Tuesday

क्या मछली और अरहर की दाल पर फ़ातिहा नहीं होगी?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
हमारे कुछ अवाम भाई अपनी नावाकिफ़ी की वजह से यह
ख्याल करते हैं कि मछली और अरहर की दाल पर फातिहा नहीं पढ़ना चाहिए हालांकि यह उनकी गलतफहमी है । इस्लाम में जिस चीज़ को खाना हलाल और जाइज़ है तो उस पर फ़ातिहा भी पढ़ी जा सकती है। लिहाज़ा अरहर की दाल और मछली चूंकि इनका खाना हलाल व जाइज़ है तो उन पर फातिहा पढ़ने में हरगिज़ कोई बुराई नहीं हैं, बल्कि मछली तो निहायत उम्दा और महबूब गिज़ा है।

जैसा कि हदीस में आया है कि जन्नत में अहले जन्नत को पहली गिज़ा मछली ही मिलेगी और जो खाना जितना उम्दा और लज़ीज़ होगा फातिहा में भी उसकी फज़ीलत ज़्यादा होगी।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह, पेज 153)

क़ुरआने करीम हिफ़्ज़ करने से मुतअल्लिक़ कुछ ज़रूरी बातें

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
बगैर मआनी व मतलब समझे हुए सिर्फ कुरआने करीम को ज़बानी याद कर लेना यह एक फज़ीलत व बरतरी की बात है। लेकिन सिर्फ इसे ही इल्म नहीं कहा जा सकता। लिहाज़ा बच्चों को पूरा कुरआने करीम हिफ्ज़ कराने के बजाय उनको दीनी उलूम अक़ाइदे इस्लामिया और फ़िक़्ह के मसाइल सिखाये जायें तो ये ज़्यादा बेहतर है।

हज़रत सदरुश्शरीअत मौलाना अमजद अली साहब अलैहिर्रहमा फरमाते हैं- "कुछ कुरआन मजीद याद कर चुका है और उसे फुरसत है तो अफ़ज़ल यह है कि इल्मे फ़िक़्ह सीखे कि कुरआन मजीद हिफ्ज़ करना फ़र्ज़े किफ़ाया है और फ़िक्ह की ज़रूरी बातों का जानना फ़र्ज़े ऐन है।"
(बहारे शरीअत ,हिस्सा 16, सफ़ा 233)

नोट : फ़र्ज़े किफ़ाया वह फर्ज़ है कि शहर का एक भी मुसलमान कर ले तो सब पर से फर्ज़ उतर गया और अगर सबने छोड़ दिया तो सब गुनहगार हुए।

खुलासा यह कि हर शहर और इलाके में कुछ न कुछ हाफिज़ होना भी ज़रूरी है क्यूंकि इसके ज़रिये कुरआन के अल्फ़ाज़ की हिफाज़त है लेकिन इसके साथ साथ हमारी राय यह है कि जो बच्चे ज़हीन और याददाश्त के पक्के हों उन्हें अगर कम उम्री में हिफ्ज़ कराया जा सकता है तो करा दिया जाये वरना 15 , 15 और 20 , 20 साल की उम्र तक का सारा वक़्त  कुरआने करीम हिफ्ज़ कराने में खर्च करा देना ज़्यादा बेहतर नहीं है।

क्यूंकि आजकल उमूमन गरीबों और मुफ्लिसों के बच्चे दीनी मदारिस में आते हैं। उन्हें इस लाइक कर देना भी ज़रूरी है कि रोज़ी कमाने पर क़ादिर हों और दीनी और ज़रूरत के लाइक दुनियवी उलूम भी हासिल किये हुए हों जिन्हें पढ़ा लिखा कहा जा सके।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह , पेज 152)



पढ़ने पढ़ाने से मुतअल्लिक़ कुछ गलतफ़हमियाँ

 ⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
आजकल कसरत से मुसलमान अपने बच्चों को ईसाईयों और बुत परस्तों मुश्रिकों के स्कूलों ,पाठशालाओं में पढ़ने भेज रहे हैं जबकि मुसलमानों को चाहिए कि वह हिन्दी,।अंग्रेज़ी,हिसाब व साइंस वगैरा की अदना (छोटी) व आला।(बड़ी) तालीम के लिए भी अपने स्कूल खोलें जिनमें दुनियवी तालीम के साथ साथ ज़रूरत के लाइक दीनी।तालीम भी हो या दीनी इस्लामी उलूम के साथ साथ ज़रूरत के लाइक दुनियवी उलूम भी पढ़ाये जायें और तालीम अगरचे दुनियवी भी हो लेकिन माहौल व तहज़ीब इस्लामी हो और गवर्नमेंट से मन्ज़ूरशुदा निसाब की किताबें भी पढ़ाई जायें लेकिन उनमें अगर कहीं कोई बात ऐसी हो जो इस्लामी नज़रियात के ख़िलाफ़ हों तो पढ़ाने वाले उस पर तम्बीह करके बच्चों के ईमान व अक़ीदे को बचायें क्यूंकि ईमान हर दौलत से बड़ी दौलत है।

मगर अफ़सोस कि मुसलमानों में भी हर किस्म के लोग।मौजूद हैं, दौलतमन्दों और अमीरों की तादाद भी काफी है, अगर चाहते तो आसानी से दुनियवी तालीम के लिए भी अपने स्कूल खोल देते मगर वहाँ तो ईसाईयत और मुशरिकाना तहज़ीब का नशा सवार है। ख्याल रहे कि वक़्त अब करीब आता मालूम हो रहा है और यह नशे जल्दी ही उतर जायेंगे। अस्ल बात यह कि जिस कौम के दिन पूरे हो चुके हों, उसे कोई समझा नहीं सकता। अभी जल्दी ही एक इस्लामी मुल्क इराक में अमरीकी ईसाईयों ने कब्ज़ा कर लिया और यह इसलिए हुआ कि वहाँ के लोगों ने ईसाई तहज़ीब और कल्चर को अपना लिया था और मुसलमान जिस कौम की तहज़ीब अपनाता है, उस कौम को उस पर हाकिम बना दिया जाता है।
इराकी मुसलमान गले में टाई बांधने लगे थे, इनके मर्दों औरतों ने इस्लामी लिबास छोड़कर ईसाइयों और अंग्रेजों का लिबास पहनना शुरू कर दिया था, शराब आम हो गई थी, नमाज़ रोज़ा बराए नाम रह गया था। आज लोग चीख रहे हैं कि इराक से इस्लामी हुकूमत चली गई लेकिन भाईयों चीखने से क्या फ़ायदा सही बात यह है कि पहले इस्लाम गया है, हुकूमत बाद में। अमरीकी फ़ौजें बहुत बाद में आई हैं, अमरीकी तहज़ीब पहले आ गई है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 151)

