Monday

औलाद को आक़ करने का मसअला

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बाज़ लोग अपनी औलाद के बारे में यह कह देते हैं कि मैंने इसको आक़ कर दिया और उसका मतलब यह ख्याल किया जाता है कि अब वह आक़ की हुई औलाद बाप के मरने के बाद इसकी मीरास से हिस्सा नहीं पाएगी हालांकि यह एक बेकार बात है और आक़ कर देना शरअन कोई चीज़ नहीं है और न बाप के यह लफ्ज़ बोलने से उसकी औलाद जाएदाद में हिस्से से महरूम होगी बल्कि वह बदस्तूर बाप की मौत के बाद उसके तरके में शरई हिस्से की हक़दार है।

हाँ माँ बाप की नाफरमानी और उनको ईज़ा देना बड़ा गुनाह है और जिसके वालिदैन उससे नाखुश हों वह दोनों जहाँ में इताब व अज़ाबे इलाही का हक़दार है और सख़्त महरूम है।

सय्यिदी आलाहजरत रदियल्लाहु तआला अन्हु इरशाद फरमाते हैं : "आक कर देना शरअन कोई चीज़ नहीं न उससे विलायत ज़ाइल हो।"
(फतावा रज़विया,जिल्द 5,सफहा 412)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 135)

सफ़र के महीने का आखिर बुध

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कुछ जगह लोग सफ़र के महीने के आख़िरी बुध के बारे में यह ख्याल करते है कि इस रोज हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ने मर्ज़ से शिफ़ा पाई थी। लिहाज़ा इस दिन खुशी मनाते हैं। खाने, शीरीनी वगैरा खाते खिलाते हैं, जंगल की सैर को जाते हैं और कहीं पर लोग इसको मनहूस ख्याल करते हैं और बरतन तोड़ डालते हैं हालांकि सफ़र
के आखिरी बुध की कोई अस्ल नहीं। न उस दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए मर्ज़ से सेहतयाबी का कोई सबूत। बाज़ जगह कुछ लोग इस
दिन को मनहूस ख्याल करके बरतनों वगैरा को तोड़ते हैं यह भी फुज़ूलखर्ची और गुनाह है। खुलासा यह कि सफ़र के महीने के आख़िरी बुध की इस्लाम में कोई खुसूसियत नहीं।

(फतावा रज़विया, जिल्द 10, निस्फ़े अव्वल, सफ़हा 117)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 134)
 ओझड़ी खाना
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ओझड़ी और आतें खाना जाइज़ नहीं।
 कुरआन करीम में है।
  तर्जमा : और वह नबी गन्दी चीजें हराम फरमायेंगे।
(कंजूल ईमान ,पारा 9, सुरह अराफ,आयत 157)

और "खबाइस" से मुराद वह चीजें हैं जिनसे सलीमुत्तबअ लोग घिन करें और ओझड़ी और आंतें खाने से भी सलीमुत्तबअ लोग घिन करते है और यह गन्दी चीजें हैं लिहाजा इनका खाना जाइज़ नहीं है।

आलाहज़रत अलैहिर्रहमा ने अपने रिसाले "अलमहुल मलीहा" में इस सब को तसरीह व तफ़सील से बयान फरमाया है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 134)
हाथ उठा कर या सिर्फ़ इशारे से सलाम का जवाब देना
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सलाम करने या सलाम का जवाब देने में आजकल सिर्फ इशारा कर देना या हाथ उठा देना या थोड़ा सा सर हिला देना काफी राइज हो गया है। हालांकि इस तरह सलाम की सुन्नत अदा नहीं होती और अगर किसी ने सलाम किया और उसके जवाब में सिर्फ यही किया मुँह से वअलैकुमुस्सलाम न कहा तो गुनाहगार भी हुआ।

 आलाहज़रत अलैहिर्रहमा फरमाते हैं।
 "बन्दगी आदाब, तसलीमात वगैरा अल्फाज सलाम से नहीं और सिर्फ हाथ उठा देना काफी नहीं जब तक उसके साथ कोई लफ्ज़ सलाम का न हो।"
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 10,निस्फ अव्वल, सफहा 168)

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)



दवा खाने पीने से पहले बिस्मिल्लाह न पढ़ना

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यह भी ग़लत और एक जाहिलाना ख्याल है बल्कि दवा खाने पीने से पहले बिस्मिल्लाह ख़ास तौर से ध्यान करके ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि नामे खुदा से जल्द शिफ़ायाब हो क्यूंकि बीमारियां और उनकी शिफ़ा अल्लाह की तरफ से है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)

अमरीकन गाय का शरई हुक्म

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अमरीकन गाय के बारे में काफ़ी लोग शुकूक व शुबहात में मुबतला हैं जबकि इस में कोई शक नहीं कि अमरीकन गाय भी बिला शुबहा गाय है उसका खाना हलाल और उसका दूध ,घी,खाना पीना जाइज़ है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)

मर्दों का एक से ज़्यादा अंगूठी पहनना

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इस्लामी नुकतए नज़र से मर्द को चांदी की सिर्फ एक अंगूठी एक नग की पहनना जाइज़ है जिसका वजन साढ़े चार माशे (4.357 ग्राम) से कम हो। इसके अलावा मर्द के लिए कोई ज़ेवर हलाल नहीं। एक से ज़्यादा अंगूठी या कोई ज़ेवर किसी भी धात का हो सब गुनाह व नाजाइज़ है ।

मगर आजकल अवाम तो अवाम बाज़ जाहिल नाम निहाद सूफ़ियों और मुख़ालिफ़के इस्लाम पीरों ने ज़्यादा  से ज़्यादा अंगूठी पहनने को अपने ख्याल में फ़कीरी व तसव्वुफ समझ रखा है यह एक चांदी की शरई अंगूठी से ज़्यादा अंगूठिया पहनने वाले ख्वाह वह सोने की हों या चांदी की या और किसी धात की सब के सब गुनाहगार हैं और इस लाइक नहीं कि उन्हें पीर बनाया जाए। हमारे कुछ भाई तांबे, पीतल और लोहे के छल्ले पहनते हैं और उन्हें दर्द और बीमारी की शिफा ख्याल करते हैं यह भी गलत है।और इलाज के तौर पर भी नाजाइज़ जेवरात छल्ले वगैरा पहनना जाइज़ नहीं है।
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 10 , निस्फे अव्वल,सफ़हा 14)

कुछ लोग यह कहते हैं कि यह छल्ला या अंगूठी हम मक्का शरीफ,मदीना शरीफ या अजमेर शरीफ से लाए हैं। अगर वह खिलाफ शरअ है तो मक्के शरीफ, मदीने शरीफ, अजमेर शरीफ के बाज़ार में बिकने से हलाल नहीं हो जाएगी।

भाईयो! आप तो आज वहाँ के बाज़ारों से लाए हैं और यह नाजाइज़ होने का हुक्म चौदा सौ साल कल्ब वहीं से आ चुका है।
      खुलासा यह कि मुक़द्दस शहरों में बिकने से हराम चीज़ हलाल नहीं हो जाती ।
     
         भाईयों! अल्लाह तआला से डरो और नाजाइज़ अँगूठीयां, ज़ेवरात, कड़े, छल्ले पहन कर अल्लाह तआला की नाफरमानी न करो ।
       
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 132)

