Saturday

टाई बाँधना और बच्चों को बँधवाना

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टाई बांधना इस्लाम में सख्त मना है। यह ईसाईयों का मजहबी शिआर (पहचान) है। उनके अक़ीदे के मुताबिक हजरत ईसा अलैहिस्सलाम को यहूदियों ने फांसी दी थी। ईसाई इस फांसी के फंदे को गले में आज तक गले मे डाले हुए हैं ,जिसे टाई कहा जाता है ।

लेकिन कुरआन करीम में फरमाया गया है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को खुदाए तआला ने जिंदा उठा लिया और काफी हदीसों में यह बात साबित है कि अब भी हयाते ज़ाहिरी के साथ आसमानों पर तशरीफ़  फरमा है, क़ियामत के करीब ,ज़मीन पर तशरीफ़ लायेंगे और इस्लाम फैलायेंगें।लिहाज़ा इस्लामी नुक़्तए नज़र से फाँसी का वाकिया मन गढ़न्त है और गलत है जो यह अक़ीदा रखे कि ईसा अलैहिस्सलाम को फांसी दे दी गई वह मुसलमान नहीं बल्कि काफिर है क्योंकि वह क़ुरआन व हदीस का मुन्किर है।

   मुसलमानों! अब तो आँखें खोलो । तुमने काफिरों की नकल कि उसके अंदाज अपनाएं लेकिन मौजूदा दौर के हालात से यह खूब जाहिर हो गया है कि वह भी तुम्हारे दुश्मन ही रहे और तुम्हें मिटाने और कत्ल करने में कोई कमी नहीं कर रहे हैं।

लिहाज़ा अब खुदारा अपने इस्लामी तरीके अपनाओ सच्चे पक्के मुसलमान बनो । फिर देखना खुदाए तआला व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी राज़ी होंगे और दुनिया में भी इज़्ज़त व अज़मत नसीब होगी। इस मौके पर यह भी जान ले कि जो लोग छोटे बच्चों में लड़कों को लड़कियों की तरह और लड़कियों को लड़कों की तरह लिबास पहनाते हैं। इसका अज़ाब का गुनाह भी उन्हीं पहनाने वालों पर है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 107)

कुछ तारीखों को शादी ब्याह के लिए मनहूस जानना

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बाज लोग कुछ तारीखों में शादी ब्याह और खुशी का काम करने को मना करते हैं और खुद भी नहीं करते मसलन 3,13,23 और 8, 18, 28 इन तारीख को  शादी व खुशी के लिए बुरा जाना जाता है हालांकि ये सब बेकार बातें हैं और काफिरों और गैर मुस्लिमों की सी वहमपरस्तीयां हैं। इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है।

   निकाह शादी हर दिन और हर तारीख में जायज़ है माहे मोहर्रम में निकाह को बुरा जानना राफ़ज़ियो ,शीओ का तरीका है जो बाज़ जगह अहले सुन्नत में भी फैल गया है

मुसलमानों! इस्लाम को अपनाओ और सच्चे पक्के मुसलमान बनो, वहमपरसतियाँ छोड़ो खुदा व रसूल की पैरवी करो, मोहर्रम और सफर (चेहलम) को बुरा मत जानो।
( ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह, पेज 106)

बिल्ली रास्ता काट जाये तो क्या होता है?

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कुछ जगहों पर पर देखा गया है कि कोई शख्स गली और रास्ते में जा रहा है और सामने से बिल्ली गुजर गई जिसे रास्ता काटना कहते हैं तो वह कुछ देर के लिए ठहर जाता है और फिर बाद में चलने लगता है और वह समझता है कि बिल्ली ने रास्ता काट दिया शगुन खराब हो गए अब कोई नुकसान हो सकता है हालांकि ये सब बेकार की बातें हैं और इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं और एक मुसलमान को इस किस्म के ख्यालात कभी नहीं रखना चाहिए और यह नहीं समझना चाहिए कि बिल्ली के रास्ता काटने से कुछ होता है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 106)



Wednesday

क्या हर दीवाना मजज़ूब वली है?

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अल्लाह तआला के नेक बन्दो और औलिया किराम में एक खास किस्म मजज़ूबों की भी है। ये लोग हैं जो खुदाए तआला की महब्बत और उसकी याद में इतने गर्क हो जाते हैं कि उन्हें अपने तन बदन का होश नहीं रहता और दुनिया वालों को पागल और दीवानों से नजर आते हैं। लेकिन हर पागल और दीवाने को मजज़ूब नहीं ख्याल करना चाहिए। आजकल आम लोगों में यह मर्ज  पैदा हो गया है कि जिस पागल को देखते हैं उस पर विलायत और मजज़ूबियत का हुक्म लगा देते हैं और उसके पीछे घूमने लगते हैं। और अगर कोई है भी तो उसको उसके हाल पर छोड़ दीजिए वह जाने और उसका रब ।

बेहतर तरीका यह है कि अगर किसी शख्स के बारे में आपको ऐसा शक हो जाए तो उसकी बुराई भी मत कीजिए और उसके पीछे भी मत घूमिए। आप तो वह करो जिसका आपको खुदाए तआला ने हुक्म दिया- अहकामे शरअ की पाबन्दी करें बुरे कामों से बचें इस्लाम में ऐसा कोई हुक्म नहीं है कि दीवानों में तलाश करो कि उनमें कौन मजज़ूब है और कौन नहीं।

बाज़ जगह ऐसी सुनी सुनाई बातों पर यकीन करके कुछ लोगों को मजज़ूब करार दे दिया जाता है और फिर लाखों लाख रुपया खर्च करके उनके मरने के बाद मज़ार बना देते हैं और उर्सों के नाम पर मेले ठेले और तमाशे शुरू कर देते हैं। और उर्सों के नाम पर ये मेले और तमाशे दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं और इस्लाम और इस्लामियत के हक़ में यह अच्छा नहीं हो रहा है।

खुलासा यह है कि अगर कोई मजज़ूब है और वह खुदाए तआला की याद में बेहोश हुआ है तो उसका सिला और बदला उसको अल्लाह तआला देने वाला है । आपके लिए तो दूरी ही बेहतर है और ये जो अहले इल्म व फ़ज़्ल औलिया व उलेमा की सुहबत इख्तियार करने की फ़ज़ीलत आई हैं, ये मजज़ूबों के लिए नहीं। मजज़ूब की सुहबत से कोई फाइदा नहीं है।
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हुज़ूर मुफ्ती आज़म हिन्द मौलाना मुस्तफा रज़ा खां अलैहिर्रहमह फरमाते है
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हर कस व नाकस को मजज़ूब नहीं समझ लेना चाहिए और जो मजज़ूब हो उससे भी दूर ही रहना चाहिए कि इससे नफा कम और ज़रर(नुकसान) ज़ाइद पहुँचने का अंदेशा है।
(फतावा मुस्तफविया ,हिस्सा 3, सफहा 175)
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कुछ दीवाने सत्र खोले नंगे पड़े रहते हैं और लोग उनके पास जाकर उन की खिदमत करते हैं । यह गुनाह है क्योंकि वह अगर मजज़ूब भी हैं तब भी ऐसी हालत देखना नाजाइज़ है क्योंकि वह मजज़ूब है आप तो होश में हैं। मजज़ूब होने की बिना पर अगरचे उस पर गुनाह नहीं लेकिन आप उसके बदन के वो हिस्से देखेंगे जिनका छुपाना फर्ज है तो आप जरूर गुनहगार होंगे।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 104)