मख़लूके खुदा को सताना और दुआ तावीज़ कराना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

आज कितने ही लोग हैं जो लोगों पर ज़ुल्म व ज़्यादती करते हैं और फिर पीरों, फकीरों के यहाँ दुआ तावीज़ात कराते हैं और मज़ारों पर मुरादें मांगते घूमते हैं और मस्जिदों में जाकर लम्बी लम्बी दुआयें मांगते हैं।

कितने शौहर हैं जो बीवियों पर जुल्म ढाते और उनका ख्याल नहीं रखते उन्हें बान्दियों और नौकरानियों से बदतर
ज़िन्दगी गुजारने पर मजबूर कर देते हैं न उन्हें तलाक देते हैं और न उनका हक़ अदा करते हैं।

कितनी बीवियां हैं जो अपने शौहरों का खून पीती उनके लिए घरों को जहन्नम का नमूना बना देती हैं। सासों और नन्दों के साए से जलती हैं, कितनी सास और नन्दें हैं जो अपने घरों में आने वाली दुल्हनों के लिए जीना मुश्किल कर देती हैं शौहर बीवी के दरमियान महब्बत उन्हें कांटों की तरह खटकती और कलेजे में चुभती है।

कितने अमीर कबीर रईस ज़मीदार व मालदार लोग हैं जो मज़दूरों का गला घोंटते, नौकरों को मारते पीटते, झिड़कते उनकी मज़दूरियां और तनख्वाहें रोकते और खुद ऐश करते और उनके घर वाले बीवी बच्चों की बददुआयें लेते हैं। कितने ही लोग वह हैं जो जानवरों को पालते हैं लेकिन उनकी भूक, प्यास, जाड़े, गर्मी की परवाह नहीं करते उन्हें बेरहमी से मारते पीटते हैं उनकी ताकत से ज़्यादा उनसे काम लेते और बोझ लादते हैं। खास कर जिबह का पेशा करने वाले जिबह करने से पहले उन्हें भूका प्यासा रखते हैं और उन पर ऐसे ऐसे ज़ुल्म करते हैं कि जिन्हें देखा नहीं
जा सकता।

खुलासा यह कि कोई भी ज़ालिम अत्याचारी वे रहम हो जो अपने ऐश व आराम और मालदारी की खातिर दूसरों को सताता और उनका खून पीता है उसकी न खुद अपनी दुआ कबूल होती है न उसके हक में दूसरों की। यह मर्द हों या औरतें, यह शौहर हों या बीवियां, यह सासें और नन्दें हों या बहुएं और भावजें, यह मालदार और ज़मीदार हों या हुक्काम व अधिकारी। अगर यह ज़ालिम व बेरहम और अत्याचारी हैं तो उन्हें चाहिए कि यह लम्बी लम्बी दुआयें मांगने, पीरों फकीरों और मज़ारात पर चक्कर लगाने और दुआ तावीज़ कराने से पहले जिसको सताया है उससे माफ़ी मांग लें जिसका हक दबाया है। वह उसे लौटा दें और ज़ुल्म व ज़्यादती व बेरहमी की आदत छोड़ दें फिर आयें ये मस्जिदों में दुआओं के लिए और खानकाहों में मुरादें मांगने और मियां और मौलवियों के पास गन्डे तावीज़ कराने के लिए। जिसने किसी गरीब, कमज़ोर को सताया है और जिसके पीछे किसी मज़लूम की बददुआ लगी है उसके लिए न कोई दुआ है न तावीज़ ।
-------------------------------------------
हदीस में है कि फ़रमाया  रसुलुल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने "अल्लाह तआला" उस पर रहम नहीं फरमाता जो लोगों पर रहम नहीं करता ।''
और फरमाते हैं।
मज़लूम की बददुआ से बचों वह अल्लाह तआला से अपना हक़ मांगता है और खुदाए तआला हक़ वाले को उसका हक़ अता फरमाता है। (मिश्कात सफहा 435)

गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 149)

Monday

कुछ गलत नामों की निशानदेही ⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

कुछ लोग अपने बच्चों के नाम, अहमद नबी, मुहम्मद नबी, रसूल अहमद,नबी अहमद रख देते हैं, यह ग़लत है इसके बजाय गुलाम मुहम्मद या गुलाम रसूल या गुलाम नबी कर लें या मुहम्मद नबी और अहमद नबी में नबी के आगे ‘ह’ बढ़ा कर मुहम्मद नबीह या अहमद नबीह कर लें।

गफूरुद्दीन नाम रखना भी गलत है क्यूंकि गफूर के  मअना मिटा देने वाले के हैं लिहाज़ा गफूरुद्दीन के माअना हुए ‘दीन को मिटाने वाला’। लाहौला वला .कुव्वता इल्ला बिल्लाह। अल्लाह जल्ला शानुहू का नाम गफूर इसलिए है कि वह गुनाहों को मिटाता है, नाम रखने से मुताल्लिक क्या जाइज़ है और क्या नाजाइज़ इसको तफसील से जानने के लिए आलाहजरत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा खां अलैहिर्रहमतो वर्रिदवान की तसनीफ मुबारक अहकामे शरीअत में सफा 72 से सफा 98 तक का मुतालआ करना चाहिए।

  〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️

  ●●●◆◆◆■●●●◆◆■●●●◆◆■◆◆●●●

  नोट◆- कुछ लोगों के नाम इस किस्म के होते हैं जिनमें अल्लाह तआला के मखसूस नामों के साथ ‘अब्द' लगा होता है जैसे अब्दुल्लाह, अब्दुर्रहमान,अब्दुर्रज्जाक, अब्दुल खालिक वगैरहा तो इन नाम वालों को बगैर ‘अब्द’ लगाये खाली रहमान, रज्जाक या ख़ालिक हरगिज़ नहीं कहना चाहिए और यह इस्लाम में बहुत बुरी बात है जिसका ध्यान करना निहायत ज़रूरी है। वलइयाज़ुबिल्लाहि तआला।

  

  गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 148)