मुहर्रम व सफ़र में ब्याह शादी न करना और सोग मनाना 

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माहे मुहर्रम में कितनी रसमें, बिदअतें और खुराफ़ातें आजकल मुसलमानों में राइज हो गई हैं उनका शुमार करना भी मुश्किल है। उन्हीं में से एक यह भी कि यह महीना सोग और गमी का महीना है। इस माह में ब्याह शादी न की जायें। हालांकि इस्लाम में किसी भी मय्यत का तीन दिन से ज्यादा गम मनाना नाजाइज़ है और इन अय्याम में ब्याह शादी को बुरा समझना गुनाह है। निकाह साल के किसी दिन में मना नहीं चाहे मुहर्रम हो या सफर या और कोई महीना या दिन।

️आलाहज़रत अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान से पूछा गया
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(1) बाज़ अहलेसुन्नत व जमाअत अशरए मुहर्रम में न तो दिन भर रोटी पकाते हैं और न झाडू देते हैं कहते हैं बाद दफ़न ताज़िया रोटी पकाई जाएगी।
(2) दस दिन में कपड़े नहीं उतारते।
(3) माहे मुहर्रम में ब्याह शादी नहीं करते।
(4) इन अय्याम में सिवाए इमाम हसन और इमाम हुसैन रदियल्लाह तआला अन्हुमा के किसी और की नियाज़ व फातिहा नहीं दिलाते यह जाइज़ है या नाजाइज़? तो आप ने जवाब में फ़रमाया पहली तीनों बातें सोग हैं और सोग हराम और चौथी बात जहालत। हर महीने में हर तारीख़ में हर वली की नियाज हर मुसलमान की फातिहा हो सकती है।

(अहकामे शरीअत हिस्सा अव्वल सफ़हा 127)

दर अस्ल मुहर्रम में गम मनाना सोग करना फ़िरक़ए मलऊना शीओं और राफ़िज़ियों का काम है और खुशी मनाना मरदूद ख़ारिजियों का का शेवा और नियाज़ व फातिहा दिलाना, नफ़्ल पढ़ना,रोज़े रखना मुसलमानों का काम है।

यूंही मुहर्रम में ताजियादारी करना, मसनूई करबलायें बनाना , उसमें मेले लगाना भी नाजाइज़ व गुनाह है ।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 131)

ग़ैर मुस्लिमों से गोश्त मँगाने का मसअला

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ग़ैर मुस्लिम की दुकान से गोश्त ख़रीद कर खाना या किसी ग़ैर मुस्लिम से हदिया और तोहफे में कच्चा या पका हुआ गोश्त लेकर खाना हराम है ख़्वाह वह यह कहे कि मैंने जानवर मुसलमान से जुबह कराया था। यअनी मुसलमान का ज़बीहा बताये तब भी उससे गोश्त लेना, ख़रीदना और खाना सब हराम है। हाँ अगर जुबह होने से लेकर जब तक मुसलमान के पास आया हर वक़्त मुसलमान की नज़र में रहा तो यह जाइज़ है।
(फतावा रजविया ज़िल्द 10 निस्फ अव्वल सफ़हा 94)
हाँ अगर गोश्त किसी मुसलमान की दुकान से लाया गया लेकिन खरीद कर लाने वाला नौकर, मजदूर वगैरह कोई ग़ैर मुस्लिम हो और वह कहे कि मैंने यह गोश्त मुसलमान की दुकान से खरीदा है और आप भी जानते हैं कि यह मुसलमान की दुकान से ख़रीदकर लाया है तो उस गोश्त को खाना जाइज़ है।
जामे सगीर में है :
(हिदाया जिल्द 4 सफ़ा 437) बहारे शरीअत हिस्सा 16 सफ़ा 36 पर भी इसकी वजाहत
मौजूद है।
खुलासा यह कि मुसलमान की दुकान का गोश्त जाइज़ है ख्वाह खरीद कर लाने वाला नौकर या मज़दूर ग़ैर मुस्लिम हो और ग़ैर मुस्लिम की दुकान का  गोश्त हराम है ख्वाह ख़रीद कर लाने वाला मुसलमान ही क्यूं न हो और अगर जुबह शरई से लेकर किसी वक़्त मुसलमान की नज़र से गाइब न हुआ तो यह भी जाइज़ है ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 130)

Sunday


बे औलाद मर्दों और औरतों के लिए ज़रूरी हिदायात

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औलाद दुनिया में अल्लाह तआला की बहुत बड़ी नेमत है। लिहाज़ा जिसको अल्लाह तआला यह नेमत अता फरमाये, उसको चाहिए कि वह खुदाए तआला का शुक्र अदा करे और अगर न दे तो सब्र करे। मगर आजकल कुछ मर्द और औरतें औलाद न होने की वजह से परेशान रहते हैं और इस कमी को ज़्यादा महसूस करते हैं। हालाँकि यह अहले ईमान की शान नहीं। मोमिन को दुनिया और उसकी नेमतों के हासिल होने की ज़्यादा फिक्र नहीं करना चाहिए, ज़्यादा फिक्र व ग़म आख़िरत का होना चाहिए। अगर आपने अपनी आख़िरत सुधार ली तो दुनिया की किसी नेमत के न पाने का ज़्यादा गम नहीं करना चाहिए। औलाद अल्लाह तआला की नेमत ज़रूर है लेकिन समझ वालों के लिए यह बात भी काबिले गौर है कि माल और औलाद को अल्लाह जल्ला शानुहु ने अपने क़ुरआनमें दुनिया की रौनक फ़रमाया, आख़िरत की नहीं।

अल्लाह तआला क़ुरआन करीम में इरशाद  फ़रमाता है
तर्जमा -माल और बेटे दुनियवी ज़िन्दगी का सिंगार हैं और बाकी रहने वाली अच्छी बातें हैं, उनका सवाब तुम्हारे रब के यहां बेहतर और वो उम्मीद में सबसे भली।
(सूरह कहफ़ पारा 16 रुकूअ 18)

कुरआने करीम में माल और औलाद को फितना यअनी आज़माइश भी कहा गया है, जिसका मतलब यह है कि इन चीजों को हासिल करके अगर खुदा व रसूल का हक भी अदा करता रहा तब तो ठीक, और माल व औलाद की महब्बत में अल्लाह तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भूल गया ,हराम व हलाल का फर्क खो बैठा तो यह निहायत बुरी चीजें हैं। अलबत्ता नेक औलाद आख़िरत का भी सरमाया है लेकिन आने वाले जमाने में औलाद के नेक होने की उम्मीदें काफी कम हो गई हैं।

खुदाए तआला के महबूब बन्दों यअनी अल्लाह वालों में भी ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जिनके औलाद न थी। सरकारे दो आलम हज़रत रसूले पाक मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सबसे प्यारी बीवी सय्यिदा आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा के भी कोई औलाद न थी। बल्कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ग्यारह बीवियाँ थीं, जिनमें से आपकी औलाद सिर्फ दो से हुई। सहाबा किराम में हज़रते सय्यिदेना बिलाल हबशी रदियल्लाहु अन्हु भी बेऔलाद थे।

हमारे कुछ भाई और बहनें बेऔलाद होने की वजह से हर वक़्त कुढ़ते रहते हैं और ज़िन्दगी भर दवा दारू और दुआ तावीज़ कराते रहते हैं और लूट खसोट मचाने वाले कुछ डाक्टर व हकीम और करने धरने वाले कठमुल्ले और मियाँ फ़कीर ,उनकी कमज़ोरी से खूब फाइदे उठाते,चक्कर लगवाते यहाँ तक की उन्हें बरबाद कर देते हैं ।