Sunday

खानकाही इख़्तिलाफात और इस सिलसिले में सही बात

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आजकल खानकाही इख़्तिलाफात का भी जोर है और एक पीर के मुरीद दूसरे के मुरीदों को और एक सिलसिले वाले दूसरे सिलसिले वालों को एक आंख नहीं भाते और उन्हें अपना दुश्मन जानते हैं और यह इसलिए कि उन्हें इस्लाम व कुरआन और अल्लाह का रसूल से महब्बत नहीं वरना यह हर मुसलमान और अल्लाह और रसूल पर ईमान रखने वाले से महब्बत करते ।

आजकल कुछ पीर भी ऐसे हैं कि उन्हें अपने ही मुरीद भाते हैं और अच्छे लगते हैं और दूसरों के मुरीदों को देखकर उनका खून खोलता है जबकि पीरी उस्तादी के आदाब व उसूल से है कि वह अपने शागिर्दों मुरीदों को जहां अपनी ज़ात से अक़ी दत व महब्बत सिखाये वहीं दूसरे अहले इल्म व फ़ज़्ल ,मशाइख और सुलहा की बेअदबी व गुस्ताख़ी से बचाये। बल्कि मुरीद करने का मकसद ही उसे बेअदबी से बचाना है क्योंकि इसमें ईमान की हिफाजत है और ईमान बचाने के लिए ही तो मुरीद किया जाता है और ईमान अदब का ही दूसरा नाम है।
जो पीर मुसलमानों को नफरत की तालीम दे रहे हैं और कौमे मुस्लिम को टुकड़ों में बांट रहे हैं, मुरीदों को मशाइख व उलेमा का बे अदब बना रहे हैं ,वो हरगिज़ पीर नहीं हैं बल्कि वो  शैतान का काम कर रहे हैं और इबलीस का लश्कर बढ़ा रहे हैं।
इस बारे में हक़ व दुरुस्त बात यह है कि जो मुसलमान किसी भी सिलसिलाए सहीहा में मुत्तासिलुस्सिलसिला पाबन्दे शरअ पीर का मुरीद है और उसके अक़ाइद दुरुस्त हैं, वह हमारा भाई है और मुरीद न भी हुआ हो वह भी यकीनन मुसलमान है और उसकी निजात के लिए यह काफी है। मुरीद होना ज़रूरी नहीं, मुसलमान होना ज़रूरी है। मुरीद होना सिर्फ एक अच्छी बात है, वह भी उस वक़्त जबकि पीर सही हो।

दरअसल पीरी व मुरीदी लड़ाई झगड़े और गिरोह बन्दी का सबब तब से बनी जब से यह ज़रीयए मआश और सिर्फ खाने कमाने और लम्बे लम्बे नज़रानों के हासिल करने का धन्धा बनी है। आज ज़्यादातर पीरों को इस बात की फ़िक्र नहीं कि मुरीद नमाज़ पढ़ता है कि नहीं, ज़कात निकालता है कि नहीं, सुन्नी है कि बद अक़ीदा ,मुसलमान हैकि ग़ैर मुस्लिम, उन्हें तो बस नज़राना चाहिए। जो ज़्यादा लम्बी नज़्र दे वही मियाँ के करीब है वरना वह मियाँ के नज़दीक बदनसीब है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 103)

मामूली इख़्तिलाफात को झगड़ों का सबब बनना

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बाज़ फुरुई और नौपैद मसाइल जिनका ज़िक्र सराहतन खुले अलफ़ाज़ में कुरआन व हदीस और फ़िक़्ह की मुस्तनद क़िताबों में नहीं मिलता, उनके मुताल्लिक कभी कभी आलिमों की राय अलग अलग हो जाती है। खास कर आज साइंस के दौर में नई नई ईजादात की बुनियाद पर ऐसे मसाइल कसरत से सामने आ रहे हैं तो कुछ लोग उलेमा के दरमियान इख्तिलाफात को लड़ाई,झगड़े, गाली गलौच ,लअन व तअन का सबब बना लेते हैं और आपस में गिरोह बन्दी कर लेते हैं, यह उनकी सख्त गलतफहमी है।

फरुई मसाइल में इख़्तिलाफ़ की बुनियाद पर पार्टीबन्दी कभी नहीं करना चाहिए । एक दूसरे को बुरा भला कहना चाहिए बल्कि जो बात आपके नज़दीक हक़ व दुरुस्त है वह दूसरों को समझा देना काफी अगर मान जाये तो ठीक वरना उन्हें उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए और उन्हें अपना मुसलमान भाई ही ख्याल करना चाहिए । मगर आजकल छोटी छोटी बातों पर आपस में लड़ाई , झगड़े, दंगे करना और पार्टियां बनाने की मुसलमान में बीमारी पैदा हो गई है । यह इसलिए भी हुआ कि आजकल लोग नमाज़ व इबादत व कुरआन की तिलावत और दीनी किताबों के पढ़ने में मशगूल नहीं रहते। खाली रहते हैं, इसलिए उन्हें खुराफात सूझती है और ख्वामखाह की बातों में लड़ते और झगड़ते है ।
कुछ लोग इस फुरुई इख़्तिलाफ़ को उलेमाए दीन की शान में गुस्ताखी करने और उन्हें बुरा भला कहने का बहाना बना लेते हैं । ऐसे लोग गुमराह व बद्दिन हैं । इनसे दूरी बहुत जरूरी है और इनकी सुहबत ईमान की मौत है। क्योंकि उलेमा ए दीन की शान में गुस्ताखी और मौलवियों को बुरा भला कहना बद मज़हबी है गुमराहओ की गुमराही की शुरुआत यहीं से होती है।

अहले इल्म व फ़ज़्ल असहाबे दयानत व अमानत में अगर किसी बात पर इख़्तिलाफ़ हो जाये ,उस बात पर अमल करना चाहिए और खुदाए तआला से रो रो कर तौफीक खैर और सीधे रास्ते पर काइम रहने की दुआ करते रहना चाहिए।

हदीस शरीफ में है की रसूले पाक   सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब जंगे खंदक से वापस मदीने में तशरीफ़ लाएं और फौरन यहूदियों के कबीले बनू क़ुरैज़ा पर हमले का इरादा फरमाया और सहाबा को हुक्म दिया की असर की नमाज बनू क़ुरैज़ा में चलकर पढ़ी जाए लेकिन रास्ते में वक्त हो गया यानी नमाज असर का वक्त खत्म हो जाने का अंदेशा हो गया तो कुछ सहाबा ने नमाज का वक्त जाने के खौफ से रास्ते में ही नमाज अता फरमाई और उन्होंने ख्याल किया कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मकसद यह नहीं था कि चाहे वक़्त जाता है लेकिन नमाज़ बनू क़ुरैज़ा ही में नहीं पढ़ी जाए और कुछ लोगों ने वक़्त की परवाह न की और नमाज़ असर बनू क़ुरैज़ा ही में जाकर पढ़ी। हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के  सामने जब यह जिक्र आया तो आपने दोनों ही को सही व दुरुस्त फरमाया दोनों में से किसी को बुरा नहीं कहा।
( सही बुखारी, जिल्द 1, सलातुल तालिब वलमतलूब, सफहा 129)