।।।


।।।।


।।।।।।


क्या दरख्तों और ताकों में शहीद मर्द रहते हैं।

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
कुछ लोग कहते हैं कि फलां दरख्त पर शहीद मर्द रहते हैं। या फलां ताक में शहीद मर्द रहते हैं और उस दरख्त और उस ताक के पास जाकर फातिहा दिलाते हैं हार फूल खुशबू वगैरा डालते हैं लोबान अगरबत्ती सुलगाते हैं और वहाँ मुरादें मांगते हैं। यह सब खिलाफ शरअ और गलत बातें है। जो बर बिनाए जहालत अवाम मे राइज हो गई हैं इनको दूर करना निहायत ज़रूरी है। हक यह है कि ताकों, महराबों, दरख्तों वगैरा पर महबूबाने खुदा का क्रियाम करार देकर वहाँ हाज़िरी नियाज़, फातिहा, अगरबत्ती, मोमबत्ती जलाना, हार फूल डालना खुशबूयें मलना, घूमना, चाटना हरगिज़ जाइज़ नहीं।
______________________________
 आलाहज़रत रदियल्लाहु  तआला अन्हु इन बातों के मुतअल्लिक फरमाते हैं
‘यह सब वाहियात व खुराफात और जाहिलाना हिमाक़ात व
व बतलात हैं इनका इज़ाला लाज़िम है।"
(अहकामे शरीअत, हिस्सा अव्वल, सफहा 32)
_______________________________
आजकल कुछ लोग इन हरकतों से रोकने वालों को वहाबी कह देते हैं हालांकि किसी मुसलमान को वहाबी कहने में जल्दी नहीं करना चाहिए जब तक कि उसके अकाइद की खूब तहकीक न हो जाए और ख़िलाफ़ शरअ हरकतों और बिदअतों से रोकना तो अहले सुन्नत का ही काम है वहाबी तो उसको कहते हैं जो अल्लाह तआला और उसके महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम के और बुज़ुर्गाने दीन की शान में गुस्ताख़ी व बेअदबी करता हो या जानकर गुस्ताख़ों की तहरीक में शामिल हो उनको अच्छा जानता हो। वहाबी किसे कहते हैं इसको तफ़सील के साथ मैंने अपनी किताब"दरमियानी उम्मत’ में लिख दिया है यह किताब उर्दू और हिन्दी में अलग अलग छप चुकी है हासिल करके मुतालआ कर लिया जाए।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 147)

क्या दरख्तों और ताकों में शहीद मर्द रहते हैं।

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
कुछ लोग कहते हैं कि फलां दरख्त पर शहीद मर्द रहते हैं। या फलां ताक में शहीद मर्द रहते हैं और उस दरख्त और उस ताक के पास जाकर फातिहा दिलाते हैं हार फूल खुशबू वगैरा डालते हैं लोबान अगरबत्ती सुलगाते हैं और वहाँ मुरादें मांगते हैं। यह सब खिलाफ शरअ और गलत बातें है। जो बर बिनाए जहालत अवाम मे राइज हो गई हैं इनको दूर करना निहायत ज़रूरी है। हक यह है कि ताकों, महराबों, दरख्तों वगैरा पर महबूबाने खुदा का क्रियाम करार देकर वहाँ हाज़िरी नियाज़, फातिहा, अगरबत्ती, मोमबत्ती जलाना, हार फूल डालना खुशबूयें मलना, घूमना, चाटना हरगिज़ जाइज़ नहीं।
______________________________
 आलाहज़रत रदियल्लाहु  तआला अन्हु इन बातों के मुतअल्लिक फरमाते हैं
‘यह सब वाहियात व खुराफात और जाहिलाना हिमाक़ात व
व बतलात हैं इनका इज़ाला लाज़िम है।"
(अहकामे शरीअत, हिस्सा अव्वल, सफहा 32)
_______________________________
आजकल कुछ लोग इन हरकतों से रोकने वालों को वहाबी कह देते हैं हालांकि किसी मुसलमान को वहाबी कहने में जल्दी नहीं करना चाहिए जब तक कि उसके अकाइद की खूब तहकीक न हो जाए और ख़िलाफ़ शरअ हरकतों और बिदअतों से रोकना तो अहले सुन्नत का ही काम है वहाबी तो उसको कहते हैं जो अल्लाह तआला और उसके महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैही वसल्लम के और बुज़ुर्गाने दीन की शान में गुस्ताख़ी व बेअदबी करता हो या जानकर गुस्ताख़ों की तहरीक में शामिल हो उनको अच्छा जानता हो। वहाबी किसे कहते हैं इसको तफ़सील के साथ मैंने अपनी किताब"दरमियानी उम्मत’ में लिख दिया है यह किताब उर्दू और हिन्दी में अलग अलग छप चुकी है हासिल करके मुतालआ कर लिया जाए।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 147)

क्या क़व्वाली सुनना जाइज़ है?

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
इस्लामी भाईयो ! आज कल बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारात पर उनके उर्सों का नाम लेकर खूब मौज मस्तियां हो रही हैं और अपनी रंग रंगेलियों, बाजों, तमाशों, औरतों की छेड़छाड़ के मजे उठाने के लिए अल्लाह वालों के मज़ारों को इस्तेमाल किया जा रहा है और ऐसे लोगों को न खुदा का ख़ौफ़ है, न मौत की फिक्र और न जहन्नम का डर।

आज कुफ्फार व मुशरिकीन यह कहने लगे हैं कि इस्लाम भी दूसरे मजहबों की तरह नाच, गानों, तमाशों, बाजों और बेपर्दा औरतों को स्टेजों पर लाकर बे हाई का मुज़ाहिरा करने वाला मज़हब है लिहाज़ा अहले कुफ़्र के इस्लाम कबूल करने की जो रफ्तार थी उसमें बहुत बड़ी कमी आ गई है।

मज़हबे इस्लाम में बतौर लहव व लइब ढोल, बाजे और मज़ामीर हमेशा से हराम रहे हैं। बुखारी शरीफ की हदीस है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहुतआलाअलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :
"जरूर मेरी उम्मत में ऐसे लोग होने वाले हैं जो ज़िना रेशमी कपड़ों, शराब और बाजों ताशों को हलाल ठहरायेंगे।"
(सही बुख़ारी, जिल्द 2, किताबुल अशरिबह, सफहा 837)

दूसरी हदीस में हुज़ूर नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कियामत की निशानियां बयान करते हुए फ़रमाया :
"कियामत के करीब नाचने गाने वालियों और बाजे ताशों
की कसरत हो जाएगी।"
(तिर्मिजी, मिश्कातबाबे अशरातुस्साअह सफ़हा 470)

फतावा आलमगीरी जो अब से साढ़े तीन सौ साल पहले बादशाहे हिन्दुस्तान मुहीयुद्दीन औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह तआला अलैह के हुक्म से उस दौर के तकरीबन सभी मुसतनद व मोतबर उलमाए किराम ने जमा होकर मुरतब फरमाई जो अरबी जबान (भाषा) में तकरीबन तीन हज़ार सफ़हात और छह जिल्दों पर फैला हुआ एक अज़ीम इस्लामी इन्साइक्लोपीडिया है।
उस में लिखा है।
"सिमा, कव्वाली और रक्स (नाच कूद)जो आज कल के नाम निहाद सूफियों में राइज है यह हराम है इस में शिरकत जाइज़ नही।"
( फतावा आलमगीरी ,जिल्द 5, किताबुल कराहियह ,बाब 17 ,सफहा 352)