और डाक्टर व हकीमों और करने धरने वालों में आजकल मक्कारों, फरेबकारों की तादाद बहुत बढ़ गई है। कुछ टोका टाकी करने वाली और मशविरे देने वाली बूढ़ी औरतें, उन बेचारों को चैन से नहीं बैठने देतीं। और नये नये हकीमों, डाक्टरों और करने धरने वालों के पते बताती रहती हैं। यहाँ से छूटे तो वहाँ पहुँचे और यहाँ से निकले तो वहाँ फंसे। बेचारों की इसी में कट जाती है।

भाईयो! सब्र से बड़ी कोई दवा नहीं और शुक्र से बड़ा कोई तावीज़ नहीं। इससे हमारा मतलब यह नहीं है कि बेऔलाद दुआ और तावीज़ न करें। बल्कि हमारा मकसद यह बताना है कि थोड़ा बहुत इलाज भी करा लें। और अच्छे भले मौलवी, आलिमोंपीरों फकीरों से दुआ तावीज़ भी करा लें, अगर कामयाबी हो जाये तो ठीक, सुब्हानल्लाह! खुदाए तआला मुबारक फ़रमाये। और न हो तो सब्र से काम लें, खुदाए तआला की इबादत, उसका ज़िक्र और कुरआन की तिलावत में ध्यान लगायें। ज़्यादा हकीमों डाक्टरों और करने वालों के दरवाजों के चक्कर न लगायें और इसमें ज़िन्दगी की कीमती घड़ियों को न गंवायें, आखिर होना वही है, जो खुदाए तआला की मर्ज़ी है।

और एक जरूरी बात यह भी है कि अब करीबे कियामत जो ज़माना आ रहा है, उसमें ज़्यादातर औलाद नअहल निकल रही है और तजुर्बा शाहिद है कि अब औलाद से लोगों को सुकून कम ही हासिल होगा ।और अब बुढ़ापे में माँ बाप को कमा कर खिलाने वाले बहुत कम ,न होने के बराबर और नोच नोच कर खाने वाले ज़्यादा पैदा होंगे। आज लाखों की तादाद में साहिबे औलाद बूढ़े और बुढ़ियें सिर्फ इसलिए भीक मांगते घूम रहे हैं कि उनकी औलाद ने जो कुछ उनके पास था, वह या तो ख़त्म कर दिया या अपने कब्ज़े में कर लिया और मां बाप को भीक मांगने के लिए छोड़ दिया। बल्कि बाज़ तो माँ बाप से भीक मंगवा कर खुद खा रहे हैं और अपने बच्चों को खिला रहे हैं। गोया कि अब माँ बाप इसलिए नहीं हैं कि बुढ़ापे में औलाद की कमाई खायें बल्कि इसलिए हैं कि मरते दम तक उन्हें कमा कर खिलायें ख्वाह इसके लिए उन्हें भीक ही क्यूं न मांगना पड़े।

आज कितने लोग हैं कि उनकी ज़िन्दगी चैन व सुकून और शान के साथ कटी। लेकिन औलाद की वजह से बुरे दिन देखने को मिले। किसी को लड़के की वजह से जेल और थाने जाना पड़ा और पुलिस की खरी खोटी सुनना पड़ीं और किसी की जवान लड़की ने नाक कटवा दी और पूरे घर की इज़्ज़त खाक में मिला दी, चार आदमियों में बैठने के लाइक नहीं छोड़ा।

इस सबसे हमारा मकसद यह नहीं है कि औलाद मुतलकन कोई बुरी चीज़ है या बेऔलाद औलाद हासिल करने के लिए बिल्कुल कोशिश न करें। बल्कि बात वही है जो हम लिख चुके कि खुदाए तआला नेक औलाद दे तो, मुबारक! उसका शुक्र अदा करें और न दे तब भी परेशान न हों। मामूली दवा व तदबीर के साथ साथ सब्र व शुक्र ही से काम लें ।

और यह बता देना भी जरूरी है कि बदमज़हब व बददीन या अल्लाह तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और माँ बाप की नाफरमान, बिगड़ी हुई, चोर,डकैत, शराबी, ज़िनाकार, हरामकार,अय्याश व बदमआश औलाद वाला होने से वो लोग बहुत अच्छे हैं, जिनके औलाद नहीं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 126)

Saturday


 

फ़िल्मी गानों की तर्ज़ पर नातें और मनक़बतें पढ़ना

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आजकल जलसों और मुशाइरों में शाइर व नातख्वाँ लोग फ़िल्मी गानों की तर्ज़ पर उनकी लय और सुर में हम्द, नात व मनकबत पढ़ने लगे हैं हालाँकि यह मना है। उन्हें इन हरकात से बाज़ रहना चाहिए और मुसलमानों को चाहिए कि ऐसे लोगों से हरगिज़ नज़्में न सुनें।

आलाहज़रत इमामे अहले सुन्नत फरमाते हैं
अगर गाने की तर्ज़ पर रागिनी की रिआयत हो तो नापसन्द है कि यह अम्र ज़िक्र शरीफ़ के मुनासिब नहीं।
(फतावा रजविया जिल्द 10  किस्त 2 सफ़ा 185)

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 126)

अज़ीम शख्सियतों को मनवाने का तरीका 

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कुछ लोग जो शख्सियत परस्ती में हद से आगे बढ़े हुए हैं,वो अपनी महबूब और पसन्दीदा शख्सियतों को दूसरों से मनवाने के लिए लड़ाई झगड़ा करते हैं। और जो महब्बत उन्हें है, वो अगर दूसरा न करे तो बुरा मानते और उसे गुमराह और बद्दीन तक ख्याल कर बैठते हैं, और जबरदस्ती उससे मनवाना चाहते हैं। हालांकि महब्बत कभी भी ज़बरदस्ती नहीं पैदा की जा सकती और न सिर्फ़ फ़तवे लगाकर और न उन महबूब बन्दों और बुजुर्गों के नाम के नारे लगा कर और न जोशीली और जज्बाती तकरीरें करके।

बल्कि तरीका यह है कि जो वाकई बुज़ुर्ग साहिबे किरदार अल्लाह वाले लोग हैं यअनी हकीकत में वह इस्लामी नुक़्तए नज़र से अज़ीम शख्सियत के मालिक हैं तो उनका वह किरदार और तरीकए जिन्दगी, कारनामे और दीनी ख़िदमात, खुदातरसी और नफ़्सकुशी संजीदा अन्दाज़ में समझाने के तौर पर तकरीर या तहरीर के ज़रीए लोगों के सामने लाइये और जिन बातों की बुनियाद पर आपको उस साहिबे इल्म व फ़ज़ल से महब्बत है, वो बातें दूसरों को बताइये। अगर वह भी उनका आशिक़ व दीवाना हो जाये तो ठीक और न हो तो कोशिश आपका काम, अब आप जबरदस्ती मनवाने की कोशिश न कीजिए। हाँ जो लोग आमतौर पर बुज़ुर्गों की शान में गुस्ताख़ी करते हैं या ऐसे आलिम व बुज़ुर्ग कि जिनकी बुज़ुर्ग व बरतरी पर पूरी उम्मते मुस्लिमा इत्तिफाक कर चुकी हो उनकी शान में बकवास करते हैं, वो यक़ीनन गुमराह व बददीन हैं। वो अगर समझाने से न समझे तो उनसे दूरी और बेज़ारी ज़रूरी है। और जो गुस्ताखी व बेअदबी न करता हो। लेकिन आपकी तरह अक़ीदत व महब्बत भी न रखता हो तो उसके मुआमले में खामोशी बेहतर है। और उसके ख्यालात बेहतर हैं, इस्लामी हैं तो उसको मुसलमान ही ख्याल किया जाये,और अपना इस्लामी भाई समझा जाये।