एक और हदीस शरीफ में है एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के दो सहाबा सफर को गए रास्ते में पानी ना मिलने की वजह से दोनों ने मिट्टी से तयम्मुम करके नमाज़ अदा फरमाई फिर आगे बढ़े पानी मिल गया और नमाज़ का वक़्त बाकी था। एक साहब ने वुज़ू करके नमाज़ दोहराई लेकिन दूसरे ने नहीं दोहराई । वापसी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाजिर होकर किस्सा बयान किया तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उन साहब से जिन्होंने नमाज़ नहीं  दोहराई थी और तयम्मुम की नमाज़  को काफी समझा था उनसे फरमाया तुमने सुन्नत के मुताबिक काम किया और दोहराने वालों से फरमाया तुम्हारे लिए दो गुना सवाब है।(निसाई ,अबू दाऊद ,मिश्क़ात बाबे तयम्मुम, सफहा 55) यानी हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दोनों को हक व दुरुस्त फरमाया इन हदीसों से पता चलता है कि इख़्तिलाफ़ के बाद भी दो गिरोह हक पर हो सकते हैं जब कि दोनों की नीयत सही हो । इन हदीसों से तक़लीदे अइम्मा का इन्कार करने वाली नाम निहाद जमाअत अहले हदीस (गैर मुकल्लिद) को सबक लेना है जो कहते हैं कि इख़्तिलाफ़ के बावजूद चारों मसलक यानी हनफ़ी, शाफ़ई, मलिकी,हम्बली कैसे हक़ पर हो गए।
हज़रत मौलाए कायनात सय्यिदिना व मौलाना अली मुर्तज़ा रदियल्लाहु तआला अन्हु और सय्यिदिना अमीरे मुआविया रदियल्लाहु तआला अन्हु में जंग हुई मगर दोनों का ही एहतिराम किया जाता है और दोनों में से किसी को बुरा भला कहना सख्त गुमराही और जहन्नम का रास्ता है।

इसकी मिसाल यू समझना चाहिए कि जैसे मां और बाप में अगर झगड़ा हो जाए तो औलाद अगर मां को मारे पिटे या गालियां दें तब भी बदनसीब व महरूम और अगर बाप के साथ ऐसा बर्ताव करे तब भी यानी औलाद को उस झगड़े ने इजाजत ना होगी कि एक ही तरफ होकर दूसरे की शान में बेअदबी करें बल्कि दोनों का एहतेराम जरूरी होगा या किसी शागिर्द के दो उस्तादों में लड़ाई हो जाए तो शागिर्द के लिए दोनों में से किसी के साथ बेहूदगी और बदतमीजी की इजाजत ना होगी।

 मकसद यह है कि बड़ों के झगड़ों में छोटों को बहुत एहतियात व होशियारी की जरूरत है।

इस उनवान के तहत हमने जो कुछ लिखा है उसका हासिल यह है कि जब कोई शख्स दीन की जरूरी बातों का मुनकिर और अक़ीदे में खराबी की वजह से इस मंजिल को ना पहुंच जाए कि उसको खारिजे इस्लाम और काफिर कह सकें तब तक उसके साथ नरमी का ही बर्ताव करना चाहिए और समझाने की कोशिश करते रहना चाहिए और खुदाए तआला से उसकी हिदायत की दुआ करते रहना चाहिए।

हां वह लोग जो दिन की जरूरी बातों के मुन्किर हो,
कुरआन व हदीस से साबित सरीह उमूर के काइल न हो,या या अल्लाह तआला और उसके महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और दीगर अम्बिया किराम व औलियाए किराम व औलिया इज़ाम व उलेमाए ज़विल एहतिराम की शान में तौहीन और गुस्ताखी करते, या गुस्ताखाने रसूल (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की तहरीकों और जमाआतों से कसदन जुड़े हुए हो, उनकी तारीफ करते हो, वह यकीनन इस लाइक नहीं बल्कि उनसे जितनी नफरत की जाये कम है क्यूंकि अल्लाह और अल्लाह वालों की शान में गुस्ताख़ी व बेअदबी इस्लाम में सबसे बड़ा जुर्म है, और ऐसे शख्स की सुहबत ईमान के लिए ज़हरीला नाग है।

उलेमाए अहले हक़ के दरमियान फुरुई इख़्तिलाफात क़ी सूरत में दोनों जानिब का इहतिराम व अदब मलहूज़ रखने का मशविरा जो हमने दिया है यह वाकई आलिम हो फकीह व मुहद्दिस हो। वरना आजकल के अनपढ़ जो दो चार उर्दू की किताबें पढ़ कर आलिम बनते या सिर्फ तकरीरे करके स्टेजों पर अल्लामा कहलाते,कुरआन व हदीस में अटकलें लगाते हैं, मसाइल में उलेमा से टकराते है,अपनी दुकान अलग सजाते हैं ये इसमें दाखिल नहीं बल्कि ये तो उम्मते मुस्लिमा में रखना अंदाज़ी करने वाले और फितना परवर हैं।
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सय्यिदि आला हज़रत फरमाते हैं >जहां इख़्तिलाफाते फुरुईया हो जैसे हनफ़ी और शाफ़ई फिरके अहले सुन्नत में वहाँ हरगिज़ एक दूसरे को बुरा कहना जाइज़ नही।
(अलमलफूज़ हिस्सा अव्वल सफहा 51)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 99)

 
शरीअत की मुखालिफत करने वाले पीर 

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आजकल ऐसे पीरों की तादाद भी काफी है जो नमाज़ रोज़ा व दीगर अहकामे शरअ पर न खुद अमल करते हैं और न अपने मुरीदों से अमल कराते हैं बल्कि इस्लाम व कुरआन की बातों को यह कह कर टाल देते हैं कि यह मौलवी लाइन की बातें हैं हम तो फ़क़ीरी लाइन के हैं यह खुले आम शरीअत इस्लामिया का इन्कार और नमाज़ रोज़े की मुखालिफ़त करने वाले पीर तो पीर, मुसलमान तक नहीं हैं। उनका मुरीद होना ऐसा ही है जैसे किसी गैर मुस्लिम को अपना पेशवा बनाना , क्योंकि शरीअते इस्लामिया का इन्कार ✳इस्लाम✳ ही का इन्कार है और यह कुफ्र है।
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सय्यिदी आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खां साहब अलैहिर्रहमह इरशाद फरमाते हैं ।
सराहतन शरीअते मुतह्हरह को मआज़अल्लाह मुअत्तल व मुहमल लग्व व बातिल कर देना यह सरीह कुफ्र व इरतिदाद व ज़िन्दका व इलहाद व मोजिबे लअनत व इबआद है ।
(मकाले उरफा , सफहा 9)
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हक़ यह है कि अल्लाह तआला का वली और अल्लाह तआला वाला वही है जो रसूले अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम ने बताया और खुद उस पर चल कर दिखाया । उसका  मुखालिफ़ हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मुखालिफ है और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि  वसल्लम का मुखालिफ अल्लाह तआला का मुखालिफ है और शैतान लईन का मुरीद है ।
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क़ुरआने करीम में खुदाए तआला का फरमान है ।
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#तर्जमा- ऐ महबूब तुम फरमाओ कि अगर तुम अगर अल्लाह तआला से महब्बत करते हो तो मेरा कहना मानो तुम अल्लाह तआला के प्यारे हो जाओगे और वह तुम्हारे गुनाहों को माफ फरमा देगा और अल्लाह तआला बहुत बख्शने वाला मेहरबान है  ।
  (पारा 3, रूकू 12)
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इस आयते करीमा से खूब मालूम हुआ कि अल्लाह तआला तक पहुंचने के सारे रास्ते हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम ही के  कदमों से गुज़रते हैं वह आलिमों मौलवियों के हो या फकीरों दुरवेशों के । हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम का रास्ता छोड़कर हरगिज़ कोई खुदाए तआला तक नहीं पहुंच सकता । और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का रास्ता ही शरीअते  इस्लामिया है और तरीकत भी इसी का एक टुकड़ा है इसको शरीअत से जुदा मानना गुमराही है ।