आलाहज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा खां साहब अलैहिर्रहमा का फतवा अरब व अजम में माना जा रहा है उन्होंने मज़ामीर के साथ कव्वालियों को अपनी किताबों में कई जगह हराम लिखा है। कुछ लोग कहते हैं मज़ामीर के साथ कव्वाली चिश्तिया सिलसिले में राइज और जाइज़ है। यह बुज़ुर्गाने चिश्तिया पर उनका खुला बोहतान है बल्कि उन बुजुर्गों ने भी मज़ामीर के साथ कव्वाली सुनने को हराम फरमाया है। सय्यिदना महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने अपने ख़ास ख़लीफ़ा सय्यिदना फ़ख़रुद्दीन ज़रदारी से मसअलए कव्वाली के मुतअल्लिक एक रिसाला लिखवाया जिसका नाम ‘कश्फुल किनान अन उसूलिस्सिमा’ है। इसमें साफ लिखा है : हमारे बुज़ुर्गों का सिमा इस मज़ामीर के बोहतान से बरी है (उनका सिमा तो है) सिर्फ कव्वाल की आवाज़ अशआर के साथ हो जो कमाल सनअते इलाही की ख़बर देते हैं।

कुतबुल अकताब सय्यिदना फरीदुद्दीन गंज शकर रहमतुल्लाह तआला अलैह के मुरीद और सय्यिदना महबूब इलाही निज़ामुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह के ख़लीफ़ा सय्यिदना मुहम्मद बिन मुबारक अलवी किरमानी रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी मशहूर किरताब ‘सैरुल औलिया’ में तहरीर फरमाते हैं:
“महबूब इलाही ख्वाजा निज़ामुद्दीन देहलवी अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान ने फरमाया कि चन्द शराइत के साथ सिमा हलाल है
⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️⤵️
(1) सुनाने वाला मर्द कामिल हो छोटा लड़का और औरत न हो।
 (2)सुनने वाला यादे खुदा से ग़ाफ़िल न हो।

 (3) जो कलाम पढ़ा जाएफ़हश, बेहयाई और मसखरगी न हो।

(4) आलए सिमाअ यानी सारंगी मज़ामीर व रुबाब से पाक हो।
(सैरुल औलियाबाब 6, दर सिमा, वज्द व रक्स, सफ़हा 501)

इसके अलावा ‘सैरुल औलियाशरीफ़' में एक और मकाम पर है कि एक शख्स ने हजरते महबूब इलाही ख्वाजा निज़ामुद्दीन रहमतुल्लाहि तआला अलैह से अर्ज किया कि इन अय्याम में बाज़ आस्तानादार दुरवेशों ने ऐसे मजमे में जहाँ चंग व रुबाब व मज़ामीर था, रक्स किया तो हज़रत ने फरमाया कि उन्होंने अच्छा काम नहीं किया जो चीज़ शरअ में नाजाइज़ है वह नापसन्दीदा है। उसके बाद किसी ने बताया कि जब यह जमाअत बाहर आई तो लोगों ने उन से पूछा कि तुम ने यह क्या किया वहीं तो मज़ामीर थे तुम ने सिमा किस तरह सुना और रक्स किया? उन्होंने कहा हम इस तरह सिमा में डूबे हुए थे कि हमें यह मालूम ही नहीं हुआ कि यहाँ मज़ामी हैं या नहीं। हज़रत सुल्तानुल मशाइख ने फरमाया यह कोई जवाब नहीं इस तरह तो हर गुनाहगार हरामकार कह सकता है।
(सैरुल औलिया, बाब 9 , सफ़हा 530)
यानी कि आदमी ज़िना करेगा और कह देगा कि मैं बेहोश था मुझको पता नहीं कि मेरी बीवी है या गैर औरत, शराबी कहेगा कि मुझे होश नहीं कि शराब पी या शरबत।

इसके अलावा उन्हीं हज़रते सय्यिदना महबूब इलाही निज़ामुद्दीन हक़ वालिदैन अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान के मलफूज़ात पर मुशतमिल उन्हीं के मुरीद व खलीफा हज़रत ख्वाजा अमीर हसन अलाई सन्जरी की तसनीफ़ ‘वाइदुल फवाद शरीफ़' में है।

हज़रते महबूब इलाही की खिदमत में एक शख्स आया और बताया कि फलां जगह आपके मुरीदों ने महफ़िल की है और वहाँ मज़ामीर भी थे हज़रत महबूब इलाही ने इस बात को पसन्द नहीं फ़रमाया। और फ़रमाया कि मैंने मना किया है मज़ामीर (बाजे) हराम चीज़े वहाँ नहीं होना चाहिए इन लोगों ने जो कुछ किया अच्छा नहीं किया इस बारे में काफ़ी ज़िक्र फरमाते रहे। इसके बाद हज़रत ने फरमाया कि अगर कोई किसी मकाम से गिरे तो शरअ में गिरेगा और अगर कोई शरअ से गिरा तो कहाँ गिरेगा।
(फवाइदुल फवाद,जिल्द 3, मजलिस पन्जुम,सफ़हा 512, मतबूआ उर्दू अकादमी ,देहली,तर्जमा ख्वाजा हसन निज़ामी)

मुसलमानो! जरा सोचो यह हजरत ख्वाजा निज़ामुद्दीन देहलवी रदियल्लाहु तआला अन्हु का फतावा है जो तुमने ऊपर पढ़ा। इन अक़वाल के होते हुए क्या कोई कह सकता है कि खानदाने चिश्तिया में मज़ामीर के साथ कव्वाली जाइज़ है? हाँ यह बात वही लोग कहेंगे जो चिश्ती हैं, न कादरी उन्हें तो मज़ेदारियां और लुत्फ़ अन्दोज़ियां चाहिए।

और अब जबकि सारे के सारे कव्वाल बे नमाज़ी और फ़ासिक व फाजिर हैं। यहाँ तक कि बाज़ शराबी तक सुनने में आए हैं। यहाँ तक कि औरतों और अमरद लड़के भी चल पड़े हैं। ऐसे माहौल में इन कव्वालियों को सिर्फ वही जाइज़ कहेगा जिसको इस्लाम व कुरआन ,दीन व ईमान से कोई महब्बत न हो और हरामकारी, बहायाई, बदकारी उसके रग व पय में सराहत कर गई हो। और कुरआन व हदीस के फ़रामीन की उसे कोई परवाह न हो। क्या इसी का नाम इस्लाम है कि मुसलमान औरतों को लाखों के मजमे में लाकर उनके गाने बजाने कराए जायें फिर उन तमाशों का नाम बुज़ुर्गों का उर्स रखा जाए। काफ़िरों के सामने मुसलमानों और मजहबे इस्लाम को जलील व बदनाम किया जाए?