इस्लामी शख्सियतों और अपने बुज़ुर्गोंपीरों या मशाइख को दूसरों से मनवाने के लिए सबसे ज़्यादा उम्दा तरीका और बेहतर ढंग आपका किरदार है। आज ऐसे लोग बहुत हैं जो हराम व हलाल में तमीज़ नहीं रखते, नमाजें छोड़ते, गाने , बजाने और तमाशों में लगे रहते हैं, उनकी नियतें ख़राब हो चुकी हैं, उनमें इस्लामी अख़लाक़ नाम की कोई चीज़ नहीं है और फिर ये बुज़ुर्गो के नाम के ठेकेदार बनते हैं, उर्स कराते, मज़ार बनवाते और उनके नाम की लम्बी लम्बी नियाज़े दिलवाते है, उनके नाम पर जलसे, जुलूस और महफ़िलों का इनइकाद करते हैं तो ये लोग कौम को बुज़ुर्गों से करीब करने के बजाय दूर कर रहे हैं और उनके ये ढंग लोगों के दिलों में अल्लाह वालों की महब्बत कभी भी पैदा न कर सकेंगे।

भाईयो! अल्लाह वालों से महब्बत करने वाले और उनकी महब्बत का बीज दूसरों के दिलों में बोने वाले वो हैं जिन्हें देखकर अल्लाह वालों की याद आ जाये। और अल्लाह वाले वो हैं जिन्हें देखकर अल्लाह की याद आ जाये। वरना ये पराये माल पर नज़र रखने वाले हरामखोर बेईमान, नियतख़राब लोग खुदाए तआला के उन बन्दों की अज़मत व इज़्ज़त लोगों के दिलों में नहीं बिठा सकेंगे कि जिन्होंने सब कुछ राहे खुदा में लुटा दिया। और अपना लालच के पिटारे, करोड़पति बनने की तमन्ना रखने वाले मुकर्रेरीन ,शाइरों कव्वालों, नामनिहाद पीरों फकीरों के ज़रीए से अल्लाह वालों की अज़मत व इज़्ज़त के झन्डे नहीं गाड़े जा सकते।

ज़रूरी है कि मुरीद अपने पीर का, शागिर्द अपने उस्ताद का और हर मुअतकिद अपने महबूब का नमूना हो तो तभी उससे अपने शेख और उस्ताद के कारनामे उजागर होंगे और उससे उनकी अज़मत लोगों के दिलों में बैठेगी। और जो लोग किसी बुज़ुर्ग के कारनामे और उसकी इस्लामी खिदमात अपने चाल व चलन किरदार व गुफ्तार के ज़रीए बताये बगैर ज़बरदस्ती उस बुज़ुर्ग शख्सियत को लोगों से मनवाने में लगे हैं, वो कौम में गिरोहबन्दी, तिफ़रक़ाबाजी कर रहे हैं और कौमे मुस्लिम को बिखेर रहे हैं, मुसलमानों को बांट रहे हैं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 123)

हलाल कमाने और दीनदार बनकर रहने की तरकीब

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जो शख्स हलाल कमा कर और दीनदार बन कर अल्लाह तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को राज़ी करना चाहे उसको चाहिए कि फुज़ूलखर्ची से बचे आजकल लोगों ने अपने इखराजात (ख़र्चे) बढ़ा लिये हैं और बेजा शौक और अरमान पूरे करने में लग गये हैं, ये कभी दीनदार नहीं बन सकते।
अगर आप सच्चे पक्के मुसलमान बनना चाहें तो आमदनी बढ़ाने से ज़्यादा फिक्र इख़राजात घटाने की रखिये क्यूंकि इखराजात की ज़्यादाती से आमदनी करने की हवस पैदा होती है और आमदनी करने की हवस इन्सान को बेरहम ज़ालिम और हरामखोर बनाती है - और जिनकी आदत आमदनी से ज्यादा खर्च करने की पड़ गई है, वो कभी चैन व सुकून से नहीं रह पाते, ज़िन्दगी भर परेशान रहते हैं और आमदनी से कम खर्च करने वालों की ज़िन्दगी बड़ी पुरसुकून और बाइज़्ज़त रहती है। और यही लोग वक़्त वे वक़्त दूसरों के भी काम आ जाते हैं।

इन्हीं वुजूहात की बिना पर कुरआने करीम में खुदाए तआला ने फुजूलख़र्च करने वालों को शैतान का भाई फ़रमाया और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि सादगी आधा ईमान है। आज साइंस की जदीद ईजादात ने भी इन्सान के इखराजात और उसकी ज़रूरतों को बढ़ा दिया है। इस पर कन्ट्रोल करने की ज़रूरत है। घर गृहस्थी की ज़रूरतों में एक दरमियानी रवय्या अपनाया जाये।

अफसोस कि आज हम दो चार जोड़ी कपड़ों में जिन्दगी
नहीं गुज़ार सकते बल्कि जोडों पर जोड़ें बनाये चले जा रहे हैं। अफसोस कि  आज मजबूत और पक्का मकान बनाकर भी चैन से  नहीं रहते बल्कि उनको सजाने और सँवारने में लाखों लाख रूपया उड़ाये चले जा रहे हैं ।

कुछ लोग शेख़ीख़ोरी की वजह से परेशान रहते हैं, उनकी यह आदत उन्हें ज़हनी सुकून हासिल नहीं होने देती। उन्हें हर वक़्त यह फिक्र रहती है कि अगर हम ऐसा कपड़ा पहन कर जायेंगे या ऐसा मकान नहीं बनायेंगे या ऐसा खाना नहीं खायेंगे और खिलायेंगे तो लोग क्या कहेंगे?

भाईयो! लोगों के कहने को मत देखो बल्कि अपने हाल और आमदनी को देखो। अगर आप पर अभी कोई वक़्त पड़ जाये तो यही मुंह बजाने वाले पास तक नहीं आयेंगे ,क़र्ज़ तक देने को तय्यार नहीं होंगे। हदीस पाक में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया :

"दुनिया में ज़िन्दगी मुसाफिर परदेसी की तरह गुज़ारो और
खुद को कब्र वालों में समझो।’’ (मिश्कात सफ़ा 450)

यअनी मुसाफिर और परदेसी जिस तरह कम से कम सामाने ज़िन्दगी के साथ सफर करता है यूं ही तुम भी दुनिया में एक मुसाफिर की तरह हो।

इस बयान से हमारा मतलब यह नहीं है कि खुदाए तआला हलाल कमाई से दे तो अच्छा खाना और पहनना नाजाइज़ है। बल्कि हमारा मकसद गैर ज़रूरी और फ़ालतू इखराजात से बाज़ रखना है ताकि कहीं आप कमाने की ज़्यादा फिक्र में बेईमान, ख़ाइन और हरामखोर न बन जायें और दीनदारी की ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए इखराजात पर काबू रखना और फुज़ूलखर्चियों से बचना ज़रूरी है।

