीछे नमाज़ पढना छोड़ देते है और कहते हैं कि जिससे दिल मिला हुआ न हो उसके पीछे नमाज़ नहीं होगी, यह उनकी गलतफहमी है और वो लोग धोके में है
सही बात यह है कि जो इमाम शरई तौर पर सही हो उसके पीछे नमाज़ दुरुस्त है चाहे उससे आपका दुनियवी झगड़ा ही क्यूँ न चलता हो l बातचीत ,दुआ सलाम सब बन्द हो फिर भी आप उसके पीछे नमाज़ पढ़ सकते हैं । नमाज़ की दुरूस्तगीं के लिए ज़रुरी नहीं है कि दुनियवी एतबार से मुक़तदी का दिल इमाम से मिला हुआ हो I हाँ तीन दिन से ज़्यादा एक मुसलमान के लिए दूसरे मुसलमान से बुराई रखना और मेलजोल न करना, शरीअत में सख्त नापसन्दीदा है I

हदीस में है "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:-
मुसलमान के लिए हलाल नहीं कि अपने भाई को तीन दिन से ज़्यादा छोड़ रखे । जब उससे मुलाकात,हो तो तीन मरतबा सलाम कर ले अगर उसने जवाब नहीं दिया तो इसका गुनाह भी उसके ज़िम्मे है I
(अबू दाऊद, किताबुल अदब ,जिल्द २ ,सफ़हा 673)

लेकिन इसका नमाज़ व इमामत से कोई तअल्लुक़ नहीं, रन्जिश और बुराई से भी इमाम के पीछे नमाज़ हो जायेगी I और जो लोग ज़ाती रन्जिशों के बिना पर अपने नफ़्स और ज़ात की खातिर इमामों के पीछे नमाज़ पढना छोड़ देते हैं, ये खुदा के घरों को वीरान करने वाले और दीने इस्लाम को नुकसान पहुँचाने वाले हैं l इन्हें खुदाए तआला से ड़रना चाहिए, मरने के बाद की फिक्र करना चाहिए । कब्र की एक एक घड़ी और कियामत का एक एक लम्हा बड़ा भारी पडेगा I
 
आलाहज़रत इमामे अहले सुन्नत फरमाते हैं :-
जो लोग बराहे नफ्सानिया इमाम के पीछे नमाज़, न पढ़े और जमाअत होती रहे और शामिल न हों,वो सख्त गुनाहगार हैं I (फ़तावा रज़विया, जिल्द 3 सफहा 221)

नसबन्दी कराने वाले की इमामत का हुक़्म

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नसबन्दी कराना इस्लाम में हराम है । लेकिन कुछ लोग ख्याल करते हैं कि जिसने नसबन्दी करा ली अब वह जिन्दगी भर नमाज़ नहीं पढा सकता । हप्लांकि ऐसा नहीं है बल्कि इस्लाम में जिस तरह और गुनाहों की तौबा है उसी तरह इस गुनाह की भी तौबा है।

यानी जिस की नसबन्दी हो चुकी है अगर वह सच्चे दिल से एलानिया तौबा करे और हराम कारियों  से रुके तो उस के पीछे नमाज पढी जा सकती है ।

(फतावा फैज़ुर्रसूल, जिल्द 1, सफहा, 277)

इमाम का मेहराब में या दो सुतूनों के दरमियान खड़ा होना

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कहीं कहीं देखने में आता है कि इमाम मेहराब में अन्दर हैं और मुकतदी बाहर यह खिलाफे सुन्नत और मकरूह है । सदरश्शरीआ मौलाना अमजद अली साहब अलैहिर्रहमा फरमाते है।
इमाम  को तन्हा मेहराब मे खड़ा होना मकरूह है और अगर बाहर खड़ा हो सिर्फ सज्दा मेहराब मे किया या वह तन्हा न हो बल्कि  उसके साथ कुछ मुक़तदी भी मेहराब में हों तो कुछ हर्ज नहीं, यूँ ही अगर मुक़तदिंयों पर मस्जिद तंग हो तो भी मेहराब में खडा होना मकरूह नहीं है । इमाम को दरों में खड़ा होना भी मकरूह है । (बहारे शरीअत, हिस्सा सोम ,सफहा 174,बहवाला दुर्रे मुख्तार व आलमगीरी)
इसका तरीका यह है कि इमाम का मुसल्ला थोडा पीछे हटा दिया जाये और वह थोड़ा पीछे हट कर इस तरह खड़ा हो कि देखने में महसूस हो कि वह मेहराब या दरो मे अन्दर नहीं है बल्कि बाहर खड़ा है फिर चाहे सज्दा अन्दर हो नमाज़ दुरुस्त हो जायेगी । इस मसअले को जानने के लिये फतावा रज़विया ,जिल्द 3, सफ़हा 42 का मुताअला करें।

जुमे के खुतबे में उर्दू अशआर पढ़ना

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जुमे का खुतवा सिर्फ अरबी जबान में पढना सुन्नत है I किसी और जबान में खिलाफे सुन्न्त । उर्दू अशआर अगर पढ़ना हो तो वह अज़ाने खुतवा से पहले पढ लिये जायें I दूसरी अज़ान के बाद जो खुतबा पढ़ा जाता है यह अरबी के अलावा और किसी जबान में पढना सुन्नत के खिलाफ है I