कुछ लोग कहते हैं कि कव्वाली अहल के लिए जाइज़ और नाअहल के लिए नाजाइज़ है। ऐसा कहने वालों से हम पूछते हैं। कि आजकल जो कव्वालियों की मजलिसों में जो लाखों लाख के मजमे होते हैं क्या यह सब अल्लाह वाले और असहाबे इसतगराक हैं? जिन्हें दुनिया व मताए दुनिया का कतअन होश नहीं? जिन्हें यादे खुदा और ज़िक्र इलाही से एक आन की फुरसत नहीं?

ख़र्राटे की नीदों और गप्पों, शप्पों में नमाज़ों को गंवा देने वाले, रात दिन नंगी फ़िल्मोंगन्दे गानों में मस्त रहने वाले, मां बाप की नाफरमानी करने और उनको सताने वाले, चोर लकोर, झूटे फ़रेबी, गिरेहकाट वगैरा क्या सब के सब थोड़ी देर के लिए कव्वालियों की मजलिस में शरीक हो कर अल्लाह वाले हो जाते और उसकी याद में महव हो जाते हैं? या पीर साहब ने अहल का बहाना तलाश करके अपनी मौज मस्तियों का सामान कर रखा है? कि पीरी भी हाथ से न जाए और दुनिया की मौज मस्तियों में भी कोई कमी न आए। याद रखो कब्र की अँधरी कोठरी में कोई हीला व बहाना न चलेगा।

कुछ लोगों को यह कहते सुना गया है मज़ामीर के साथ कव्वाली नाजाइज़ होती तो दरगाहों और ख़ानकाहों में क्यूं होती?

काश यह लोग जानते कि रसूले पाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हदीसों बुज़ुगाने दीन के मुकाबले में  आजकल के फ़ासिक दाढ़ी मुन्डाने वाले नमाज़ों को कसदन छोड़ने वाले बाज़ ख़ानकाहियों का अमल पेश करना दीन से दूरी और सख्त नादानी है जो हदीसें हमने ऊपर लिखीं और बुज़ुर्गाने दीन के अक़वाल नक़ल किये गए उनके मुकाबिल न किसी का कौल मोतबर होगा न अमल। आजकल खानकाहों में किसी काम का होना उसके जाइज़ होने की शरई दलील नहीं है।

बाज़ खानकाहों की जबानी यह भी सुना कि हम कव्वालियां इसलिए कराते हैं कि ज़्यादा लोग जमा हो जायें और उर्स भारी हो जाए। यह भी सख्त नादानी है गोया आपको अपनी नामवरी की फिक्र है आख़िरत की फिक्र नहीं। आपको कोई जानता न हो,आपके पास कोई बैठता न हो, आप गुमनाम हों और हरामकारियों से बचते हो। नमाजों के पाबन्द हों, बीवी बच्चों के लिए हलाल रोज़ी कमाने में लगे हों और आपका परवरदिगार आप से राज़ी हो यह हज़ार दर्जे बेहतर है इससे कि आप मशहूरे जमाना शख्सियत हों। आपके हज़ारों मुरीद हों, हर वक़्त हज़ारों मोअतकिदीन का झमगटटा लगा रहता हो या लाखों मजमे में बोलने वाले ख़तीब और मुकर्रिर हों। बड़े अल्लामा व मौलाना शुमार किये जाते हों लेकिन हरामकारियों में इनहिमाक, नमाज़ों से गफलत ,शोहरत व जाह तलबी,दौलत की नाजाइज़ हवस की वजह से।।मैदाने महशर में खुदाए तआला के सामने शर्मिन्दगी हो। कियामत के दिन ख़िफ़्फत उठानी पड़े। वलइयाजु बिल्लाहि तआला कहीं जहन्नम का रास्ता न देखना पड़े।

मेरे भाईयो! दिल में यह तमन्ना रखे यही खुदाए कदीर से दुआ किया करो कि ख्वाह हम मशहूरे ज़माना पीर और दिलों में जगह बनाने वाले ख़तीब हों या न हों लेकिन हमारा रब हम से राज़ी हो जाए ईमान पे मौत हो जाए और जन्नत नसीब हो जाए। और खुदाए तआला हमें चाहे थोड़ों में रखे लेकिन अच्छों और सच्चों में रखे। फ़कीरी और दुरवेशी भीड़ और मजमा जुटाने का नाम नहीं है। फ़कीर तो तन्हाई पसन्द होते हैं और भीड़ से भागते हैं अकेले में यादे खुदा करते हैं।

      उनकी याद उनका तसव्वुर है उन्हीं की बातें
           कितना आबाद मेरा गोशए तन्हाई है।
         
आख़ीर में एक बात यह भी बता देना ज़रूरी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि ‘‘जो कोई ख़िलाफ़ शरअ काम की बुनियाद डालते है तो उस पर अपना और सारे करने वालों को गुनाह होता है।’’ लिहाजा जो मज़ामीर के कव्वालियां कराते हैं और दूसरों को भी इसका मौका देते हैं उन पर अपना,कव्वालों और लाखों तमाशाइयों का गुनाह है मरते ही उन्हें अपनी करतूतों का अन्जाम देखने को मिल जाएगा।

हमारी इस तहरीर को पढ़ कर हमारे इस्लामी भाई बुरा न मानें बल्कि ठन्डे दिल से सोचें अपनी और अपने भाईयों में
इस्लाह की कोशिश करें।

अल्लाह तआला प्यारे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सदके व तुफ़ैल तौफीक बख्शे।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 140)

अपनी तरफ से न करके औरों के नाम से कुर्बानी करना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬

कुछ लोग जिन पर मालदार साहिबे निसाब होने की बिना पर कुर्बानी वाजिब होती है वह कुर्बानी में ब-वक़्ते ज़िबह अपने नाम के बजाए अपने माँ, बाप या बुज़ुर्गाने दीन का नाम लेकर उनकी तरफ़ से कुर्बानी करते हैं हालांकि यह गलत है। जिस पर कुर्बानी वाजिब है वह पहले अपने नाम से करे। उसके बाद अगर मौक़ा है तो बड़े जानवर में और हिस्से लेकर या दूसरे जानवर बुज़ुर्गाने दीन या अपने ज़िन्दा या मुर्दा माँ बाप की तरफ से ज़िबह करे और हुज़ूर सय्यिदे आलम अहमद मुजतबा मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नाम से कुर्बानी करना बड़ी फज़ीलत है लेकिन जब उस पर खुद कुर्बानी वाजिब है तो यह फज़ीलतें उसी के लिए हैं जो खुद अपनी तरफ़ से पहले करे वरना कुर्बानी न करने का गुनाह होगा।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 140)

ग़ैर ज़रूरी जाहिलाना सवालात

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
आजकल अवाम में सवालात मालूम करने का रिवाज़ भी आम हो गया है वह भी अमल व इस्लाह की गरज़ से नहीं बल्कि उलमा को आज़िज़ करने या किसी फ़ासिद मक़सद से।

एक साहब को मैंने देखा कि वह मालदार हो कर कभी कुर्बानी नहीं करते थे और मौलवी साहब से मालूम कर रहे थे हज़रते इस्माईल अलैहिस्सलाम की जगह जिबह करने के लिए जो दुम्बा लाया गया था वह नर था या मादा और उसका गोश्त किसने खाया था वहीं उन्हीं के जैसे दूसरे साहब बोले कि वह दुम्बा अन्डुआ था या खस्सी?

एक साहब को नमाज़ याद नहीं थी और कुछ भी ठीक से करना नहीं जानते थे और उन्हें जो मौलाना साहब मिलते उनसे यह ज़रूर पूछते थे कि मूसा अलैहिस्सलाम की मां का क्या नाम था? और हज़रते खदीजा रदियल्लाह तआला अन्हा का निकाह किस ने पढ़ाया था?

ग़रज़ कि इस किस्म के ग़ैर ज़रूरी सवालात करने का माहौल बन गया है। अवाम को चाहिए कि तारीख़ी बातों में न पड़ कर नमाज़, रोज़ा वगैरा अहकामे शरअ सीखें और इस्लामी अक़ीदे मालूम करें यही चीज़ें अस्ल इल्म हैं।

और जो बात क़ुरआन व हदीस फ़िक़्ह से मालूम हो जाए तो ज़्यादा कुरेद और बारीकी में न पड़ें न बहस करें अगर अक्ल में न आए तो अक्ल का कुसूर जाने न कि मआज़ल्लाह क़ुरआन व हदीस का या फुक़हाए मुजतहिदीन का।

और ख़्वाहम ख़्वाह ज़्यादा सवालात करने की आदत अच्छी नहीं है। फ़ी ज़माना अमल करने का रिवाज़ बहुत कम है पूछने का ज़्यादा और अन्धा होकर बारीक राहों पर चलने में सख्त ख़तरा है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 138)

नए साल की मुबारकबादियां

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
मुसलमानों में अंग्रेजी साल के पहले दिन पहली जनवरी को खुशी मनाने मिठाईयां बांटने मुबारकबादियां देने और भेजने का रिवाज आम हो गया है और तरह तरह की फुज़ूल खर्चियां की जाती हैं।

हालांकि पहली जनवरी हो या पहली अप्रेल (अप्रैल ) 25 दिसम्बर बड़ा दिन हो या गुड फ्राइडे ,इन सब का इस्लाम और मुसलमानों से कोई तअल्लुक नहीं बल्कि इनको अहमियत देना या त्योहार समझना ‘ईसाईयत' है और काफिरों और गैर मुस्लिमों का तरीक़ए कार। मुसलमानों को चाहिए इस्लामी त्योहार मनायें और इस्लामी दिनों को अहमियत दें ईसाईयत न अपनायें कहीं ऐसा न हो कि आपका हश्र ईसाईयों के साथ हो।

हदीस शरीफ़ में है अल्लाह तआला के रसूल सय्यिदे आलम
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं ‘‘जो जिस कौम का तरीक़ए कार अपनाए वह उन्हीं में से है।’’

आजकल मुसलमानों में बच्चों की सालगिरह मनाने रिवाज भी बहुत ज़ोर पकड़ गया है और इसमें गैर जरूरी अख़राजात किये जाते हैं और केक काटे जाते हैं। यह सब भी इस्लामी नुकतए नज़र से कुछ अच्छा नहीं मालूम होता इसमें अंग्रेज़ी तहज़ीब और ईसाईयत की बू आती है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 137)

हमल रोकने न वाली दवाओं और लूप , कन्डोम वगैरा  का इस्तेमाल

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
इस्लाम में नसबन्दी हराम है। नसबन्दी का मतलब यह है कि किसी अमल यानी आपरेशन वगैरा के जरिए मर्द या औरत में कुव्वत तौलीद यानी बच्चा पैदा करने की सलाहियत हमेशा के लिए ख़त्म कर देना जैसा कि हदीस शरीफ में है कि जब हज़रते अबूहुरैरा रदियल्लाहु तआला अन्हु ने हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से बर ज़िना से बचने के लिए ख़स्सी होने की इजाज़त चाही तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस सवाल पर पर उन से रू-गिरदानी फरमाई और नाराज़गी का इज़हार किया।

लेकिन हमल रोकने के ख्याल से आरिज़ी ज़राए व वसाइल इख्तियार करना मसलन , लूप,निरोध वगैरा का किसी ज़रूरत से इस्तेमाल करना हराम नहीं है। दरअस्ल मज़हबे इस्लाम बड़ी हिकमतों वाला मज़हब और क़ानूने फ़ितरत है जो नसबन्दी को हराम फरमाता है क्यूंकि उसमें इन्सान के बच्चा पैदा करने की कुदरती सलाहियत व कुव्वत को ख़त्म कर दिया जाता है। कभी यह भी हो सकता है कि माँ,बाप नसबन्दी करा बैठते हैं। और जो बच्चे थे वह मर गए ऐसा हो भी जाता है तो सब दिन के लिए औलाद से महरूमी हाथ आती है। कभी ऐसा भी होता है कि औरत ने नसबन्दी कराई और उसके शौहर का इन्तिकाल हो गया या तलाक हो गई अब उस औरत ने दूसरी शादी की और दूसरा शौहर अपनी औलाद का ख्वाहिशमन्द हो। यह भी हो सकता है मर्द ने नसबन्दी कराई अब उसकी औरत फ़ौत हो गई या तलाक हो गई वह दूसरी शादी करता है अब नई बीवी औलाद की ख्वाहिशमन्द हो।