और इस बारे में जाइज़  व नाजाइज़ की हुदूद जानने के लिए फिक्ह व तसव्वुफ की किताबों का मुतालआ करना चाहिए।खासकर सदरुश्शरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान की किताब ‘बहारे शरीअत का सोलहवाँ हिस्सा पढ़ लेना एक मुसलमान के लिए फ़ी ज़माना निहायत ज़रूरी है।

हिन्दी पढ़ने वालों की आसानी के लिए बहारे शरीअत का सोलहवाँ हिस्सा ‘इस्लामी अख़लाक व आदाब’ के नाम से हिन्दी मे भी आ चुका है।

आजकल जो बेईमानों, बेरहमी और ज़ुल्म करके कमाने वालों और पराये माल को अपना समझने वाले रिश्वतखोरों की तादाद ज़्यादा बढ़ गई है, यहाँ तक कि वो लोग जो मुआमलात के साफ सुथरे हों, उनकी गिनती अब न होने के बराबर है, इस सबकी ख़ास वजह आजकल बेजा इखराजात और फुज़ूलखर्चियाँ हैं।

खुलासा यह कि हरामखोरी से बचने और दीनदार बनकर जो शख्स ज़िन्दगी गुज़ारना चाहे, उसके लिए फुज़ूलख़र्च से बचना और सादा ज़िन्दगी गुजारना आजकल ज़रूरी है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 121)

हराम तरीके से कमाकर राहे खुदा में ख़र्च करना

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यह बीमारी भी काफी आम हो गई है। लोग कमाते वक़्त यह नहीं सोचते कि यह हराम है या हलाल।झूठ ,फरेब,मक्कारी,
धोकेबाजी, बेईमानी, रिश्वटखोरी सूद व व्याज और मजदूरों की मजदूरी रोक रोक कर कमाते हैं और माल जमा कर लेते हैं और फिर राहे खुदा में खर्च करने वाले सखी बनते हैं, खूब मजे से खाते हैं और यारों दोस्तों को खिलाते हैं, मस्जिद मदरसों और खानकाहों को भी देते हैं, माँगने वालों को भी दे देते हैं। यह हराम कमा कर राहे खुदा में खर्च करने वाले न हरगिज़ सखी है, न दीनदार। बल्कि बड़े बेवकूफ और निरे अहमक हैं। हदीस पाक में है, '‘हराम कमाई से सदका और खैरात कबूल नहीं।"
(मिश्कात बाबुलकस्ब सफ़ा 242)
यह ऐसा ही है जैसे कोई बेवजह जान बूझ कर  किसी की
आंख फोड़ दे और फिर पट्टी बांध कर उसे खुश करना चाहे।
भाईयो! खूब याद रखो अस्ल नेकी और पहली दीनदारी नेक कामों में खर्च करना नहीं है बल्कि ईमानदारी के साथ
कमाना है। जो हलाल तरीके और दयानतदारी से कमाता है और ज़्यादा राहे खुदा में खर्च नहीं कर पाता है वह उससे लाखों दर्जा बेहतर है जो बेरहमी के साथ हराम कमा कर इधर उधर बॉटता फिरता है।

इन हराम कमाने वालों, रिश्वतखोरों, बेईमानों, अमानत में
ख्यानत करने वालों में यह भी देखा गया है कि कोई मदीना
शरीफ जा रहा है और कोई अजमेर शरीफ और कलियर शरीफ़ के चक्कर लगा रहा है, हालाँकि हदीस शरीफ में है।
हजरत सय्यिदेना मआज़ इब्ने जबल रदियल्लाहु तआला
अन्हु को जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने यमन का हाकिम व गवर्नर बना कर भेजा तो आप उनको रुखसत करने के लिए नसीहत फरमाते हुए उनकी सवारी के साथ साथ मदीना तय्यिबा से बाहर तक तशरीफ लाये। जब हुजूर वापस होने लगे तो फ़रमाया कि ऐ मआज़! रदियल्लाहु तआला अन्हु इस साल के बाद जब तुम वापस आओगे तो मुझको नहीं पाओगे बल्कि मेरी क़ब्र और मस्जिद को देखोगे। हज़रत मआज़ रदियल्लाहु तआला अन्हु यह सुनकर शिद्दते फिराक की वजह से रोने लगे तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम  ने फरमाया : ‘‘लोगों में मेरे सबसे ज़्यादा क़रीब परहेज़गार लोग हैं, चाहें वो कोई हों और कही भी हों।" (मिश्कात सफ़ा 445)

यअनी हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने साफ
तौर पर फरमा दिया कि अस्ल नेकी और दीनदारी और महब्बत,नज़दीकी और पास रहना और हाज़िरी नहीं है बल्कि परहेजगारी यअनी बुरे कामों से बचना, अच्छे काम करना है ख्वाह वो कहीं रह कर हों ।

हज़रते उवैस करनी रदियल्लाहु तआला अन्हु हुज़ूर के
ज़माने में थे लेकिन कभी मुलाकात के लिए हाज़िर न हुए मगर हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को इतने पसन्द थे कि उनसे मिलने और दुआए मगफिरत कराने की वसीयत सहाबए किराम को फ़रमाई थी।
(सहीह मुस्लिम जिल्द 2 सफा 311)

एक हदीस शरीफ में तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनके बारे में तो यहाँ तक फ़रमा दिया कि मेरी उम्मत के एक शख्स की शफाअत से इतने लोग जन्नत में जायेंगे कि जितनी तादाद कबीलए बनू तमीम के
अफ़राद से भी ज्यादा होगी।
(मिश्कात बाबुलहौज़ वश्शफाअह सफ़ा 494)

इस हदीस की शरह में उलेमा ने फरमाया कि ’'उस शख्स"
से मुराद हजरत सय्यिदेना उवैस करनी रदियल्लाहु तआला अन्हु है।
(मिरकात जिल्द 5 सफ़ा 27)

इन अहादीस से खूब वाज़ेह हो गया कि अस्ल महब्बत पास
रहना नहीं, हाज़िरी व चक्कर लगाना नहीं, बल्कि वह काम करना है, जिससे महबूब राज़ी हो।

खुलासा यह कि जो लोग नमाज़ और रोज़े व दीगर अहकामे शरअ के पाबन्द हैं, हरामकारियों और हराम कामों से बचते हैं, वो ख़्वाह बुजुर्गों के मज़ारात पर बार बार हाजिरी न देते
हों, वो उनसे बदरजहा बेहतर और महब्बत करने वाले हैं जो
खुदाए तआला  व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की नाफरमानी करते, हराम खाते और हराम
खिलाते रात दिन गानों, तमाशों, जुए ,शराब और लाटरी
सिनेमों में लगे रहते हैं ख़्वाह हर वक़्त  मज़ार पर ही पड़े रहते हों। अलबत्ता वो लोग जो हज़राते अम्बियाएकिराम और औलियाए इज़ाम की शान में गुस्ताखियाँ करते हैं, बेअदबी से बोलते हैं और उनकी बारगाहों में हाज़िरी को शिर्क व बिदअत करार देते हैं उनके अक़ीदे इस्लामी नहीं, उनकी नमाज़ नमाज़ नहीं ,रोज़े रोज़े नहीं ,उनकी तिलावत  कुआन नहीं, उनकी दीनदारी इत्तिबाए रसूले अनाम नहीं,क्यूंकि अदब ईमान की जान है और बेअदब नाम का मुसलमान है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 118)