(फतावा रज़विया ,जिल्द 3, सफहा 751)


पंजवक़्ता नमाज़ में सुस्ती और वज़ीफ़े पढ़ना

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काफी लोग देखे गए कि वह नमाजों का ख्याल नहीं  रखते और पढते भी हैं तो वक़्त निकाल कर जल्दी जल्दी या बे जमाअत के । और वज़ीफों और तस्वीहों में लगे रहते हैं उनके वजीफे उनकें मुँह पर मार दिये जायेंगे क्यूकि जिसके फर्ज़ पूरे न हों उसका कोई नफ़्ल कबूल नहीं । इस्लाम में सब से बडा वजीफा और अमल नमाज़े बाजमाअत की अदाएगी है । आलाहज़रत फरमाते है:
"जब तक फर्ज़ ज़िम्मे बाकी रहता है कोई नफ़्ल कबूल नहीं किया जाता । (अलमलफूज़ ,हिस्सा अव्वल, सफहा. 77)
हदीस शरीफ में हैं कि हज़रते उमर फारूके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु ने एक दिन फ़ज्र की जमाअत में हज़रते सुलेमान बिन अबी हसमा को नहीं पाया । दिन में बाजार को जाते वक़्त उनके घर के पास से गुजरे तो उनकी माँ से पूछा कि आज सुलेमान जमाअत में क्यूँ नहीं थे । उनकी वालिदा हज़रते शिफ़ा ने अर्ज़ किया कि रात भऱ जाग का इबादत करते रहे फ़ज्र की जमाअत के वक़्त नींद आ गई और जमाअत में शरीक होने से रह गए । अमीरुल मोमिनीन हज़रते उमर फारूके आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमाया कि मेरे नज़दीक सारी रात जाग कर इबादत करने से फ़ज्र की  जमाअत में शरीक होना ज़्यादा अच्छा है । (मिश्कात ,बाबुल जमाअत, सफ़हा 67)

मस्जिद में भीख मांगना

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आजकल मस्जिदो में सवाल करने और भीक मांगने का रिवाज़ बहुत बढता जा रहा हैं l अमूमन देखा जाता है कि इधर इमाम साहब ने सलाम फेरा उधर किसी न किसी ने और बाज औकात कई कई लोगों ने अपनी अपनी आपबीती सुनाना और मदद करो भाईयो की पुकार लगाना शुरू कर दिया हालाकि यह निहायत गलत तरीका है । ऐसे लोगों को इस हरकत से बाज रखा जाए और मस्जिदों में भीक मागने से सख्ती से रो का जाए ।
सदरुश्शरीआ हज़रत मौला अमजद अली साहब अलैहिर्रहमा फरमाते है:
"मस्जिद में सवाल करना हराम है और उस साइल को देना भी मना है । (बहारें शरीअत, हिस्सा 3, सफहा 184)
इसका तरीका यह होना चाहिए कि ऐसे लोग या तो बाहर दरवाज़े पर सवाल करें या इमाम मस्जिद वगैरह किसी से कह दें कि वह उनकी ज़रूरत से लोगों को आगाह कर दें ।

मगरिब और ईशा की नमाज़ कब से कब तक पढ़ी जा सकती है

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काफी लोग थोडा सा अंधेरा होते ही यह ख्याल करते है कि मगरिब की नमाज का वक़्त निकल गया I अब नमाज क़ज़ा हो गई और वे वजह नमाज़ छोड़ देते है या क़ज़ा की नियत से पढते हैं ।
मगरिब की नमाज का वक़्त सूरज डूबने के बाद से लेकर शफ़क़ तक है और शफ़क़ उस सफेदी का नाम है जो पच्छिम की तरफ सुर्खी डूबने के बाद उत्तर दक्खिन सुब्हे सादिक की तरह र्फैलती है ।

हाँ मगरिब की नमाज़ जल्दी पढ़ना मुस्तहब है और बिला उज्र दो रकअतो की मिक़दार देर लगाना मकरुहे तनज़ीहीं यानी खिलाफ़े औला है । और बिला उज्र इतनी देर लगाना जिस में कसरत से सितारे जाहिर हो जायें मकरुहे तहरीमी और गुनाह है ।  (अहकामे शरीअत, सफ़हा 137)
हाँ अगर न पढी हो तो पढे और जब तक ईशा का वक़्त शुरू नहीं हुआ है अदा ही होगी, क़ज़ा नहीं । और यह वक़्त सूरज डूबने के बाद से कम से कम एक घन्टा अट्ठारह मिनटऔर ज़्याद से ज़्याद एक घन्टा पैतीस मिनट है जो मौसम के लिहाज़ से घटता बढता रहता है। यानी एक घन्टे के ऊपर 18 से 35 मिनट के दरमियान घूमता रहता है । ईशा की नमाज़ के बारे में भी कुछ लोग समझते हैं कि उसका वक़्त 12 बजे तक रहता है यह भी ग़लत है । इशा की नमाज़ का वक़्त  फज्रे सादिक तुलूअ होने यानी सहरी का वक़्त खत्म होने तक रहता है । हाँ बिला वजह तिहाई रात से ज्यादा देर करना मक़रूह है।