खुलासा यह कि बच्चा पैदा करने की सिरे से सलाहियत खत्म कर देना किसी तरह समझ नहीं आता और इस्लाम का क़ानून बेशुमार हिक़मतों का खज़ाना है। अलबत्ता आरिज़ी तौर से बच्चों की विलादत रोकने के ज़राए व वसाइल को इस्लाम मुतलक़न हराम फ़रमाता । इस में भी बड़ी हिक़मत है क्योंकि कभी ऐसा हो जाता है कि औरत की सेहत इतनी खराब है कि बच्चा पैदा करना उसके बस की नहीं बल्कि कभी कुछ औरतों के बच्चे सिर्फ ऑपरेशन से ही हो पाते हैं और दो या तीन बच्चों की विलायत के बाद डॉक्टरों ने कह दिया कि आइन्दा ऑपरेशन में सख्त खतरा है तो आरिज़ी तौर पर हमल को रोकने के ज़राए का इस्तेमाल गुनाह नहीं है। हदीस शरीफ में है:-

 हज़रत जाबिर रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि हम लोग नुज़ूले कुरआन के ज़माने में "अज़्ल"करते थे यानी इन्जाल के वक़्त औरत से अलाहिदा हो जाते थे। यह हदीस बुख़ारी शरीफ व मुस्लिम शरीफ दोनों में है। मुस्लिम शरीफ में इतना और है:-
यह बात हुजूर नबीए करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तक पहुँची तो आपने मना नहीं फरमाया।

अज़्ल से मुतअल्लिक और भी हदीसे हैं जिन से इसकी इज़ाजत का पता चलता है जिनकी तौज़ीह व तशरीह में उलमा का फ़तवा है कि बीवी से इसकी इज़ाजत के बगैर उसकी मर्ज़ी के खिलाफ ऐसा न करे क्यूंकि इसमें उसकी हकतल्फी है।

हज़रत मौलाना मुफ्ती जलालुद्दीन अहमद अमजदी फरमाते है: "किसी जाइज़ मकसद के पेशे नज़र वक़्ती तौर पर ज़्बते तौलीद के लिए कोई दवा या रबड़ की थैली का इस्तेमाल करना जाइज़ है लेकिन किसी अमल से हमेशा के लिए बच्चा पैदा करने की सलाहियत को ख़त्म कर देना किसी तरह जाइज नहीं।"
(फतावा फैज़ुर्रसूल, जिल्द दोम, सफ़हा 580)
इस से यह भी ज़ाहिर है कि वे मकसद ख्वाहम ख़्वाह ऐसा करना भी जाइज़ नहीं।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 136)

साली और भावज से मज़ाक़ करना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
बाज़ लोग साली और भावज से मजाक करते बल्कि उसे अपना हक़ ख्याल करते हैं और उन्हें इस किस्म की बातों से रोका टोका जाए तो कहते हैं कि हमारा रिश्ता ही ऐसा है हालांकि इस्लाम में यह मज़ाक हराम बल्कि सख्त हराम जहन्नम का सामान है। औरतों और मर्दों के दरमियान मखसूस मामलात से मुतअल्लिक गन्दी और बेहूदा बातें ख़्वाह खुले अल्फ़ाज़ में कही जायें या इशारों किनायों में सब मज़ाक हैं और हराम है। हदीस शरीफ़ में जेठ देवर और बहनोई से पर्दा करने की सख्त ताकीद आई है। और जिस तरह मर्दों के लिए साली और भावज से मज़ाक हराम है ऐसे ही औरतों को भी देवर और बहनोई से मज़ाक़ हराम है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 135)

औलाद को आक़ करने का मसअला

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
बाज़ लोग अपनी औलाद के बारे में यह कह देते हैं कि मैंने इसको आक़ कर दिया और उसका मतलब यह ख्याल किया जाता है कि अब वह आक़ की हुई औलाद बाप के मरने के बाद इसकी मीरास से हिस्सा नहीं पाएगी हालांकि यह एक बेकार बात है और आक़ कर देना शरअन कोई चीज़ नहीं है और न बाप के यह लफ्ज़ बोलने से उसकी औलाद जाएदाद में हिस्से से महरूम होगी बल्कि वह बदस्तूर बाप की मौत के बाद उसके तरके में शरई हिस्से की हक़दार है।

हाँ माँ बाप की नाफरमानी और उनको ईज़ा देना बड़ा गुनाह है और जिसके वालिदैन उससे नाखुश हों वह दोनों जहाँ में इताब व अज़ाबे इलाही का हक़दार है और सख़्त महरूम है।

सय्यिदी आलाहजरत रदियल्लाहु तआला अन्हु इरशाद फरमाते हैं : "आक कर देना शरअन कोई चीज़ नहीं न उससे विलायत ज़ाइल हो।"
(फतावा रज़विया,जिल्द 5,सफहा 412)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 135)

सफ़र के महीने का आखिर बुध

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
कुछ जगह लोग सफ़र के महीने के आख़िरी बुध के बारे में यह ख्याल करते है कि इस रोज हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ने मर्ज़ से शिफ़ा पाई थी। लिहाज़ा इस दिन खुशी मनाते हैं। खाने, शीरीनी वगैरा खाते खिलाते हैं, जंगल की सैर को जाते हैं और कहीं पर लोग इसको मनहूस ख्याल करते हैं और बरतन तोड़ डालते हैं हालांकि सफ़र
के आखिरी बुध की कोई अस्ल नहीं। न उस दिन हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए मर्ज़ से सेहतयाबी का कोई सबूत। बाज़ जगह कुछ लोग इस
दिन को मनहूस ख्याल करके बरतनों वगैरा को तोड़ते हैं यह भी फुज़ूलखर्ची और गुनाह है। खुलासा यह कि सफ़र के महीने के आख़िरी बुध की इस्लाम में कोई खुसूसियत नहीं।

(फतावा रज़विया, जिल्द 10, निस्फ़े अव्वल, सफ़हा 117)
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 134)
 ओझड़ी खाना
⏬⏬⏬⏬⏬
ओझड़ी और आतें खाना जाइज़ नहीं।
 कुरआन करीम में है।
  तर्जमा : और वह नबी गन्दी चीजें हराम फरमायेंगे।
(कंजूल ईमान ,पारा 9, सुरह अराफ,आयत 157)

और "खबाइस" से मुराद वह चीजें हैं जिनसे सलीमुत्तबअ लोग घिन करें और ओझड़ी और आंतें खाने से भी सलीमुत्तबअ लोग घिन करते है और यह गन्दी चीजें हैं लिहाजा इनका खाना जाइज़ नहीं है।