कुछ गुमराह पीरों के गुमराह मुरीदों को यह कहते भी सुना गया है कि हमने अपने पीर का दीदार कर लिया यही हमारी नमाज़ व इबादत है उनका यह कौल सख्त बद दीनी है । नमाज़ इस्लाम में इतनी अहम है इसको अगर मुरीद छोड़ेंगे तो वह कब्र व हश्र में अज़ाबे  इलाही का मज़ा चखेंगे और पीर छोड़ेंगे तो वह भी आख़िरत में खूब ठोंके जाएंगे और वह पीर ही नहीं । जो ना खुद अल्लाह तआला की इबादत करें ना दूसरों को करने दें।

नमाज का तो इस्लाम में इतना बुलंद मकाम है कि हुज़ूर सय्यिदे आलम अहमदे मुजतबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब मक्कए मुअज़्ज़मा से हिजरत फरमा कर मदीना तैय्यिबा तशरीफ़ लाए थे तो आपने अपने घर वालों के रहने के लिए हुजरे और मकानात बाद में तामीर फरमाए थे पहले खुदाए तआला की इबादत यानी नमाज़ के लिए मस्जिद शरीफ की तामीर फ़रमाई थी जो आज भी है उसका एक एक हिस्सा अहले ईमान के लिए दिल व जान से बढ़ कर है।

हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि नमाज़ मेरी आंखो की ठंडक है और नमाज़ जन्नत की कुंजी है पहले जमाने के बुज़ुर्गाने  मुरशिदाने किराम सूफी और दुरवेश सब के सब नमाज़ी दीनदार और निहायत दरजा हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शरीअत पर चलने वाले परहेज़गार होते थे।
वह यह नहीं कहते कि हम फकीरी लाइन के हैं हम पर नमाज़ माफ है बल्कि वह औरों से ज्यादा सारी सारी रात नमाज़ पढ़ते थे । आजकल के कुछ जाहिल नाम निहाद  सूफियों और पीरों ने सोचा कि पीरी भी चलती रहे और आजादी व आराम ने भी कोई कमी ना आए इसलिए वह अहकामे शरअ नमाज़ व रोज़े वगैरा की मुखालिफत करते हैं ।

गौर करने की बात है कि पहले के बुजुर्गों के आस्ताने और मज़ार जहां मिलेंगे वहीं मस्जिदे भी जरूर मिलेंगी। अजमेर शरीफ मैं ख्वाजा गरीब नवाज़ मोइनुद्दीन चिश्ती का  आस्ताना दिल्ली में हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, हज़रत निज़ामुद्दीन महबूब ए इलाही, हज़रत नसीरुद्दीन चिराग देहलवी ,हजरत शैख अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी वगैरा की खानकाहे लाहौर में हजरत शैख दातागंज बख्श का आस्ताना , नागौर शरीफ में हजरत सूफी हमीदुद्दीन नागौरी, कछौछा में हज़रत शैख मखदूम अशरफ समनानी, पाक पटन में हज़रत फरीदुद्दीन गंज शकर, कलियर शरीफ में हज़रत शैख अलाउद्दीन साबिर कलियरी वगैरा इन सबके आस्तानों पर आपको जहां मज़ारात मिलेंगे वहाँ मस्जिदे भी मुत्तसिल बनी हुई नजर आयेगी। इस मे राज़ यह है कि यह हज़रात जहां क़ियाम फरमाते ठहरते और बिस्तर लगाते वहाँ ख़ुदा तआला का घर यानी मस्जिद बनाकर अज़ान और नमाज़ से उसको आबाद फरमाते और जब उन्होंने खुद खुदाए तआला की इबादत करके उसके घरों को आबाद किया तू खुदाए तआला ने उनके दर आबाद कर दिये।

और इस्लाम इन्हीं दो चीज़ों का नाम है कि खुदाए तआला की इबादत इताअत भी होती रहे और उसके महबूब बन्दों, खासाने खुदा हज़राते अम्बिया व  औलिया की ताज़ीम और उनसे महब्बत भी होती रहे।
जो खुदाए तआला के अलावा किसी और की इबादत पूजा और परसतिश करें वह मुसलमान नहीं और जो खुदा वालों से महब्बत का मुतलकन इनकार करें उनकी बारगाहों में बेअदबी से पेश आए गुस्ताखी करे वह भी इस्लाम से ख़ारिज है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 95)

Saturday

बुज़ुर्गों की तसवीरें घरों में रखना

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आजकल बुजुर्गाने दीन की तस्वीरें और उनकी फोटो घरो दुकानों में रखने का भी रिवाज़ हो गया है । यहां तक कि कुछ लोग पीरों , वलियों की तस्वीरें फ्रेम में लगाकर घरों में सजा लेते हैं और उन पर मालाये डालते अगरबत्तियां सुलगाते यहां तक कि कुछ जाहिल अनपढ़ उनके सामने मुशरिकों, काफिरों ,बुतपरस्तो की तरह हाथ बांध कर खड़े हो जाते हैं । यह बातें सख्त तरीन हराम , यहां तक कि कुफ्र अंजाम है बल्कि यह हाथ बांधकर सामने खड़ा होना उन पर फूल मालाएं डालना है यह काफिरों का काम है ।
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सय्यिदी आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खां साहब अलैहिर्रहमह इरशाद फरमाते हैं ।
अल्लाह अज़्ज़ वजल इबलीस के मक्र से पनाह दे । दुनिया मे बुत परस्ती की इब्तिदा यूंही हुई कि अच्छे और नेक लोगों की महब्बत में उनकी तसवीरें बना कर घरों और मस्जिदों में तबर्रुकन रख ली । धीरे धीरे वहीं मअबूद हो गई
(फतावा रज़विया , जिल्द 10 , क़िस्त 2 , मतबूआ बीसलपुर , सफ़हा 47)
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बुखारी शरीफ और मुस्लिम शरीफ की हदीस में है कि वुद ,सुवाअ, यऊक और नसर जो  मुशरिकीन के मअबूद और उनके बुत थे जिनका ज़िक्र क़ुरआने करीम मे भी आया है। यह सब कौमे नूह के नेक लोग थे उनके विसाल हो जाने के बाद कौम ने उनके मुजस्समे बना कर अपने घरों में रख लिये उस वक़्त सिर्फ महब्बत में ऐसा किया गया था लेकिन बाद के लोगों ने उनकी इबादत और परसतिश शुरू कर दी । इस किस्म की हदीसे कसरत से हदीस की किताबों में आई हैं ।
खुलासा यह कि तसवीर, फ़ोटो इस्लाम में हराम हैं ।और पीरों, वलियों, अल्लाह वालों के फ़ोटो और उनकी तसवीरें और ज़्यादा हराम हैं । काफिरों , इस्लाम दुश्मन ताक़तों की साजिशें चल रही हैं वह चाहते हैं कि तुमको अपनी तरह बनायें और तुम से कुफ्र करायें खुद भी जहन्नम में जायें और तुमको भी जहन्नम में ले जायें।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 94)