चन्दों की ज़्यादती

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आजकल चन्दे बहुत बढ़ते जा रहे हैं। इन पर रोक लगाना
बहुत जरूरी हो गया है जहाँ तक मदरसों और मस्जिदों का
मुआमला है तो ये कौम की ऐसी जरूरतों में से है कि जिनके
बगैर दीन बाकी नहीं रह सकता। लिहाजा उनके लिए अगर चन्दा लिया जाये तो कुछ हर्ज नहीं।

अलबत्ता गाँव गाँव मौलवियत की पढ़ाई के मदारिस खोलना मुनासिब नहीं है एक जिला में आलिम व फाज़िल बनाने वाले दो चार मदारिस काफी हैं। हाँ । बासलाहियत इमाम मसाजिद में रखे जायें और वह बगैर लम्बी पूरी चन्दे की तहरीक चलाये, इमामत के साथ साथ दो तीन जमाअत तक बच्चों को मौलवियत की इब्तिदाई तालीम दें और फिर बड़े मदरसों में दाख़िल करा दें तो यह निहायत मुनासिब बात है और खाली हाफ़िज़ बनाना और उन्हें इल्मे दीन और लिखने पढ़ने से महरूम रखना और इसी में उनकी उम्र गुजार देना उनके और कौम के हक में अच्छा नहीं है।

हाँ गाँव गाँव इस्लामी मकतब यअनी इस्लामी अन्दाज के
प्राइमरी स्कूल काइम करना बहुत ज़रूरी है जिसमें दीन की
जरूरी तालीम के साथ साथ दुनिया की भी तालीम हो।

मस्जिद की जहाँ जरूरत हो वहाँ अगर कोई सेठ साहब यूँ
ही बगैर दूसरों की मदद के बनवा दें तो वह यकीनन बहुत बड़े सवाब के मुस्तहिक होंगे और ऐसा न हो सके तो मस्जिद के लिए चन्दा करना और मस्जिद बनवाना निहायत बेहतर और उम्दा काम है । लेकिन मस्जिद की तज़ईन और उसकी सजावट और खूबसूरती के लिए गरीब, मजदूर और नादार मुसलमानों पर चन्दे डालना और उन पर गॉव बसती का दबाव बना कर वसूलयाबी करना हरगिज़ मुनासिब नहीं है। दुनिया भर में रसीद बुके लेकर घूमने और गरीब मजदूरों पर दबाव बना कर चन्दा वसूल करने से सादा सी मरिजद में नमाज पढ़ना बेहतर है। इस्लाम में मस्जिद का खूबसूरत होना कुछ भी जरूरी नहीं है। बल्कि पहले के उलेमा ने तो मस्जिदों को सजाने और संवारने से मना फरमाया है, बाद के उलेमा ने भी सिर्फ इजाजत दी है, लाजिम व जरूरी करार नहीं दिया है कि जिसके लिए गाँव गाँव फिरा जाये और दूर दूर के सफर किये जायें या ग़रीबों और मजदूरों को सताया जाये।

यह तो रहा मस्जिदों और मदरसों का मुआमला इसके
अलावा भारी भारी उर्स करने और खानकाहें और मजारात तामीर कराने के लिए चन्दे की कोई जरूरत नहीं है। आपसे जो हो सके अकीदत व महब्बत में हलाल कमाई से कीजिए। दूसरों के ज़िम्मेदार आप नहीं हैं अगर दो चार आदमी भी यौमे विसाल किसी बुजुर्ग की खानकाह में जाकर कुरआने करीम की तिलावत कर दें और थोड़ा बहुत जो मयस्सर हो वह उनके नाम पर उनकी रूह के ईसाले सवाब के खिलायें, पिलायें तो यह मुकम्मल उर्स है, जिसमें कोई कमी नहीं है।
और बखुशी बुज़ुर्गाने दीन के नाम पर जो कोई कुछ करे वह यकीनन इन्हदल्लाह माज़ूर है और सवाब का मुस्तहिक़ है।
 जलसे और जुलूस और कान्फ्रेन्सों के नाम पर भी चन्दों को एक मखसूस व महदूद तरीका होना चाहिए क्यूंकि आज हिन्दुस्तान में कौमे मुस्लिम बदहाली और बेरोजगारी का शिकार है। गरीबों,मजदूरों और छोटे छोटे किसानों से चन्दे के नाम पर जबरन रकम वसूल करके 10,-10, 20-20 और 50-50 लाख की हती रखने वाले पेशावर मुकर्रिरों और शाइरों को नज़राने के नाम पर लम्बी लम्बी रकमें भेंट चढ़ाना कौम के हक में कुछ बेहतर नहीं है।

 टैन्ट और डेकोरेशन वालों को भरने के लिए घर घर चन्दा
करते घूमना अक्लमन्दी नहीं है। हॉ कीजिए और मखसूस व
महदूद तरीके से एक दाइरे में रह कर कीजिए और जब जरूरत हो तब कीजिए।

और आजकल तो जलसे मुशाइरे बन कर रह गये और जो मुक़र्रेरीन हैं उनमें भी अकसर वाज़ व नसीहत वाले नहीं रंग व रोगन भरने वाले ज़्यादा हैं। और यह लम्बे लम्बे नज़राने पहले से तय करने वाले मुक़र्रेरीन व शाइरों को दूर दूर से बुलाना और उनके नखरे और ठस्से उठाना, बड़े पैमाने पर लाइट व डेकोरेशन सजाना ज्यादातर नाम व नमूद के लिए हो रहा है जो रियाकारी और दिखावा मालूम होता है और रियाकारी का कोई सवाब नहीं मिलता बल्कि अज़ाब होता है।

खुब पब्लिक जुटाने और मजमा बढ़ाने, मुकर्रीरो शाइरों से
तारीफ़ व तौसीफ सुनने के लिए हो रहा है। और जहाँ नाम व नमूद हो, रियाकारी और दिखावा हो, वहाँ चन्दे देने और दिलाने कुछ भी सवाब नहीं है। कमेटी वालों का मकसद सिर्फ यही है कि पब्लिक खूब आ जाये ख़्वाह उन्हें कुछ हासिल हो न हो । बल्कि बाज़ बाज़ जगह तो ये जलसे कराने वाले कमेटियों सदर, सेक्रटरी खजांची ऐसे तक हैं कि कौम से चन्द करके जलसे कराते हुए उन्हें मुद्दत हो गई मगर खुद भी नमाज़ी और दीनदार नहीं बन सके हैं।

शराब, जुआ, लाटरी और सिनेमा के शौक तक उनसे नहीं
छूट सके बल्कि अब तो बाज जगह जलसों के नाम पर चन्दा करके और थोड़ा खर्च करके लम्बी लम्बी रकम बचाने की रिपोर्ट भी मिल रही हैं।

इस सबको लिखने से हमारा मतलब यह नहीं है कि जलसे
बन्द कर दिये जाये। बल्कि जलसे किये जायें मुख्लिस वाएज़ीन व मुक़र्रेरीन  से तकरीरें कराई जायें। नातख्वानी के लिए कुर्ब व जवार के किसी खुशगुलू से एक दो नाते पटवाई जायें। पेशावर शाइरों और मुकर्रिरों को चन्दे करके  लम्बी लम्बी रकमें न दी जायें और ये सब न हो सके तो जलसे करना कोई फर्ज वाजिब नहीं हैं। मस्जिदों में बासलाहियत इमाम रखे जायें और वह नामाज़े  जुमा वगैरह में वअज़ व तकरीर करें और लोगों को उलेमाए अहले सुन्नत की किताबें पढ़ने की तरगीब दिलायें।