आलाहज़रत अलैहिर्रहमा ने अपने रिसाले "अलमहुल मलीहा" में इस सब को तसरीह व तफ़सील से बयान फरमाया है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 134)
हाथ उठा कर या सिर्फ़ इशारे से सलाम का जवाब देना
⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
सलाम करने या सलाम का जवाब देने में आजकल सिर्फ इशारा कर देना या हाथ उठा देना या थोड़ा सा सर हिला देना काफी राइज हो गया है। हालांकि इस तरह सलाम की सुन्नत अदा नहीं होती और अगर किसी ने सलाम किया और उसके जवाब में सिर्फ यही किया मुँह से वअलैकुमुस्सलाम न कहा तो गुनाहगार भी हुआ।

 आलाहज़रत अलैहिर्रहमा फरमाते हैं।
 "बन्दगी आदाब, तसलीमात वगैरा अल्फाज सलाम से नहीं और सिर्फ हाथ उठा देना काफी नहीं जब तक उसके साथ कोई लफ्ज़ सलाम का न हो।"
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 10,निस्फ अव्वल, सफहा 168)

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)



दवा खाने पीने से पहले बिस्मिल्लाह न पढ़ना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
यह भी ग़लत और एक जाहिलाना ख्याल है बल्कि दवा खाने पीने से पहले बिस्मिल्लाह ख़ास तौर से ध्यान करके ज़रूर पढ़ना चाहिए ताकि नामे खुदा से जल्द शिफ़ायाब हो क्यूंकि बीमारियां और उनकी शिफ़ा अल्लाह की तरफ से है।
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)

अमरीकन गाय का शरई हुक्म

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
अमरीकन गाय के बारे में काफ़ी लोग शुकूक व शुबहात में मुबतला हैं जबकि इस में कोई शक नहीं कि अमरीकन गाय भी बिला शुबहा गाय है उसका खाना हलाल और उसका दूध ,घी,खाना पीना जाइज़ है।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 133)

मर्दों का एक से ज़्यादा अंगूठी पहनना

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
इस्लामी नुकतए नज़र से मर्द को चांदी की सिर्फ एक अंगूठी एक नग की पहनना जाइज़ है जिसका वजन साढ़े चार माशे (4.357 ग्राम) से कम हो। इसके अलावा मर्द के लिए कोई ज़ेवर हलाल नहीं। एक से ज़्यादा अंगूठी या कोई ज़ेवर किसी भी धात का हो सब गुनाह व नाजाइज़ है ।

मगर आजकल अवाम तो अवाम बाज़ जाहिल नाम निहाद सूफ़ियों और मुख़ालिफ़के इस्लाम पीरों ने ज़्यादा  से ज़्यादा अंगूठी पहनने को अपने ख्याल में फ़कीरी व तसव्वुफ समझ रखा है यह एक चांदी की शरई अंगूठी से ज़्यादा अंगूठिया पहनने वाले ख्वाह वह सोने की हों या चांदी की या और किसी धात की सब के सब गुनाहगार हैं और इस लाइक नहीं कि उन्हें पीर बनाया जाए। हमारे कुछ भाई तांबे, पीतल और लोहे के छल्ले पहनते हैं और उन्हें दर्द और बीमारी की शिफा ख्याल करते हैं यह भी गलत है।और इलाज के तौर पर भी नाजाइज़ जेवरात छल्ले वगैरा पहनना जाइज़ नहीं है।
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 10 , निस्फे अव्वल,सफ़हा 14)

कुछ लोग यह कहते हैं कि यह छल्ला या अंगूठी हम मक्का शरीफ,मदीना शरीफ या अजमेर शरीफ से लाए हैं। अगर वह खिलाफ शरअ है तो मक्के शरीफ, मदीने शरीफ, अजमेर शरीफ के बाज़ार में बिकने से हलाल नहीं हो जाएगी।

भाईयो! आप तो आज वहाँ के बाज़ारों से लाए हैं और यह नाजाइज़ होने का हुक्म चौदा सौ साल कल्ब वहीं से आ चुका है।
      खुलासा यह कि मुक़द्दस शहरों में बिकने से हराम चीज़ हलाल नहीं हो जाती ।
     
         भाईयों! अल्लाह तआला से डरो और नाजाइज़ अँगूठीयां, ज़ेवरात, कड़े, छल्ले पहन कर अल्लाह तआला की नाफरमानी न करो ।
       
(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 132)

मुहर्रम व सफ़र में ब्याह शादी न करना और सोग मनाना 

⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬⏬
माहे मुहर्रम में कितनी रसमें, बिदअतें और खुराफ़ातें आजकल मुसलमानों में राइज हो गई हैं उनका शुमार करना भी मुश्किल है। उन्हीं में से एक यह भी कि यह महीना सोग और गमी का महीना है। इस माह में ब्याह शादी न की जायें। हालांकि इस्लाम में किसी भी मय्यत का तीन दिन से ज्यादा गम मनाना नाजाइज़ है और इन अय्याम में ब्याह शादी को बुरा समझना गुनाह है। निकाह साल के किसी दिन में मना नहीं चाहे मुहर्रम हो या सफर या और कोई महीना या दिन।

️आलाहज़रत अलैहिर्रहमतु वर्रिदवान से पूछा गया
⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️⬇️
(1) बाज़ अहलेसुन्नत व जमाअत अशरए मुहर्रम में न तो दिन भर रोटी पकाते हैं और न झाडू देते हैं कहते हैं बाद दफ़न ताज़िया रोटी पकाई जाएगी।
(2) दस दिन में कपड़े नहीं उतारते।
(3) माहे मुहर्रम में ब्याह शादी नहीं करते।
(4) इन अय्याम में सिवाए इमाम हसन और इमाम हुसैन रदियल्लाह तआला अन्हुमा के किसी और की नियाज़ व फातिहा नहीं दिलाते यह जाइज़ है या नाजाइज़? तो आप ने जवाब में फ़रमाया पहली तीनों बातें सोग हैं और सोग हराम और चौथी बात जहालत। हर महीने में हर तारीख़ में हर वली की नियाज हर मुसलमान की फातिहा हो सकती है।

(अहकामे शरीअत हिस्सा अव्वल सफ़हा 127)

दर अस्ल मुहर्रम में गम मनाना सोग करना फ़िरक़ए मलऊना शीओं और राफ़िज़ियों का काम है और खुशी मनाना मरदूद ख़ारिजियों का का शेवा और नियाज़ व फातिहा दिलाना, नफ़्ल पढ़ना,रोज़े रखना मुसलमानों का काम है।

यूंही मुहर्रम में ताजियादारी करना, मसनूई करबलायें बनाना , उसमें मेले लगाना भी नाजाइज़ व गुनाह है ।

(गलत फहमियां और उनकी इस्लाह ,पेज 131)