मालदार होने के लिए मुरीद होना

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आजकल ज्यादातर लोग इसलिए मुरीद होते हैं कि हम मालदार हो जाएंगे या दुनियावी नुकसानात से महफूज़ रहेंगे। कितने लोग यह कहते सुने जाते हैं कि हम फलां पीर के साहब से मुरीद हो कर मालदार हो गए अफसोस का मकाम है पीरी मुरीदी कभी रुश्द व हिदायत, ईमान की हिफाज़त और शफ़ाअत और जन्नत हासिल करने का ज़रिआ ख़्याल की जाती थी आज वह हुसूले दौलत व इमारत या सिर्फ नक्श व तावीज़ , पढ़ना और फूँकना बन कर रह गई है। अब शायद ही कोई खुशनसीब होगा जो अहले इल्म व फ़ज़्ल उलमा , सुलहा या मज़ारते मुक़द्दसा पर इस नियत से हाज़िरी देता हो कि उनसे गुनाहों की मगफिरत और खत्मा अलल ईमान की दुआ कराएगें।
इस्लाम में दुनिया को महज एक खेल तमाशा कहा गया और आख़िरत को बाकी रहने वाली , लेकिन जिसका पता नहीं कब साथ छोड़ जाए उसको संवारने, बनाने में लग गए और जहां सब दिन रहना है उसको भुला बैठे । हदीसे पाक में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब तुम किसी बंदे को देखो कि अल्लाह तआला उसको गुनाहों के बावजूद दुनिया दे रहा है मगर हक़ तआला की तरफ से बजाए पकड़ के नेमतें मिल रही हैं तो यह नेमतें नहीं बल्कि अज़ाब है। रात दिन दौलत कमाने में लगे रहने वाले अब मस्जिदों , खानकाहों में कभी आते हैं तो सिर्फ दौलत दुनिया और ऐश व आराम की फ़िक्र लेकर । किस कद्र महरूमी है। खुदाए तआला आख़िरत की फ़िक्र करने की तौफीक अता फरमाए।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 93)

पीर से पर्दा

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यह बात काफी मशहूर है कि पीर से पर्दा नहीं है हालाँकि असलियत यह है कि पर्दे के मामले में पीरों आलिमों इमामों का अलाहिदा से कोई हुक्म नहीं  ।
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सय्यिदी आलाहज़रत रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं
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पर्दे के मामले में पीर व ग़ैरे पीर हर अजनबी का हुक्म यकसां है जवान औरत को चेहरा खोलकर भी सामने आना मना और बुढ़िया के लिए जिससे एहतिमाल फितना न हो मुज़ाइका (हरज) नहीं ।

(फतावा रज़विया , जिल्द 10 ,सफहा 102)

अगर सही पीर न मिले तो क्या करना चाहिए?

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अक़ाइदे सहीहा पर काइम रहे अहकामे शरीअत परअमल करे और तमाम औलिया किराम और उलमाए ज़विल एहतिराम से महब्बत करें । हुज़ूर पुरनूर सय्यिदना गौसे आज़म रदियल्लाहु तआला अन्हु से अर्ज़ की गई कि अगर कोई शख्स हुज़ूर का नाम लेवा हो और उसने न हुज़ूर के दस्ते मुबारक पर बैअत की हो न हुज़ूर का खिरका पहना हो क्या वह हुज़ूर के मुरीदों में है तो फ़रमाया: जो अपने आप को मेरी तरफ मनसूब करे और अपना नाम मेरे गुलामों में शामिल करे अल्लाह तआला उसे कबूल फरमाएगा और वह मेरे मुरीदों के जुमरे में है।
(ब हवाला फतावा अफ्रीका, सफहा 140)

इसके अलावा सय्यिदना शैख़ अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी अलैहिर्रहमह ने फरमाया कि जिसको पीरे कामिल जामेअ शराइत न मिले वह हुज़ूर (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ) पर कसरत से दुरूद पढ़े।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 92)



काफिरों को मुरीद करना

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कुछ जाहिल नाम निहाद पीर काफ़िरों को मुरीद कर लेते है जब की काफ़िरों को जब तक वो  कुफ़्र और उसके लवाज़िमात से तौबा करके और कलमा पढ़ कर मुसलमान न बने उनको मुरीद करना उनके लिए मुरीद का लफ़्ज़ बोलना जहालत है। अजब बात है महादेव की पूजा कर रात दिन ,बूतों के सामने दंडवत करें और मुरीद आप का कहलाए। जो खुदा और रसूल का नहीं वो आपका कैसे हो गया?
सही  बात यह है कि वह आपका मुरीद न हुआ बल्कि उसकी मालदारी देख कर आप उसके मुरीद हो गए हैं।
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सय्यिदी आला हज़रत रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं ।
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कोई काफ़िर ख्वाह मुशरिक हो या मुवहहिद हरगिज़ न दाख़िले सिलसिला हो सकता है और न बे इस्लाम उसकी बैअत मुअतबर न कल्बे इस्लाम उसकी बैअत मुअतबर अगरचे बाद को मुसलमान हो जाए कि बैअत हो या कोई और अमल सब के लिए पहली शर्त इस्लाम है।
(फतावा रज़विया ,जिल्द 9, सफहा 157)
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काफ़िरों को मुरीद करने वाले कुछ पीर कहते है की हम ने उसे इसलिए मुरीद कर लिया है की वो हमारी मुहब्बत में मुसलमान हो जाए। ठीक है आपकी ये नियत है तो उसके साथ अच्छे अख़लाक़ और किरदार से पेश आइये लेकिन जब तक मुसलमान न हो उसे मुरीद न कहिये । और ज़रा यह भी बताइए कि अब तक आपने मुरीद करके कितने काफिर मुसलमान बनाए हैं आज तो वह ज़माना है कि  ग़ैर मुस्लिमों से वही दोस्ती और यारी रखने वाले मुसलमान ही काफ़िर या उनकी तरह हो रहे हैं । और मिसाल में उन बुजुर्गों के अखलाख व किरदार को पेश करते हैं जिन्होंने एक एक सफर में 90 90 हज़ार काफिरों को कलमा पढ़ाया ख्याल रहे कि तुममें और उनमें बड़ा फर्क है वह काफिरों को मुसलमान करते थे और तुम ताल्लुकात रखकर खुद उनकी तरह होते जा रहे हो पहले के बुजुर्गों के बारे में तारीख में ऐसी कोई मिसाल नहीं कि उन्होंने पहले मुरीद कर लिया हो और बाद में वह मुसलमान हुआ हो बल्कि पहले मुसलमान करते फिर मुरीद।  तुम में हिम्मत हो तो ऐसा ही करो

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 91)

क्या पीर के लिए सय्यिद होना ज़रूरी है?