लड़कियों की शादी के लिए भी चन्द करने की बीमारी आम
हो गई है। हालांकि यह चन्दा गैर जरूरी इखराजात (ख़र्च) और शादी में नामवरी कमाने के लिए होता है।

इस्लाम में न जहेज़ (दहेज़) वाजिब है, न बारात को खाना खिलाना। इसमें दखल लड़के वालों की ज़्यादती का भी है।

खुलासा यह है कि बिल्कुल सादा निकाह भी कर दिया जाये
तो यह बिला शुबह जाइज़ बल्कि आज के हालात के मुनासिब है।

लड़कियों की शादी के लिए भीक मांगने वाले अगर भीक
माँगने के बजाय किसी ऐसे के साथ बेटी का निकाह कर दें, जो दूसरी शादी का ख्वाहिशमन्द हो और दो औरतों का कफ़ील हो सके या तलाक दे चुका हो या उसकी बीवी मर गई हो या वह गरीब हो या उम्रसीदा हो। और अपनी इन कमज़ोरियों की वजह से शादी में इखराजात का तालिब न हो, जैसा कि आजकल माहौल है तो यह उनके लिए भीक माँगने से हजारों दर्जे बेहतर है क्यूंकि लड़की की शादी के लिए भीक माँगना गुनाह व नाजाइज़ है और जिन लोगों का अभी हमने जिक्र किया है, उनके साथ निकाह बिला शुबह जाइज़ है। हॉ बगैर सुवाल करे कोई खुद ही से किसी की मदद करे तो इसमें कोई रोक टोक नहीं। लेकिन सुवाल करना और भीक मॉगना, इस्लाम में सिवाय चन्द मखसूस सूरतों के जो अहादीस व फ़िक़्ह की किताबों में मजकूर हैं, हराम है। और जो सूरतें मजकूर हुई, उनमें शादी ब्याह के गैर ज़रूरी मरासिम अदा करना हरगिज शामिल नहीं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 114)

Tuesday

चापलूसी पसन्द मुतवल्ली और मुहतमिम

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बाज़ जगह कुछ मस्जिदों के मुतावल्ली और और मदरसों के मुहतमिम का यह मिजाज़ बन गया है  की उन्हें अच्छे भले पढ़े लिखे बासलाहियत और दीनदार इमाम और मुदर्रिस अच्छे नहीं लगते,उनसे उनकी नहीं पटती।वह अच्छे लगते हैं, जो उनकी चापलूसी करते हैं, उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं, जब वह तशरीफ़ लाये तो उन्हें अपनी मसनद पर बिठायें, खुद एक तरफ को खिसक जाये और कभी कभी बे ज़रूरत उनकी डाँट और फटकार भी सुन लें। ऐसे मुदर्रिस और इमाम आज के बाज़ मुतावल्लियों और मुहतमिमों को बहुत अच्छे लगते हैं ख्वाह वह कुछ जानते हों या न बच्चों को पढ़ाते हों, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं, बस उनकी खुशआमद करते रहें।

दरअसल ऐसे मुतावल्ली और मुहतमिम इस्लाम की बरबादी का सबब हैं और उन्होंने मस्जिदों को वीरान कर रखा है और मदरसों का तालीमी मेयार बिल्कुल खत्म कर दिया है और इस बरबादी की पूछ गछ उनसे क़ियामत के रोज़ बड़ी सख्ती के साथ होगी।

दुआ है कि खुदाए तआला उन्हें होश अता फरमाये और ज़ात और नफ़्स से ज़्यादा उन्हें दीन और उसकी तरक्की से प्यार हो जाये, ख़्याल रहे कि इमामों, आलिमों, मौलवियों को परेशान करने वाले दुनिया व आख़िरत में ज़लीलव रूसवा होंगे।

यह भी बैठकर रोने की बात है कि आज बाज़ मदरसों में चन्दा कर लेना मकबूलियत का मेयार बन गया है । जो घूम फिर कर ज्यादा से ज्यादा चन्दा  लाकर जमा कर दें वह महबूब व मक़बूल हैं और भले सच्चे, पढ़े लिखे, काबिल, बासलाहियत आलिम साहब बेचारे गिरी नज़रों से देखे जा रहे हैं।

हदीसें पाक में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने क़ियामत की निशानियों में से एक बात यह भी फरमाई थी कि "जब मुआमलात नाअहलों के सुपुर्द किये जाने लगें। "

    यह आज खूब हो रहा है।अहले इल्म व फ़ज़्ल को कोई पूछने वाला नहीं और नाअहल बेइल्म चापलूस खुशामदी बातें बनाने वाले मसाजिद व मदारिस, मराकिज़ व दफातिर पर कब्ज़ा जमाये बैठे हैं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 113)

क्या नक़द और उधार की अलग अलग कीमत रखना मना है?

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अगर कोई शख्स अपना माल किसी के हाथ बेचे और यह कहे कि अगर अभी कीमत अदा कर दोगे तो इतने में और उधार खरीदोगे तो इतने पैसे होंगे। मसलन अभी 300 रुपया है और उधर खरीदोगे पैसे बाद में अदा करोगे तो 350 रुपये देना होंगे, तो यह जायज है इसको कुछ लोग नाजायज ख्याल करते हैं और सूद समझते हैं यह उनकी गलतफहमी है यह सूद नहीं है ।

 
हाँ अगर खरीदारी के वक्त इस बात को खोला नहीं और माल 300 रुपये में  फरोख्त कर दिया और रकम अदा करने में उसने देर की तो उससे पैसे बड़ा कर वसूल किये मसलन 350 रुपये लिये तो यह सूद हो जायेगा। मतलब यह है कि उधार और नकद का भाव अगर अलग अलग हो तो खरीदारी के वक़्त  ही इसकी वजाहत कर दे बाद में उधार की वजह से रकम बड़ा कर लेना  सूद और हराम है। ,
(फतावा रज़विया ,जिल्द 17, सफ़हा 97,मतबूआ रज़ा फाउन्डेशन, लाहौर ,   फतावा फैज़ुर्रसूल, जिल्द 2 सफ़हा 380  )
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 112)


रात को देर तक जागना और सुबह को देर से उठना

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आजकल रातों को जागने और दिन को सोने का माहौल बनता जा रहा है ।हालांकि क़ुरआने करीम की बाज़ आयात का मफ़हूम यह है कि हमने रात आराम के लिए बनाई और दिन काम करने के लिए। इस्लामी मिजाज़ यह है कि रात को ईशा की नमाज पढ़कर जल्दी सो जाओ और सुबह को जल्द उठ जाओ । ईशा की नमाज के बाद गैर ज़रूरी फालतू दुनियवी बातें करना मकरूह व ममनूअ है।
हदीस शरीफ में है
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ईशा की नमाज से पहले सोने और ईशा की नमाज के बाद बातचीत करने को नापसंद फरमाते थे यह हदीस बुखारी में भी है और मुस्लिम में भी।
(मिश्क़ात बावे तअजीलूस्सलात, फ़स्ले अव्वल, सफहा 60)
बाज़ मुदर्रिसीन और तलबा को देखा गया है कि वह रात को किताबें देखते हैं और काफी काफी रात तक किताबों और उनके हाशिये में लगे रहते हैं और सुबह की फजर की नमाज कजा कर देते हैं या नमाज पढ़ते भी हैं तो इस तरह की घड़ी देखते रहते हैं जब देखा कि दो-चार मिनट रह गए हैं और पानी सर से ऊंचा हो गया तो उठे हैं और जल्दी-जल्दी वुज़ू करके नमाज़ में  परिंदों की तरह चार चोंचें मारकर मुसल्ले से अलग हो जाते हैं
ऐसी नमाज़ को हदीसे पाक में हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मुनाफ़िक़ की नमाज फरमाया और उनमें के वह लोग जो नमाज़े छोड़ने या बेजमाअत के तंग वक़्त में मुनाफ़िक़ की सी नमाज़ पढ़ने के आदी हो गए हैं, उनके रात रात भर के मुतालेअ और किताबें देखना ,उन्हें नमाज़ की काहिली  और सुस्ती के अज़ाब से बचा न सकेंगे।

दरअसल ये वह लोग हैं जो किताबें पढ़ते हैं मगर नहीं जानते कि इल्म क्या है। ये तलबीसे इब्लीस के शिकार है और शैतान ने इन्हें धोके में ले रखा है कुछ का कुछ सुझा रखा है । ऐसे ही वो वाएज़ीन व मुकररेरीन,जलसे  करवाने वाले और जलसे करने वाले, तकरीरें करने वाले और सुनने और सुनाने वाले ,इस ख़याल में ना रहे हैं कि उनके जलसे उन्हें नमाज़े छोड़ने के अज़ाब से निजात दिलायेंगे । होश उड़ जायेंगे बरोज़े क़ियामत नमाजों में लापरवाही करने वालों के, और जल्दी-जल्दी मुनाफ़िक़ों  की सी नमाज़ पढ़ने वालों के चाहे यह अवाम हो या खवास , मुकर्रीर हो या शाइर, मुदर्रिस हो या मुफ्ती, सज्जादा नशीन हो या किसी बड़े बाप के बेटे या बड़ी से बड़ी  खानकाह के मुजाविर ।  और बरोज़े क़ियामत जब नमाज़ों  का हिसाब लिया जाएगा तो पता चलेगा कि कौन कौन कितना बड़ा खादिमे दीन और इस्लाम  का ठेकेदार था?
खुलासा यह कि रात को देर तक जागने और सुबह को देर से उठने की आदत अच्छी नहीं । हाँ अगर कोई शख्स इल्मे दीन के सीखने या सिखाने या इबादत व रियाज़त में  रात को जागे और फज्र की नमाज़ भी एहतिमाम के साथ अदा कर ले तो वह मर्दे मुजाहिद है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 110)

अमानत में तसर्रूफ़
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आजकल अमानत में तसर्रूफ़ आम हो गया है। उमूमन ऐसा होता है कि एक शख्स ने दूसरे के पास कोई रकम ,रुपया, पैसा बतौरे अमानत रख दिया और वह उसकी इज़ाज़त के वगैर उसमें से यह सोचकर ख़र्च कर देता है या तिजारत में लगा देता है कि देने वाले को मैं अपने पास से दे दूँगा  या अभी निकाल लूँ फिर बाद में पूरे कर दूँगा, यह सब गुनाह है और ऐसा करने वाले सब गुनाहगार हैं ख्वाह वह बाद में वह रकम उसे पूरी वापस कर दें क्योंकि अमानत में तसर्रुफ़ की इजाज़त नही ।

मस्जिदों के मुतवल्लियों और मदरसों के मुहतमिमों में देखा गया है कि वह चंदे के पैसों को इधर से उधर करते रहते हैं । कभी खुद अपनी ज़रूरतों में खर्च कर डालते हैं और ख्याल करते हैं हैं कि बाद में पूरा कर देंगे , यह सब खुदा के यहां पकड़े जायेंगे।

कुछ मुत्तक़ी , परहेज़गार व दीनदार बनने वाले तक इन बातों का ख्याल नहीं रखते और हराम को हलाल की तरह खाते हैं और अमानत में तसर्रूफ़ ही आदमी को एक दिन नियत ख़राब और खयानत करने वाला बना देता है । यह सोचकर खर्च कर लेता है कि बाद में अपने पास से पूरा कर दूंगा और फिर नियत खराब हो जाती है और फिर बड़े-बड़े परहेज़गार हरामखोर हो जाते हैं और खुदा के अज़ाब की फिक्र किये बगैर पराए माल को अपने की तरह खाने लगते हैं।

फ़तावा आलमगीरी में है
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एक शख्स ने मस्जिद बनवाने के लिए चंदा किया उसमें से कुछ रकम अपने लिए खर्च कर ली फिर इतनी ही रकम अपने पास से मस्जिद में खर्च कर दी तो ऐसा करना उसके लिए जाइज़ नहीं।
(फतावा रज़विया, जिल्द 8,सफहा 29, फतावा आलमगीरी, जिल्द 2, किताबुल वक़्फ़, बाब 13, सफहा 480)
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आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत फरमाते हैं
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ज़रे अमानत में तसर्रुफ़ हराम है,यह उन मवाज़ेअ में है जिनमे दराहिम व दनानीर मुतअय्यिन होते हैं।उसको जाइज़ नहीं कि उस रुपये के बदले दूसरे रुपये रख दे अगरचे बेऐनेही वैसा ही हो । अगर करेगा, अमीन न रहेगा ।
फिर आगे खास मदरसों के मुहतमिम हज़रात के बारे में फरमाते है
मोहतमिमाने अंजुमन ने अगर सराहतन भी इजाज़त दे दी हो कि तुम जब चाहना ख़र्च कर लेना फिर उसका इवज़ दे देना, जब भी न उसको तसर्रुफ़ जाइज़ न मुहतमिमों को इजाज़त देने की इजाज़त कि मुहतमिम मालिक नहीं और क़र्ज़ तबर्रुअ है और gaire मालिक को तबर्रुअ का इख्तियार नहीं। हाँ चंदा देने वाले इजाज़त दे जायें तो हर्ज नहीं ।
(फतावा रज़विया, जिल्द 8, सफहा 31)
पहले अमानत रखने वाले मुसलमानों का तरीका था कि वह थैलियां रखते और हर अमानत अलग-अलग एक थैली में महफूज रखते और फिर जो लिया था, खास उसी को लौटा देते।
भाइयों! ऐसे ही तरीके अपनाओ अगर कुछ आख़िरत की भी फिक्र है , वरना आज तसर्रूफ़ करने वाले होंगे और कल खाइन व  नियत खराब क्योंकि हर नफ़्स के साथ शैतान लगा हुआ है
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 108)


महफिले मीलाद में ज़िक्रे शहादत 

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कुछ लोग महफिलें मीलाद मेंहज़रत सय्यिदिना इमामे हुसैन  रदियल्लाहु तआला अन्हु और आप के भाइयों , भतीजो और भांजे की शहादत के वाकिआत बयान कर देते हैं हालांकि यह मुनासिब नहीं है।
       महफ़िले मीलाद , रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कि विलादत की खुशी की महफिल है इसमें ऐसे वाकिआत बयान नहीं करना चाहिए जिनको सुनकर रंज व मलाल, गम और दुख हो ।
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आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते है:
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उलेमाए किराम ने मजलिसे मीलाद शरीफ में ज़िक्रे शहादत से फरमाया है कि वह मजलिसे सुरूर है जिक्रे हुज़्न मुनासिब नहीं।
(अहकामे शरीअत, हिस्सा 2,सफ़हा 145)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 108)