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आज कल ये प्रोपेगण्डा किया जाता है कि पीर बनने और मुरीद करने का हक़ सिर्फ़ सय्यदों को है,ऐसा प्रोपेगण्डा करने वालों में ज़्यादातर वो लोग हैं,जो सय्यद नहीं होकर भी ख़ुद को आले रसूल और सय्यिद कहलवाते हैं.
सादात ए किराम से मुहब्बत और उनकी तअज़ीम अहले ईमान की पहचान है,निहायत ही बदबख़्त और बदनसीब है वो जिसे आले रसूल से मुहब्बत ना हो, *लेकिन पीर के लिए सय्यद होना ज़रूरी नहीं.*
क़ुरआन में है:
तर्जमा: *तुम में अल्लाह के हुज़ूर शराफ़त व इज़्ज़त वाले मुक्तक़ी और परहेज़गार लोग हैं.*
हज़रत सय्यिदना ग़ौसे आज़म ख़ुद नजीबुत्तरफ़ैन हसनी हुसैनी सय्यिद हैं,लेकिन ग़ौसे आज़म के पीरो मुरशिद शैख़ अबू सईद मख़ज़ूमी और उनके पीर शैख़ अबुल हसन हक्कारी और उनके मुरशिद शैख़ अबुल फ़रह तरतूसी,यूंही सिलसिला ब सिलसिला शैख़ अब्दुल वाहिद तमीमी,शैख़ अबु बक्र शिबली,जुनैद बग़दादी,शैख़ सिर्री सक़ती,शैख़ मअरूफ़ करख़ी रदिअल्लाहु अन्हुम में से कोई भी सय्यिद व आले रसूल नहीं.
सुल्तानुल हिन्द ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ अलैहिर्रहमह के पीरो मुरशिद हज़रत शैख़ ख़्वाजा उस्माने हारूनी भी सय्यिद नहीं थे.
अब फिर भी ये कहना के पीर के लिए सय्यद होना ज़रूरी है,यह बहुत बड़ी जहालत व हिमाक़त है.
आला हज़रत फ़रमाते हैं,पीर के लिए सय्यिद होने की शर्त ठहराना तमाम सलासिल को बातिल करना है.सिलसिल ए आलिया क़ादरिया में सय्यिदना इमाम अली रज़ा और ग़ौसे आज़म के दरमियान जितने हज़रात हैं वो सादात ए किराम में से नहीं हैं.और सिलसिल ए आलिया चिश्तिया में तो सय्यिदना मौला अली के बाद ही इमाम हसन बसरी हैं, जो ना सय्यिद हैं ना क़ुरैशी ना अरबी,और सिलसिल ए आलिया नक़्शबन्दिया का ख़ास आग़ाज़ ही सय्यिदना सिद्दीक़ ए अकबर रद़िअल्लाहु अन्हु से है.
(फ़तावा रज़विया जिल्द 9,स:114 मतबूआ बीसलपुर)
और हुज़ूर के सहाबा जिनकी तादाद एक लाख से भी ज़्यादा है,उनमें चन्द को छोड़ कर कोई सय्यिद और आले रसूल नहीं,लेकिन उनके मरतबे को कोई क़यामत तक नहीं पहुँच सकता,चाहे सय्यद हो या ग़ैरे सय्यद।
(गलत फहमियां ओर उनकी इस्लाह, पेज 91)


मुरीद होना कितना ज़रूरी ?

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आजकल जो बैअत राइज है उसे बैअत तबर्रुक कहते हैं जो फ़र्ज़  है ना वाजिब और न ऐसा कोई हुक्मे शरई कि जिसको न करने पर गुनाह या आख़िरत में मुवाखिज़ा हो ।

हाँ अगर कोई सही पीर मिल जाए तो उसके हाथ में हाथ देकर उसका मुरीद होना यकीनन एक अच्छा काम और बाइसे खैर व बरकत है और इसमें बेशुमार दीनी वह दुनियावी फायदे हैं ।

लेकिन इसके बावजूद अगर कोई शख्स अकाइद दुरुस्त रखता हो ,  बुज़ुर्गाने दीन और उलमाए किराम से महब्बत रखता हो और किसी खास पीर का मुरीद न हो तो उसके लिए यह अक़ाइद ईमान की दुरुस्तगी  , औलियाए किराम व उलमाए ज़विल एहतिराम से महब्बत ही काफी है । और किसी खास पीर का मुरीद ना होकर हरगिज वह कोई शरई मुजरिम या गुनाहगार नहीं है मगर आजकल गांव-देहातों में कुछ जाहिल बे शरअ पीर यह प्रोपेगंडा करते हैं कि जो मुरीद न होगा उसे जन्नत नहीं मिलेगी यहां तक कि कुछ नाख्वान्दा पेशेवर मुकर्रीर जिनको तकरीर करने की फुर्सत है मगर किताबें देखने का वक्त उनके पास नहीं । जलसों में उन जाहिल पीरो को खुश करने के लिए यह तक कह देते हैं जिसका कोई पीर नहीं उसका पीर शैतान है और कुछ नाख्वान्दे इसको हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमान बताते हैं।  और इससे आज की पीऱी मुरीदी मुराद लेते हैं अव्वलन तो यह कोई हदीस नहीं । हां कुछ बुजुर्गों से जरूरी मनकूल है कि जिसका कोई शैख़ नहीं उसका शैख़ शैतान है । तो उस शैख़ से मुराद मुरशिदे आम है न कि मुरशिदे खास । और मुरशिदे आम कलामुल्लाह व कलामे अइम्मा शरीअत व तरीकत व कलामे उलमाए ज़ाहिर व  बातिन है। इस सिलसिलए सहीहा पर कि अवाम का हादी कलामे उलमा और उलमा का रहनुमा कलामें अइम्मा और अइम्मा का मुरशिद कलामे  रसूल (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) और रसूल (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) का पेशवा कलामुल्लाह ।
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सय्यिदी व सनदी आला हज़रत रहमतुल्लाहि तआला अलैहि फरमाते हैं *
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सहीहुल अक़ीदा कि अइम्मए हुदा को मानता ,तक़लीद अइम्मा को ज़रूरी जानता, औलियाए किराम का सच्चा मुअतकिद ,तमाम अक़ाइद में राहे हक़ पर मुस्तकीम वह हरगिज़ बे पीर नहीं, वह चारों मुरशिदाने पाक यानी कलामे खुदा और रसूल व अइम्मा व उलमाए ज़ाहिर व बातिन उसके पीर है अगरचे ब-ज़ाहिर किसी खास बन्दए ख़ुदा के दस्ते मुबारक पर शरफे बैअत से मुशर्रफ न हुआ हो।

(निकाउस्सलाफ़ह फिल अहकामिल बैअत वल खिलाफह, सफ़हा 40)

    और फरमाते है
रस्तगारी (जहन्नम से नजात और छुटकारे) के लिए नबी को मुरशिद जानना काफी है।

(फतावा अफ्रीका ,सफहा 136)
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इस सिलसिले में मजीद तहक़ीक़ व तफसील के लिए आला हज़रत अलैहिर्रहमह की तसनीफात में फतावा अफ्रीका, बैअत क्या है और निकाउस्सलाफ़ह वगैरा क़िताबों का मुतालआ करना चाहिए।
 
   खुलासा यह कि अगर जामेअ शराइत मुत्तबेअ शरअ पीर मिले मुरीद हो जाए कि बाइसे खैर व बरकत और दरजात की बुलन्दी का सबब है । और ऐसा लाइक व अहल पीर न मिले तो ख्वाही न ख्वाही गांव गांव फेरी करने वाले जाहिल बे शरअ, उलमा की बुराई करने वाले नाम निहाद पीरों के हाथ मे हाथ हरगिज़ न दे । ऐसे लोगों से मुरीद होना ईमान की मौत है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 89)

कुतुब सितारे की तरफ पैर करके न सोना

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यह मसअला अवाम में काफी मशहूर हो गया है और हिन्दुस्तान में काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि उत्तर की सम्त पैर फैलाना मना है क्योंकि उधर कुतुब है यहां तक की अगर कोई उत्तर की जानिब पांव करके लेटे या सोए तो उसको निहायत बुरा जानते हैं और मकानों में चारपाईयां डालने में इस बात का खास ख्याल रखते हैं की सरहाना या तो पश्चिम की तरफ हो या उत्तर की जानिब।

शरअन क़िब्ले की जानिब पाँव फैलाना तो यकीनन बेअदबी व महरूमी है इसके अलावा बाकी तमाम सम्ते इस्लाम में बराबर है किसी को किसी पर कोई बरतरी व फ़ज़ीलत नहीं।

आला हजरत मौलाना शाह अहमद रज़ा खान साहब रहमतुल्लाहि तआला अलैह इरशाद फरमाते हैं
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यह मसअला जाहिलों में बहुत मशहूर है, कुतुब अवाम में एक सितारे का नाम  है तो तारे तो चारों तरफ है किसी तरफ़ पैर न करें।
(फतावा रज़विया, जिल्द 10, क़िस्त 2 मतबूआ बीसलपुर, सफ़हा 158, अलमलफूज़, जिल्द 2, सफ़हा 57)
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यानी अगर कुतुब सितारे की वजह से उत्तर की तरफ पैर करके सोना मना हो जाए तो सितारे चारों तरफ किसी जानिब पैर फैलाना जाइज़ नहीं होगा ।
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आजकल अगर लोग यह रिवाज़ को मिटाने और गलतफहमी को दूर करने के लिए चारपाइयों की पाइती उत्तर की जानिब रखें तो वह अज्र के मुस्तहिक़ होंगे और उन्हें यह गलत रिवाज़ को मिटाने का सवाब मिलेगा ।

कुछ लोग यह कहते हैं की मय्यत को कब्र में लिटाते वक़्त उसका सर क़ुतुब यानी उत्तर की जानिब क्यों किया जाता है । तो बात यह है की मय्यत का सर उत्तर की  तरफ करने या कब्र में उसे दाहिनी करवट लिटाने का मामूल इसलिए है ताकि उसका चेहरा क़िब्ले की तरफ हो जाए । और सोने या लेटने में क़िब्ले की तरफ मुँह रखने का कोई हुक़्म नहीं और सोने और लेटने वाला एक करवट नहीं रह सकता । लिहाज़ा उसका चेहरा क़िब्ले की तरफ नहीं रह पाता वह करवटे बदलता है मुर्दे में यह सब नहीं और सोते वक़्त भी अगर कोई क़िब्ले की तरफ चेहरा करले तो अच्छी नियत की वजह से यह अमल भी अच्छा ही है लेकिन शरअन ज़रूरी नहीं ।  और जो लोग उत्तर की तरफ पैर करके सोने को मना करते हैं उनका मकसद तो कुतुब की ताजीम करना होता है नाकी चेहरे को क़िब्ले की तरफ करना और कुतुब सितारे की ताज़ीम का हुक्म अगर इस्लाम में कहीं आया हो तो हमें भी बताये या लिखकर भेजें ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 86)

बेवा औरतों के निकाह को बुरा समझना 

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बेवा औरतों के लिए इस्लाम में निकाह जायज है और लोगों की बदनियती, बदनिगाही और फ़ासिद इरादों और बदकारी से बचने के की नीयत से हो तो बिला शुबहा बाइसे अज्र व सवाब हैं और निकाह करने पर बिला वजह किसी औरत पर लअन-तअन करना उसको बुरा भला कहना या बेवा औरत को मनहूस ख्याल करना सब गुनाह है।
आजकल के माहौल में बदकारो ,ज़िनाकारों ,अय्याशों, होटलों, क्लब घरों और रन्डी खानों में अय्याशी व ज़िनाकारी करने वाले मर्दोंऔर औरतों की कसरत के बावजूद उन्हें कोई कुछ नहीं कहता बल्कि वह नेता काइद और बड़े आदमी कहलाए जा रहे हैं और कोई बेवा औरत  निकाह करे या अधेड़ उम्र का मर्द या कोई मर्द एक से ज़्यादा निकाह करे तो उसको लोग बुरा जानते हैं और मलामत करते हैं यह सब जहालत और इस्लाम से दूरी के नतीजे हैं । निकाह शरई जितने ज्यादा हो उतना बेहतर क्योंकि निकाह बदकारी को मिटाता है ज़िनाकारी और ज़िनाकारों के रास्ते बंद करता है। आजकल लेने देने ,लम्बी बारातो ,जहेज़ की ज़्यादती और रुसूम व रिवाज़ की कसरतों से निकाह शादियां मुश्किल हो गई है इसीलिए बदकारी व ज़िनाकारी बढ़ रही है निकाह को आसान करो ताकि बदकारी मिट जाए।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह,पेज 85)

जवान लड़के लड़कियों की शादी में देर करना 

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आजकल जवान लड़के लड़कियों को घर में बिठाए रखना और उनकी शादी में ताखीर करना आम हो गया है इस्लामी नुक़्तए नज़र से यह गलत बात है ।

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हदीसे पाक में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम इरशाद फरमाते हैं
जिस की लड़की 12 बरस की उम्र को पहुंचे और वह उसका निकाह ना करें फिर वह लड़की गुनाह में मुब्तला हो तो वह गुनाह उस शख्स पर है (मिश्कात शरीफ सफहा 271)
ऐसी ही हदीस लड़कों के बारे में भी आई है
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आजकल की फुज़ूल रस्मो और बेजा ख़र्चों ने भी शादियों को मुश्किल कर दिया है जिसकी वजह से भी बहुत सी जवान लड़कियां अपने घरों में बैठी हुई है और लड़के मालदारो की लड़कियों की तलाश में बूढ़े हुए जा रहे हैं इन खर्चों पर कंट्रोल करने के लिए जगह-जगह तहरीके चलाने और तन्ज़ीमे बनाने की जरूरत है चाहे वह अपनी अपनी बिरादरी की सतह पर ही काम किया जाए तो कोई हर्ज नहीं । भाइयों ! दौर काम करने का है सिर्फ बातें मिलाने या नारे लगाने और मुशायरे सुनने से कुछ हासिल ना होगा शादी ब्याह में कम से कम खर्च करने का माहौल बनाओ ताकि ज्यादा से ज्यादा मर्द और औरतें शादीशुदा रहे ।

कुछ लोग आला तालीम हासिल कराने के लिए लड़कियों की उम्र ज्यादा कर देते हैं उन्हें वह गैर शादीशुदा रहने पर मजबूर कर देते हैं वह भी निरी हिमाकत और बेवकूफी है ।

आजकल मुसलमानों में कुछ बदमज़हब और बातिल फिरके जवान लड़कियों की आला तालीम के लिए मदारिस और स्कूल खोलने में  बहुत कोशिश कर रहे हैं । उनका मकसद अपने बातिल और मखसूस गैर-इस्लामी अक़ाइद मुसलमानों में फैलाने के अलावा और कुछ नहीं है और इधर लोगों में आजकल औलाद से मोहब्बत इस कदर बढ़ गई है कि हर शख्स कोशिश में है मेरी लड़की मेरा लड़का पता नहीं क्या-क्या बन जाए आला तालीम के नशे सवार है और बनता तो  कोई कुछ नहीं लेकिन अक्सर बुरे दिन देखने को मिलते हैं लड़के ज्यादा पढ़ कर बाप बन रहे हैं लड़कियां माँ बन रही है।

हो सकता है कि हमारी इन बातों से कुछ लोगों को इख्तिलाफ हो मगर हमारा मशवरा यही है लड़कियों को आला तालीम से बाज़ रखा जाये , खासकर जब कि यह तालीम शादी की राह में रुकावट हो और पढ़ने पढ़ाने के चक्कर में अधेड़ कर दिया जाता हो और खासकर गरीब तबके के लोगों में क्योंकि उनके लिए पढ़ी लिखी लड़कियां बोझ बन जाती है क्योंकि उनके लिए शौहर भी ए क्लास और आला घर के होना चाहिए और वह मिल नहीं पाते कोई मिलता भी है तो वह जहेज़ मे मारुती कार मोटरसाइकिल का तालिब है बल्कि बारात से पहले एक दो लाख रूपये का सवाल करता है ।
हिंदुस्तान गवर्नमेंट जो बच्चों को ऊँची तालीम दिलाने पर ज़ोर दे रही है , उसके लिए मेरा मशवरा है कि वह तालीम याफ्ता बच्चों की नौकरी व मुलाज़िमत की ज़िम्मेदारी ले या उनके वज़ीफ़े मुतय्यन करे। खाली पढ़ा  कर छोड़ देना ,न घर का रखा न बाहर का,न खेत का न दफ्तर का। यह गरीबों के साथ ज़ुल्म है और समाज की बर्बादी है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

लडकों की शादी में बजाए वलीमे के मंढ़िया करना

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लड़के की शादी में जो ज़ुफ़ाफ यानी बीवी और शौहर के जमा होने के बाद सुबह को अपनी बिसात के मुताबिक मुसलमानों को खाना खिलाया जाए उसे 'वलीमा' कहते हैं और यह सय्यिदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की मुबारक सुन्नत है काफी हदीसों में इसका ज़िक्र है सरकार सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम ने खुद वलीमे किये और सहाबा किराम को भी उस का हुक्म दिया मगर आजकल काफी लोग शादी से पहले दावते करके खाना खिलाते हैं जिसको मंढ़िया कहा जाता है वलीमा ना करना उसकी जगह मंढ़िया करना खिलाफे सुन्नत है मगर लोग रस्मो-रिवाज पर अड़े हुए हैं और अपनी ज़िद और हठधर्मी या नावाकिफी की बुनियाद पर रसूले करीम सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम की इस मुबारक और प्यारी सुन्नत को छोड़ देते हैं । इस्लाम के इस तरीके में एक बड़ी हिकमत यह है कि अगर निकाह से पहले ही खाना खिला दिया तो हो सकता है किसी वजह से निकाह ना होने पाए और अक्सर ऐसा हो ही जाता है तो इस सूरत में वह निकाह से पहले के तमाम इखराजात बे मकसद और बोझ बनकर रह जाते हैं ।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 83)

मुतलक्का की इद्दत कितने दिन है?

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काफी लोग यह ख्याल करते हैं कि मुतलक्का(जिसे तलाक दी गई हो) की इद्दत तीन  महीने या तीन महीने तेहरा दिन में पूरी हो जाती है यह गलत है। तलाकशुदा औरत की इद्दत यह है कि अगर वह हामिला(गर्भवती) न हो तो तलाक के बाद उसको तीन माहवारी(मासिकधर्म ,हैज़ ,पीरियड) हो जाये, ख्वाह तीन माहवारियाँ तीन महीने से कम में हो जाये या उससे ज्यादा में ख्वाह साल गुज़र जाये अगर तीन बार उसको माहवारी नही हुई तो इद्दत पूरी नहीं होगी। हाँ अगर वह पचपन(55) साल की हो गई हो और महीना आना बंद हो गया हो या नाबालिग हो कि अभी महीना शुरू ही नहीं हुआ या उसको कभी महीना किसी मर्ज़ की वजह से आया ही न हो तो उसकी इद्दत तीन माह है और हामिला की इद्दत बच्चा पैदा होने जाना है ख्वाह तलाक़ के बाद फ़ौरन बच्चा पैदा हो जाये इद्दत हो जायेगी।

खुलासा यह है कि आम तौर से तलाक की इद्दत 3 महीने या 3 महीने 13 दिन समझना गलत है। सही बात वह है जो हमने ऊपर बयान कर दी।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 82)

इद्दत के लिए औरत को मायके में लाना

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आजकल अगर किसी औरत को तलाक हो जाए तो मायके वाले उसको फौरन अपने घर ले जाते हैं बल्कि इस पर फख्र किया जाता है और अगर वह शौहर के घर में रहे तो कुछ लोग उसके मां-बाप और भाइयों को गैरत दिलाते हैं की तलाक़ के बाद भी लड़की को शौहर के घर छोड़ दिया है यह सब गलत बातें हैं

 मसअला यह है की तलाक के बाद भी औरत शौहर के घर में ही इद्दत गुज़ारें और शौहर के ऊपर इद्दत का नान व नफ़का और रहने के लिए मकान देना लाज़िम है।
  क़ुरआन करीम के पारा 28 सूरह तलाक का तर्जमा यह है >"तलाक वाली औरतों को उनके घर से न निकलो न वह खुद निकले मगर जब कि वह खुली हुई बेहयाई करें।"<
हां यह जरूर है कि वह दोनों अजनबी और एक दूसरे के गैर हो कर रहे और बेहतर यह है कि उन के दरमियान कोई बूढ़ी औरत रहे और उनकी देखभाल रखें और यह भी हो सकता है कि शौहर घर में न रहे ख़ास कर रात को कहीं और सोये। औरत के हाथ का पका हुआ खाना खाने में कोई हर्ज नहीं है शौहर के कपड़े  बगैरा  धोना भी तलाक़ के बाद कोई गुनाह नहीं है क्योंकि बादे तलाक वह अगरचे बीवी नहीं मगर एक मुसलमान औरत है और शरई हुदूद की पाबंदी के साथ एक मुसलमान का दूसरे मुसलमान के काम में आ जाना हुस्ने अखलाक है और अच्छी बात है।

यह जो कुछ जगह लोग इतनी सख्ती करते हैं कि बादे तलाक इद्दत में अगर शौहर बीवी के हाथ का पका हुआ खाना भी खा ले तो हुक़्क़ा पानी बन्द कर देते हैं, यह गलत है। जब तक खूब यकीन से मालूम न हो कि वो मियां बीवी की तरह मख़सूस मुआमलात करते हैं सिर्फ शुकूक की वजह से उन्हें तंग न किया जाये और बदगुमानी इस्लाम में गुनाह है।

हाँ अगर तलाक ए मुगल्लज़ा या बाइना की इद्दत हो और शौहर फ़ासिक़ ,बदकार हो  और कोई वहां ऐसा ना हो कि अगर शौहर की नियत खराब हो तो उसको रोक सके तो औरत के लिए उस घर को छोड़ देने का हुक्म है ।
(फतावा फैज़ुर्रसूल ,जिल्द 2 सफ़हा 290)